हदें पार न करने वाली उच्च न्यायालय की चेतावनी से तथकथित आधुनिक और बौद्धिक हलके में सन्नाटा पसरा है। डेली सोप क्वीन एकता कपूर के विरुद्ध हाल ही में जारी किए गए एक गैर जमानती वारंट ने एक बार फिर स्वस्थ्य और अश्लील मनोरंजन के बीच की बारीक लाइन को पुनर्भाषित किया है। ओटीटी प्लेटफार्म पर बालाजी ऑल्ट भड़काऊ और उत्तेजित और कामुकता भरे कार्यक्रमों के जरिए दर्शकों का छद्म मनोरंजन करता रहा है। अश्लील कंटेंट के चलते गाहे–बगाहे इसे सुधि दर्शकों का कोपभाजन भी बनना पड़ा है।
इस बार ‘ट्रिपल एक्स’ वेब सीरीज में एक सैनिक की पत्नी से जुड़े कुछ तथ्यों को तोड़–मरोड़ कर आपत्तिजनक रूप में पेश करने के चलते एकता न केवल दर्शकों बल्कि न्यायालय के निशाने पर भी हैं। कोर्ट इससे पहले भी उन्हें इसी तरह के मामलो में फटकार लगा चुका है। बड़ा सवाल है कि क्या किसी भी बड़े बैनर या बड़े नाम को इस बात की आजादी है कि वो देश की सबसे बड़ी युवा आबादी को अपने दोयम दर्जे के कंटेंट और कामुक प्रसारण के जरिए गुमराह करें। आज देश की ७० प्रतिशत से भी अधिक आबादी की पहुंच इंटरनेट तक है जो इन माध्यमों के ज़रिए फिल्मों और कहानियों में अंतर्निहित संदेश को बड़ी आत्ममुग्धता से अनुकरण करने की कोशिश में रहती है‚ लेकिन पिछले कुछ वर्षों से खास सिनेमाई तबके द्वारा सिनेमा और टीवी पर संक्रमणकालीन नैतिक अराजकता की स्थिति पैदा की जा रही है। इन गुटों ने बौद्धिक आजादी के नाम पर युगों से स्थापित‚ विकसित और संवर्धित चेतना और मूल्यों पर प्रायोजित तरीके से कुठाराघात किया है।
यहां ई. एम. फॉरेस्टर का वो कथन याद आता है जब वे कहते हैं कि उन्होंने जिन कारणों से कहानियां लिखनी बंद कर दी; उनमें से एक कारण यह है कि संसार का सामाजिक रूप इतना बदल गया है कि जिन परिवारों वाली दुनिया के बारे में वे लिखने के आदी थे‚ जो अपेक्षाकृत शांत थी‚ वो अब इस खांचे में मिसफिट हो गई। आज निर्माताओं की एक लंबी फेहिरस्त है जो क्रिएटिव विजन के नाम पर मनोगत और वस्तुगत सीमाओं का अतिक्रमण कर रहे हैं। वे तथ्यवाद का नाटक करते हुए एक ओर सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देने का नाटक करते हुए असल मुद्दे से कन्नी काट जाते हैं तो दूसरी ओर अपनी व्यावसायिक रु चि को मजे से तुष्ट भी करते हैं। यानी दोनों हाथ मोदक! ऐसे लोगों के भीतर आपराधिक अंतरात्मा की कोई गूंज सुनाई नहीं पड़ती। असहज और अप्रिय कंटेंट को सामाजिक सतह से नीचे जाकर चालू फैशन के तौर पर बेधड़क लोगों तक पहुंचान ही इनका निमित्त है।
कामुक व्यावसायिकता की ये चमक इतनी तेज है कि हमारी पाश्विक पुतलियां इसके आकर्षण को रोक नहीं पा रही। छद्म प्रगतिशीलता के नाम पर घटिया कंटेंट के जरिए एक पूरी पीढ़ी को नैतिक पतन और मूल्यगत विध्वंस के कगार पर पहुंचाया जा रहा है। और हैरानी ये कि उनकी मुट्ठी की ये पकड़ युवाओं पर इतनी कसती जा रही है कि लगता है कि जरूर एक दिन उनके पांवों के नीचे के मजबूत संस्कारित जमीन खिसक जाएगी। स्वस्थ्य मनोरंजन और उर्वरा कंटेंट के जरिए हमारी पीढियां यथार्थवादी समाजिक पृष्ठभूमि के सूक्ष्म ब्योरे को समझे इसलिए इस मुद्दे पर स्वतंत्र विचार अपेक्षित है। संस्कृति‚ परंपरा और मूल्य की सरहद की चौकियां सुरक्षित रहे इसलिए रचनात्मक सरोकारों को मूल्यों और स्वस्थ्य परंपरा से जोड़ना होगा।




