साहब बिल्कुल सावधानी हटी और दुर्घटना घटी टाइप का मामला हो गया है। बेचारे क्रिकेटर अर्शदीप सिंह से एक कैच क्या छूटा कि उन्हें खालिस्तानी करार दे दिया गया। पहले इस तरह के मामलों में पाकिस्तानी करार दिए जाने का रिवाज था। इधर वैसे भी किसी को पाकिस्तान जाने की सलाह देना काफी कम हो गया है। कहीं देशद्रोही तो कम नहीं हो गए या फिर पाकिस्तान ही हालत देखकर उस पर दया आने लगी। दुश्मन पर दया दिखाना अच्छी बात नहीं है। खैर‚ ऐसे लोगों को अब खालिस्तानी करार देने का नया ट्रेंड है। खालिस्तानियों को खुश होना चाहिए कि उन्हें मुफ्त में प्रचार मिल रहा है। ऐसे खैरख्वाह उन्हें कहां मिलेंगे। कल दिल्ली के बॉर्डरों पर आंदोलन कर रहे किसान खालिस्तानी थे‚ अब बेचारे वे क्रिकेटर भी खालिस्तान हो गए‚ जिनसे एक कैच छूट गया। यूं माना यही जाता है कि खालिस्तानी आंदोलन खत्म हो गया‚ लेकिन कुछ लोग खालिस्तान का ठप्पा लिए घूम रहे हैं और वे चाहे जिसकी पीठ पर यह ठप्पा लगाकर उसे खालिस्तानी करार दे देते हैं। इसका फायदा उन्हें यह होता है कि दूसरे पर देशद्रोही का ठप्पा लगा कर वे बिना कोई कष्ट उठाए देशभक्त हो जाते हैं। हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आए। आजादी से पहले देशभक्त होने के लिए कष्ट उठाना पडता था‚ जेल जाना पडता था‚ सजाएं काटनी पडती थीं और कई बार फांसी भी चढना पडता था। इसलिए तब जो लोग देशभक्त होने से हिचकिचाते थे‚ वे अब मुफ्त में देशभक्त हुए जा रहे हैं। बस‚ दूसरे पर एक ठप्पा ही तो लगाना है–कभी खालिस्तानी‚ कभी माओवादी या टुकडा–टुकडा गैंग होने का। और ठप्पा तो खैर उनके पास तैयार ही है। खैर‚ इससे हमें क्या मतलब। हम तो कह रहे हैं कि चूक ना होनी चाहिए। वैसे तो मत चूके चौहान भी पिट जाते हैं‚ पर चूकने वाले के पीछे तो ट्रोल हाथ धोकर ही पड जाते हैं। इधर अर्शदीप से चूक हुई और वे खालिस्तानी करार दे दिए गए। और उधर राहुल गांधी से चूक हुई और उन्हें फिर पप्पू बना दिया गया। हालांकि पप्पू का ठप्पा उन पर से हटाया कभी नहीं गया था। लेकिन उन्होंने आटे को लीटर में क्या मापा कि लोगों ने पप्पू का ठप्पा फिर ढूंढ निकाला। हालांकि राहुल ने भूल सुधार कर ली थी पर यह प्रिंट मीडिया नहीं है कि भूल सुधार को स्वीकार कर लिया जाएगा। सोशल मीडिया में भूल सुधार जैसा कुछ नहीं होता। पर लोग कहते हैं कि इस बार मुकाबला अच्छा रहा। कांग्रेस के आईटी सेल वाले भी भाजपा नेताओं की ऐसी चूकों के वीडियो वायरल करने में पीछे नहीं रहे। अच्छी बात यह कि भाजपा वाले तो राहुल की तरह भूल सुधार भी नहीं करते। कह दिया न‚ बस कह दिया!
क्या इस बार पास होगा परिसीमन बिल?
20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र में एक बार फिर संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026 यानी...







