ग्लोबल हंगर इंडेक्स या वैश्विक भुखमरी सूचकांक 2022 (GHE) में भारत बीते साल की 101वीं पायदान से फिसल कर अब 107वें क्रम पर आ गया है. कंसर्न वर्ल्डवाइड और वेल्टहंगरलाइफ द्वारा संयुक्त रूप से जारी ग्लोबल हंगर इंडेक्स में देशों को उनके यहां भुखमरी की गंभीरता के आधार पर सूचिबद्ध किया जाता है. इस साल सूची में यमन सबसे आखिरी पायदान यानी 121वें क्रम पर है, तो शीर्ष पर यूरोपीय देश (European Countries) क्रोएशिया, एस्टोनिया और मॉन्टेंगरो आए हैं. एशियाई देशों की बात करें तो चीन (China) और कुवैत जीएचआई में शीर्ष पर विराजमान हैं. गौरतलब है कि भारत (India) ने पिछले साल भी अपनी रैंकिंग नीचे देख ग्लोबल हंगर इंडेक्स को ही खारिज कर दिया था.
आखिर है क्या ग्लोबल हंगर इंडेक्स
2000 से लगभग हर साल वैश्विक भुखमरी सूचकांक जारी किया जा रहा है. 2022 में इसका 15वां संस्करण जारी किया गया है. कम स्कोर से किसी देश को उच्च रैंकिंग मिलती है और भुखमरी दूर करने के पैमाने पर उसका प्रदर्शन बेहतर माना जाता है. भुखमरी को मापने का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र द्वारा निर्धारित सतत विकास लक्ष्यों में से एक ‘2030 तक शून्य भुखमरी’ का शिखर हासिल करना है. यही वजह है कि कुछ उच्च आय वाले देशों में ग्लोबल हंगर इंडेक्स के लिए जीएचआई स्कोर की गणना नहीं की जाती है. आम बोलचाल में भूख को भोजन की कमी के रूप में लिया जाता है, लेकिन औपचारिक अर्थ में इसकी गणना व्यक्ति द्वारा किए जा रहे कैलोरी सेवन के स्तर को माप कर की जाती है. हालांकि जीएचआई ने भूख की इस संकीर्ण परिभाषा तक ही खुद को सीमित नहीं रखा है. इसके बजाय वह चार प्रमुख पैमानों पर किसी देश के भुखमरी दूर करने में उसके प्रदर्शन को आंकता है. इनमें से एक है भोजन में माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी. इस तरह भुखमरी का एक समग्र खाका सामने आता है.
इन चार संकेतकों को आंकता है जीएचआई
कुपोषण, जो अपर्याप्त भोजन की उपलब्धता को दर्शाता है. इसकी गणना कुपोषित आबादी की गणना से निकाली जाती है. इसमें भी उन लोगों की गणना खासतौर पर शामिल है, जिनकी कैलोरी सेवन की मात्रा अपर्याप्त है.
चाइल्ड वेस्टिंग यानी भयंकर कुपोषण का पैमाना. इसे पांच साल से कम उम्र के ऐसे बच्चों की गणना करके निकाला जाता है, जिनका वजन उनकी लंबाई के सापेक्ष कम होता है.
चाइल्ड स्टंटिंग का पैमाना लगभग स्थायी कुपोषण को दर्शाता है. इसकी गणना पांच साल से कम उम्र के बच्चों से की जाती है, जिनका वजन उनकी उम्र के लिहाज से कम होता है.
बाल मृत्युदर वास्तव में अपर्याप्त पोषण और अस्वस्थ वातावरण को भी सामने लाती है. इसकी गणना पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्युदर से की जाती है. आंशिक तौर पर ये अपर्याप्त पोषण से होने वाली मौतों का मिश्रित आंकड़ा होता है.
प्रत्येक देश का डेटा का मानक 100 अंकों पर आधारित होता है और अंतिम गणना पहले और चौथे संकेतक के लिए 33.33 फीसदी और दूसरे और तीसरे संकेतक के लिए 16.66 फीसदी के स्कोर पर टिकी होती है. जिन देशों का स्कोर 9.9 के बराबर या इससे कम होता है, उन्हें भुखमरी के सूचकांक में ‘कमतर’ श्रेणी पर रखा जाता है. इसके विपरीत 20 से 34.9 स्कोर अर्जित करने वाले देशों को ‘गंभीर’ श्रेणी में रखा जाता है. 50 से ऊपर स्कोर वाले देशों को ‘अत्यंत चिंताजनक’ श्रेणी में रखा जाता है.
अन्य देशों की तुलना में भारत का स्कोर
भारत 29.1 स्कोर के साथ भुखमरी की ‘गंभीर’ श्रेणी वाले देशों में आता है. ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत अपने पड़ोसी देश नेपाल (81), पाकिस्तान (99), श्रीलंका (64) और बांग्लादेश (84) से भी निचले पायदान पर है. बीते कई सालों से भारत का जीएचआई स्कोर लगातार पेशानी पर बल डाल रहा है. 2000 में 38.8 स्कोर के साथ भारत में भुखमरी की ‘अत्यंत चिंताजनक’ स्थिति थी, तो 2014 में 28.2 के पैमाने पर रही. इसके बाद से तो भारत लगातार उच्च स्कोर ही प्राप्त करता आ रहा है. यद्यपि भारत चार संकेतकों पर लगातार कमतर प्रदर्शन कर रहा है, लेकिन कुपोषण और चाइल्ड वेस्टिंग संकेतकों पर उसका प्रदर्शन सुधरा है. भारत की आबादी में कुपोषण का स्तर 2014 के 14.8 की तुलना में 2022 में 16.3 रहा है, तो पांच साल से कम उम्र के बच्चों में 2014 की 15.1 की दर 2022 में 19.3 पह पहुंच गई है.
विश्व खाद्य दिवस विशेषः 82 देशों में 34.5 करोड़ लोगों के सामने भीषण खाद्य संकट
जीवन के लिए सबसे जरूरी चीज है भोजन, और दुनिया इस समय इसके अभूतपूर्व संकट से गुजर रही है। भारत में तो खाद्यान्नों का अभाव नहीं, लेकिन अनेक देशों में स्थिति विकट है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) के अनुसार कोविड-19 महामारी से पहले 2019 में दुनिया में 13.5 करोड़ लोग भीषण खाद्य संकट से जूझ रहे थे। इस साल की शुरुआत में इनकी संख्या 28.2 करोड़ हो गई, और आज 82 देशों में 34.5 करोड़ लोग भीषण खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं। इतना ही नहीं, खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुसार 2021 में पांच लाख लोगों की तो भूख से मौत हो गई।
FAO की 30 सितंबर को जारी क्रॉप प्रॉस्पेक्ट्स एंड फूड सिचुएशन रिपोर्ट के अनुसार 45 देशों में 5 करोड़ लोग अकाल के कगार पर खड़े हैं। इनमें 33 देश अफ्रीका के, नौ एशिया, दो लैटिन अमेरिका और एक यूरोप का देश है। अगर मदद नहीं पहुंचाई गई तो वहां भूखों मरने की नौबत आ जाएगी। WFP ने कहा है कि अकाल जैसी स्थिति का सामना कर रहे लोगों की संख्या पांच साल में 10 गुना हो गई है। दुनिया में ऐसे 9.7 लाख लोग हैं। इनमें सबसे ज्यादा सोमालिया में और बाकी अफगानिस्तान, इथोपिया, दक्षिण सूडान और यमन में हैं।
दुनिया के भूख पीड़ितों की दुर्दशा की ओर सबका ध्यान दिलाना और सबके लिए सेहतमंद खाना सुनिश्चित करने के मकसद से संयुक्त राष्ट्र के FAO ने 16 अक्टूबर 1979 को विश्व खाद्य दिवस मनाने की शुरुआत की थी। इस साल इसकी थीम है ‘लीव नो वन बिहाइन्ड’ यानी कोई पीछे न छूट जाए। संयुक्त राष्ट्र की ही इकाई वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) की देखरेख में इसे अंजाम दिया जाता है।
जनवरी तक और बिगड़ेंगे हालात
WFP के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर डेविड बीसले ने एक बयान में कहा कि हम अभूतपूर्व खाद्य संकट का सामना कर रहे हैं। तीन साल से भूख से पीड़ितों लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। भारत में WFP के कंट्री डायरेक्टर बिशो पाराजुली कहते हैं, हर रात 82.8 करोड़ लोग भूखे सोते हैं। दुनिया में 310 करोड़ लोग पौष्टिक खाना नहीं खा सकते। FAO-WFP के हंगर हॉटस्पॉट्स आउटलुक 2022-23 का हवाला देते हुए वे कहते हैं, “45 देशों में 20.5 करोड़ लोगों को जिंदा रहने के लिए आपात खाद्य सहायता की जरूरत पड़ेगी। वहां अक्टूबर से जनवरी के दौरान हालात बेहद खराब होने के आसार हैं।”
FAO की स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2021 के मुताबिक 2014-16 में दुनिया की 8.2% आबादी गंभीर खाद्य संकट से जूझ रही थी। साल-दर-साल बढ़ती हुई यह 2018-20 में 10.5% तक पहुंच गई। अफ्रीकी देशों में 18 से 23 फीसदी, एशिया में 7.3 से 11.3 फीसदी और लैटिन अमेरिका में 8 से 11 फीसदी लोग इस समस्या को झेल रहे हैं।
भारत बेहतर स्थिति में
खाद्य सुरक्षा के मामले में भारत काफी अच्छी स्थिति में है। हम दुनिया के सबसे बड़े कृषि उत्पाद निर्यातकों में एक हैं। सरकारी संस्था एपीडा के अनुसार 2021-22 में 1.84 लाख करोड़ रुपये का कृषि निर्यात हुआ। इसमें 72 हजार करोड़ रुपये का चावल और 15,840 करोड़ का गेहूं निर्यात था। हम अनेक देशों को मानवीय आधार पर भी मदद कर रहे हैं। बीते 70 वर्षों में देश में खाद्यान्न उत्पादन छह गुना से ज्यादा बढ़ा है। 1950-51 में देश में सिर्फ 5.08 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन हुआ था, जो 2021-22 में 31.57 करोड़ टन हो गया।
भारत की इस यात्रा को FAO के पूर्व चीफ टेक्निकल एडवाइजर डॉ. रामचेत चौधरी बखूबी बयान करते हैं। उम्र के आठवें दशक में प्रवेश कर चुके डॉ. चौधरी कहते हैं, “हमारे गांव में राशन की दुकान थी। वहां अमेरिका से आयात किया हुआ पीएल 480 गेहूं मिलता था। उसकी क्वालिटी बहुत खराब होती थी। मैं मां से कहता, यह रोटी खाई नहीं जाती, तो मां कहती, बेटा बस यही है खाने को। और आज यह देखकर हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है कि हम दुनिया को खिला रहे हैं, अनेक देशों की खाद्य सुरक्षा भारत पर निर्भर है।”
आज भारत दूध, जूट और दालों का सबसे बड़ा उत्पादक है। गेहूं, चावल, गन्ना और फल-सब्जियों के मामले में दूसरे स्थान पर है। थाइलैंड को पीछे छोड़कर भारत तीन साल से चावल का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है। दुनिया में 40% चावल निर्यात भारत ही करता है। चीन में चावल का उत्पादन भारत से ज्यादा है, लेकिन वहां आबादी अधिक होने के कारण खपत भी ज्यादा है। डॉ. चौधरी कहते हैं, “अगर भारत चावल का निर्यात बंद कर दे तो 50 देशों में भूखों मरने की नौबत आ जाएगी।”
सरकारी प्रयासों से खाद्य सुरक्षा
उत्पादन बढ़ने के अलावा सरकार के कुछ कदमों से भी देश में खाद्य सुरक्षा बढ़ाने में मदद मिली है। 2013 में लागू राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून इसमें काफी मददगार साबित हुआ है। लेकिन पाराजुली आगे के लिए सचेत करते हैं, “2030 तक भारत की आबादी 150 करोड़ हो जाने की उम्मीद है। इसे देखते हुए खाद्य उत्पादन बढ़ाने की भी जरूरत होगी। केमिकल के ज्यादा इस्तेमाल से मिट्टी की क्वालिटी खराब होने, पानी के दुरुपयोग और खाद्य पदार्थों में घटते पोषण पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है।”
वे कहते हैं, अच्छी बात है कि पारंपरिक कृषि के बजाय लोग समावेशी, ज्यादा प्रभावी और सस्टेनेबल तरीके को अपना रहे हैं जिससे उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। ऑर्गेनिक फार्मिंग को बढ़ावा देने के लिए परंपरागत कृषि विकास योजना, पानी के बेहतर इस्तेमाल के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना शुरू की गई है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना और पोषण शक्ति निर्माण योजना से खाद्य और पोषण सुरक्षा में मदद मिली है।
विश्व स्तर पर खाद्य सुरक्षा
नेशनल अकादमी ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज के सचिव और इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IFPRI) के पूर्व डायरेक्टर डॉ. पी.के. जोशी के अनुसार विश्व स्तर पर पिछले तीन दशक में खाद्य संकट के चार चरण देखे जा सकते हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में पूर्वी एशिया में वित्तीय संकट आया। इससे लोगों की आमदनी घटी और उनके सामने खाद्य संकट पैदा हो गया। हालांकि वहां स्थिति में तेजी से सुधार हुआ। उसके बाद जलवायु परिवर्तन से 2008-11 में खाद्य पदार्थों के दाम काफी बढ़े थे। तब भी कई गरीब देशों में खाद्य संकट गहराया। खाद्य संकट का तीसरा चरण कोविड-19 महामारी के दौरान आया, और अब रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण फिर संकट खड़ा हुआ है। इसकी वजह से दाम बढ़े हैं और बड़ी संख्या में लोग महंगा खाद्य पदार्थ खरीदने की स्थिति में नहीं हैं।
भारत के बारे में वे कहते हैं, “यहां स्थिति काफी अच्छी है। इन चारों चरणों के दौरान भारत में कोई खास समस्या नहीं हुई। हमारे पास पर्याप्त बफर स्टॉक था। कोविड के दौरान सरकार ने गरीब कल्याण अन्न योजना चलाई, जिससे खाद्यान्न की कमी नहीं हुई।” हालांकि इस साल मौसम में हुए अचानक बदलावों ने चिंता बढ़ाई है। नियम के मुताबिक 1 अक्टूबर को 102.50 लाख टन चावल और 205.20 लाख टन गेहूं (कुल 307.70 लाख टन) का ऑपरेशनल तथा स्ट्रैटजिक स्टॉक होना चाहिए। 1 अक्टूबर 2022 को 204.67 लाख टन चावल और 227.46 लाख टन गेहूं, यानी कुल 432.13 लाख टन का स्टॉक था। अक्टूबर में इससे कम स्टॉक 2017 में 421.73 लाख टन का था।
वैश्विक संकट के कारण
दुनिया में इतना अनाज उत्पादन होता है कि हर एक को पर्याप्त खाना मिल सके। लेकिन समस्या पहुंच और पोषक खाद्य की उपलब्धता की है। कोविड-19, युद्ध, जलवायु परिवर्तन, असमानता और महंगाई के कारण यह समस्या गंभीर हुई है। WFP के डेविड बीसले के अनुसार, विभिन्न देशों में मुद्रा कमजोर होने, महंगाई और कर्ज बढ़ने से हालात बिगड़े हैं। वैश्विक मंदी की आशंका गहराने लगी है, इससे ज्यादा संख्या में लोगों को मानवीय मदद की जरूरत होगी। FAO ने भी कहा है कि फर्टिलाइजर, गेहूं, जौ, रेपसीड, सनफ्लावर ऑयल के दाम में अप्रत्याशित वृद्धि के कारण पहले से भोजन की कमी का सामना कर रहे देशों में संकट बढ़ गया है।
खाद्य सुरक्षा पर भारी जलवायु परिवर्तन
मौसम की मार अब जल्दी-जल्दी पड़ने लगी है, और इससे नुकसान भी अधिक होने लगा है। अफ्रीका के कई देशों में सूखे से वहां खाद्य संकट बढ़ा है। पाकिस्तान समेत कई देशों में बाढ़ ने काफी तबाही मचाई है। वहां 3.3 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं। यूरोप में इस साल 500 साल (1540 के बाद) का सबसे बड़ा सूखा बताया जा रहा है। यूरोपियन कमीशन की ग्लोबल ड्रॉट ऑब्जर्वेटरी (GDO) के अनुसार 10 अगस्त तक यूरोप के 64% भू-क्षेत्र में सूखे के हालात थे। स्विट्जरलैंड और फ्रांस की 90%, जर्मनी की 83% और इटली की 75% खेती सूखे का सामना कर रही थी।
चीन का बड़ा इलाका भी इस साल गंभीर सूखे की चपेट में आ गया। वहां इसे 60 साल का सबसे भीषण सूखा बताया जा रहा है। वहां की सबसे लंबी नदी यांग्सी पर देश की एक तिहाई आबादी निर्भर करती है। उसमें पानी का स्तर रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिका का भी 40% इलाका सूखे की चपेट में है। विश्व बैंक का आकलन है कि जलवायु परिवर्तन से कृषि उत्पादकता 1961 की तुलना में 21% घट गई है।
महंगाई की भी मार
एफएओ का फूड प्राइस इंडेक्स सितंबर में लगातार छठे महीने गिरा, लेकिन अनाज महंगे हुए हैं। अर्जेंटीना और अमेरिका में फसल की स्थिति को देखते हुए गेहूं के दाम अगस्त की तुलना में 2.2% बढ़ गए। भारत से चावल निर्यात पर अंकुश लगने के बाद ग्लोबल मार्केट में इसके दामों में भी बढ़ोतरी हुई है। एफएओ ने अपने नए अनुमान में 2021 के मुकाबले अनाज उत्पादन 1.7% घटकर 276.8 करोड़ टन रहने का अनुमान व्यक्त किया है। इसका असर आखिरकार कीमतों पर होगा।
वर्ल्ड बैंक के अनुसार रूस-यूक्रेन युद्ध, सप्लाई चेन की दिक्कतें और कोविड-19 के कारण खाद्य पदार्थों के दाम बढ़े हैं। सितंबर 2021 की तुलना में सितंबर 2022 में गेहूं के दाम 20%, मक्के के 29% और चावल के 8% ज्यादा थे। निर्यात पर अंकुश से उर्वरकों की उपलब्धता भी कम हुई है। युद्ध के कारण 2024 तक महंगाई तेज रहने के आसार हैं। इससे स्टैगफ्लेशन का जोखिम बढ़ा है। निम्न और मध्य आय वर्ग वाली अर्थव्यवस्थाओं इस साल के अंत तक 7.5 करोड़ और लोगों के गरीबी में चले जाने का अंदेशा है। 2021 में भूख पीड़ित लोगों की संख्या 82.8 करोड़ हो गई और 2020 की तुलना में इसमें 4.6 करोड़ की वृद्धि हुई है।
डॉ. रामचेत इसके अन्य दुष्प्रभावों की बात भी कहते हैं, “लोगों की सेहत और काम पर असर होगा। बच्चों को ठीक से खाना नहीं मिला तो उनका शारीरिक विकास नहीं होगा। युवाओं को भोजन नहीं मिला तो वे काम कैसे करेंगे। उनकी प्रोडक्टिविटी कम हो जाएगी, जीवन प्रत्याशा घट जाएगी।”
खाने की बर्बादी से खाद्य सुरक्षा को चुनौती
खाद्य संकट में भोजन की बर्बादी का भी बड़ा योगदान है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में 2019 में 93.1 करोड़ टन खाद्य सामग्री बर्बाद हुई। यह कुल खाद्य उत्पादन का 17% है। 61% खाना घरों में, 26% फूड सर्विस में और 13% रिटेल चेन में नष्ट हुआ। भारत में एक व्यक्ति हर साल औसतन 50 किलो खाना बर्बाद करता है। हालांकि इस मामले में दुनिया के ज्यादातर देश भारत से आगे हैं। अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के कई देशों का औसत तो 100 किलो से ज्यादा है।
डॉ. रामचेत कहते हैं, एक-एक अनाज पैदा करने में कई संसाधनों का इस्तेमाल होता है, वह सब बर्बाद होता है। इसे रोकने के लिए फ्रांस से बफे सिस्टम आया। इसके पीछे सोच थी कि आप प्लेट में उतना ही लें, जितना खा सकें। लेकिन अक्सर पार्टियों में लोग जरूरत से ज्यादा प्लेट भर लेते हैं। इस पर लगाम लगाने के लिए हांगकांग और चीन में दो साल से नियम लागू है कि आप प्लेट में जितना खाना छोड़ेंगे उसकी दोगुनी कीमत चुकानी होगी। इससे वहां खाने की बर्बादी कम हुई है। भारत में भी ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि खाना लोगों के पेट में जाए, न कि नालियों में।
डॉ. पी.के. जोशी कहते हैं, “पहले तो यह हो कि हम खाने-पीने की चीजें बिल्कुल बर्बाद ना करें। इसे कम करने का एक उपाय सर्कुलर एग्रीकल्चर है। इसमें मुख्य उत्पाद के बाद बचे बाय प्रोडक्ट का अलग-अलग इस्तेमाल होता है। जैसे मंदिरों में, शादियों में, पार्टियों में फूलों का काफी प्रयोग होता है। लेकिन कुछ घंटों के बाद वे बेकार हो जाते हैं। अब उस फेंके गए फूल से अगरबत्ती बनाई जाने लगी है।” जोशी के अनुसार हमें हर कमोडिटी में इस तरह का विकल्प तलाशना पड़ेगा। इससे जीडीपी तो बढ़ेगी ही किसानों की आमदनी भी बढ़ेगी।
पोषण सुरक्षा जरूरी
भारत में समस्या खाद्य सुरक्षा की नहीं, बल्कि पोषण की है। वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (WFP) के अनुसार अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के बावजूद दुनिया के एक चौथाई अल्पपोषित और कुपोषित भारत में ही हैं। FAO की स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2021 के मुताबिक 2018-20 के दौरान दुनिया में अल्पपोषित लोगों की संख्या 68.39 करोड़ और भारत में 20.86 करोड़ थी।
डॉ. रामचेत कहते हैं, पोषण का अमीर या गरीब से होने से फर्क नहीं पड़ता। पैसे वाले घरों में भी लोग कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन खूब खाते हैं, लेकिन मिनरल्स और विटामिन की कमी होती है। उन्होंने बताया कि गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में आने वाले बीमार बच्चों के इलाज के दौरान (2011-12) जुटाए गए आंकड़ों से पता चला कि 12 साल से कम उम्र के 49% बच्चे कुपोषित हैं। उनमें खास कर विटामिन ए और आयरन की कमी पाई गई। सरकारी प्राइमरी स्कूल के 65% बच्चों में यह समस्या थी।
डॉ. जोशी के अनुसार कुपोषण स्वच्छता की कमी और खराब पानी आदि से भी होता है। एनसीएईआर की एक स्टडी में पाया गया कि खराब पानी के कारण बच्चों का पेट खराब हो जाता है। वे जो कुछ खाते हैं वह शरीर में लगता नहीं है। इसलिए वे कुपोषित हो जाते हैं। महिलाओं में आयरन की कमी से एनीमिया की समस्या होती है। वे कहते हैं, “पोषण सुरक्षा के लिए बिहेवियर में बदलाव की जरूरत है। अनेक लोग ऐसे मिलेंगे जो जानते हैं कि उन्हें क्या खाना चाहिए क्या नहीं. लेकिन उस जानकारी को व्यवहार में नहीं लाते।”
कुपोषण दूर करने के लिए सरकार फोर्टिफिकेशन पर ध्यान दे रही है, लेकिन डॉ. रामचेत बायो फोर्टिफिकेशन पर जोर देते हैं। वे कहते हैं, “बाहर से फोर्टिफिकेशन करने से अच्छा है फसलों की उन किस्मों को बढ़ावा दिया जाए जिनमें पोषक तत्व अधिक पाए जाते हैं। जैसे, काला नमक किस्म के चावल में आयरन और जिंक प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। कृत्रिम फोर्टिफिकेशन से तो उत्पाद महंगे हो जाएंगे।”
पोषण में मिलेट का महत्व
मिलेट्स पोषण सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। भारत मिलेट्स का सबसे बड़ा उत्पादक है। 2020 में दुनिया का 41% मिलेट उत्पादन भारत में हुआ था। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत मिलेट का रकबा और उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास हो रहे हैं। भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को मिलेट वर्ष घोषित किया है।
कई दशक पहले मिलेट्स का चलन कम हो गया था। अच्छी बात है कि इनके महत्व पर लोगों का फिर ध्यान गया है। मिलेट कम बारिश वाले और कम उपजाऊ जमीन में भी उगाए जा सकते हैं। जलवायु परिवर्तन का इन पर असर कम होता है। WFP के अनुसार चावल की तुलना में इन्हें उगाने में 70% कम पानी की जरूरत पड़ती है। इसी तरह इनकी प्रोसेसिंग में गेहूं की तुलना में 40% कम ऊर्जा खपत होती है। इनके लिए ज्यादा इनपुट की भी जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए इनसे मिट्टी की सेहत भी सुधारी जा सकती है। WFP के बिशो पाराजुली कहते हैं, मिलेट उत्पादन और कृषि में जैवविविधता बढ़ाने के लिए भारत जी-20 तथा अन्य मंचों का इस्तेमाल कर सकता है। गौरतलब है कि दिसंबर में भारत को जी-20 की अध्यक्षता मिलने वाली है।
पोषण के लिए डॉक्टर के सुझाव
शारदा अस्पताल की न्यूट्रिशियनिस्ट डॉ. पूजा सिंह का कहना है कि कुपोषण तब होता है जब किसी व्यक्ति के आहार में सही मात्रा में पोषक तत्व नहीं होते। पोषण के बारे में सही जानकारी ना होने के कारण भी ऐसा होता है। इसलिए हमारा खान-पान अच्छा होना चाहिए। उनके सुझाव हैंः-
-खाने में प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन ओर मिनरल्स संतुलित मात्रा में होने चाहिए। अधिक वजन वाला व्यक्ति भी कुपोषित हो सकता है।
-विशेषकर वे महिलाएं जो गर्भवती हैं या स्तनपान करा रही हैं, उनके भोजन में ये तत्व चाहिए- लौह तत्त्व, फोलिक एसिड, कैल्शियम, आयोडीन तथा विटामिन ए। उन्हें गुड़ के साथ दूध पीना चाहिए, हरी सब्जियां और फल खाने चाहिए।
-न्यूट्रिशन अधिक होने के कारण मिलेट को चमत्कारी अनाज भी कहा जाता है। आयुर्वेद और विज्ञान में मिलेट का नियमित सेवन स्वास्थ्य के लिए उत्तम माना गया है।
-मिलेट से सभी आवश्यक पोषक तत्व हमारे शरीर में नेचुरल तरीके से पहुंचते हैं। हमें किसी विटामिन या मिनरल को दवा के रूप में लेने की आवश्यकता नहीं रहती।
-शरीर का इम्यून सिस्टम मजबूत बनाने के लिए भी नियमित मिलेट खाना लाभदायक माना जाता है। यह पाचन क्रिया को सुधारने के साथ साथ पेट सम्बंधित समस्याओं को ठीक करने का काम करते हैं।
कैसी हो थाली
डॉ. पूजा कहती हैं, “कहावत है, यथा अन्नम तथा मन्नम। मतलब जैसा अन्न होता है, वैसा ही हमारा मानसिक और बौद्धिक विकास होता है।” इसलिए यह देखें कि आपकी थाली में संतुलित पोषण है या नहीं। थाली में परोसी गई हर चीज आपके मेटाबॉलिज्म पर प्रभाव डालती है। आप इस थाली को कितना पोषक बना सकते हैं यह आपके हाथ में है। कहीं ऐसा तो नहीं कि थाली में खाना तो भरपूर है, लेकिन न्यूट्रिशन के नाम पर कुछ नहीं।




