भारत में लोकतंत्र है‚ और विश्व में जहां कहीं भी लोकतंत्र है‚ चुनावों के समय घोषणाएं और वादे राजनीतिक दलों द्वारा किए ही जाते हैं। कुछ वादे चुनाव जीतकर सत्ता हासिल करने वाले दल पूरे भी करते हैं। वहीं कुछ सरकारें चुनाव में जीत हासिल करने के लिए भी कुछ ऐसे काम करती हैं कि नाराज लोगों का मन बदला जा सके। इसके उदाहरण पूरी दुनिया में हैं। एक उदाहरण अमेरिका से ही लेते हैं‚ जहां जो बाइडेन ने ड़ोनाल्ड़ ट्रंप को हराकर सत्ता हासिल की। चुनाव अभियान के दौरान डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बाइडेन ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की स्वास्थ्य संबंधी योजना को बढ़ाने का वादा किया। उन्होंने ९७ फीसदी अमेरिकी जनता के स्वास्थ्य बीमा की बात कही। यह भी कहा था कि मुफ्त स्वास्थ्य संबंधी लाभ के लिए पूर्व से निर्धारित ६५ साल की आयु सीमा को घटाकर ६० साल कर दिया जाएगा। तब अमेरिका के अर्थशा्त्रिरयों ने टिप्पणी की थी कि बाइडेन को अपना वादा पूरा करने के लिए २.२५ ट्रिलियन डॉलर की राशि अगले दस सालों में खर्च करनी होगी।
भारत भी कोई अलहदा लोकतंत्र नहीं है। यहां चुनाव जीतने के लिए तमाम तरह के तिकड़म किए जाते रहे हैं। हाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने एक संबोधन में कहा था कि रेवडि़यां बांटने से देश का विकास नहीं होने वाला। देश विकास के रास्ते पर आगे बढ़े‚ इसके लिए कुछ कड़े और ठोस कदम उठाने होंगे। यह बात उन्होंने बुंदेलखंड एक्सप्रेस–वे का लोकार्पण करने के बाद एक जनसभा को संबोधित करते हुए कही थी। हालांकि ऐसा कहते हुए उन्होंने विपक्षी दलों पर हमला भी बोला कि कुछ राजनीतिक दल हैं‚ जो रेवडि़यां बांटते हैं‚ और जनता–जनार्दन को भ्रमित करते हैं। यह भी कहा कि जो रेवडि़यां बांटते हैं‚ वे एक्सप्रेस–वे‚ हवाई अड्डे नहीं बनाने वाले।
अब सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने चुनाव के दौरान मुफ्त की योजनाओं पर रोक लगाने की बात कही है। इसके लिए केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि जल्द से जल्द इस दिशा में कोई रास्ता निकाले। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी हालिया सुनवाई में सरकार को निर्देश दिया है कि वह वित्त आयोग से बात करे। मुफ्त में खर्च किए गए पैसे को ध्यान में रखकर जांच की जाए। इस संबंध में चुनाव आयोग ने सुझाया है कि सरकार इस मुद्दे से निपटने के लिए कानून ला सकती है।
दरअसल‚ भारत की गिरती अर्थव्यवस्था के कारण विषमता बढ़ती जा रही है। इस साल आर्थिक वृद्धि दर‚ जो वित्तीय वर्ष के प्रारंभ में ७.४ फीसदी अनुमानित था‚ अब अनुमानतः ६.५ फीसदी रह गई है। हालांकि अब भी इसमें गिरावट हो सकती है‚ इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। इसका प्रमाण अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के मुकाबले रु पए की गिरती साख है।
देश के ऐसे हालात में चुनावी वादों और जनता को मिलने वाले छोटे–छोटे लाभों पर सरकार से लेकर अदालतों तक की निगाह जाकर ठहर गई है। लेकिन यहां दो बातें अहम हैं। पहली बात तो यही कि भारत में लोकतंत्र मांग आधारित लोकतंत्र है। मांग आधारित लोकतंत्र का मतलब यह है कि जनता की ओर से मांग की जाती है। सभी पार्टियां चुनाव के पहले यह जानने में जुट जाती हैं कि जनता को ऐसा क्या दिया जाए जिससे कि वह उसके पाले में आए। इस मामले में जो सत्तासीन होते हैं‚ उनके पास मौका भी होता है। मसलन‚ उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के पहले कोरोना काल में सरकार ने जमकर मुफ्त राशन बांटा। यहां तक कि जिन थैलों में लोगों को राशन दिया गया‚ उनके ऊपर भी तस्वीरें छापकर अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की गई। दिल्ली में सत्तासीन आम आदमी पार्टी भी इस मामले में कहीं से भी पीछे नहीं रही है। हाल ही में पंजाब में हुए चुनाव के दौरान उसने वहां के नागरिकों से तमाम तरह के वादे किए‚ जिनमें कृषि कार्य के लिए निशुल्क बिजली से लेकर महिलाओं को हर महीने पेंशन देने का वादा शामिल था।
दूसरी बात यह है कि जनता को मिलने वाले इस तरह के क्षणिक लाभों पर हुक्मरानों की निगाह का मतलब क्या है जबकि इसी देश में सांसदों–विधायकों‚ पूर्व सांसदों–पूर्व विधायकों को मिलने वाले वेतन‚ पेंशनादि में तमाम तरह की वृद्धि की जाती है। यहां तक कि जो सरकारीकर्मी हैं‚ उन्हें भी महंगाई भत्ते के नाम पर सरकार राहत देती है। तो क्या जो सांसद नहीं हैं‚ विधायक नहीं हैं‚ सरकारीकर्मी नहीं हैं‚ वे इस देश के नागरिक नहीं हैंॽ यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि महंगाई हवा और पानी के जैसी ही होती है‚ इसका असर सब पर पड़ता है। जो गरीब हैं‚ उनके ऊपर महंगाई का असर बेशक‚ सबसे अधिक पड़ता है।
असल मामला है कि हमारे हुक्मरान हमारे देश में किस तरह का शासन चलाना चाहते हैं। परंपरा के हिसाब से देखें तो भारत में लोक कल्याणकारी शासन प्रणाली है। यह देश कोई कॉरपोरेट कंपनी नहीं है। जनता जरूरतमंद है क्योंकि उसके पास पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। उसके पास रोजगार की कमी है। ऐसे में निश्चित तौर पर ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है ताकि समस्या का दीर्घकालीन इलाज हो सके। लेकिन इस काम में समय लगेगा ही‚ क्योंकि जादू की कोई छड़ी नहीं होती है सत्तासीनों के पास। यह सभी जानते हैं। ऐसे में जनता को छोटे–छोटे लाभ यदि दिए भी जाते हैं‚ तो उससे अर्थव्यवस्था पर उतना बुरा असर नहीं पड़ता है‚ जितना कि अन्य मदों में किए जाने वाले अपव्ययों से। मसलन‚ रक्षा मंत्रालय की एक समिति ने हाल ही में करीब २४ हजार करोड़ रुपये के हथियार खरीदने का निर्णय लिया है। स्वयं नरेन्द्र मोदी कह रहे हैं कि उनकी प्राथमिकता आधारभूत संरचनाओं यथा सड़क‚ हवाईअड्डे आदि बनवाना है। लेकिन इन योजनाओं से आम जनता को तुरंत लाभ नहीं मिलने वाला।
इस सबके बावजूद सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी को सकारात्मक रूप में लिया जाना चाहिए। लेकिन यह भी कि सरकार के पास आम जनता को देने के लिए रेवडि़यों के अलावा क्या है‚ और स्वयं जनता को सरकारों से किस बात की उम्मीद है। असल मामला है कि हमारे हुक्मरान देश में कैसा शासन चलाना चाहते हैं। परंपरा के हिसाब से देखें तो भारत में लोक कल्याणकारी शासन प्रणाली है। यह कॉरपोरेट कंपनी नहीं है। जनता जरूरतमंद है क्योंकि उसके पास पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं। रोजगार की कमी है। ऐसे में ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है ताकि समस्या का दीर्घकालीन इलाज हो सके। लेकिन इस काम में समय लगेगा ही क्योंकि जादू की कोई छड़ी नहीं होती सत्तासीनों के पास॥







