विगत 16 नवम्बर को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लगातार सात घंटे तक बैठक कर सूबे में शराबबंदी की समीक्षा की। पिछले दिनों दीपावली की पूर्वसंध्या पर उत्तरी बिहार में कई जगहों पर जहरीली शराब पीने से पचास लोगों के मरने की दर्दनाक घटना ने सूबे की सियासत को हिला कर रख दिया था। आरोप–प्रत्यारोप से घिरे नीतीश इस मामले में लगभग किंकर्तव्यविमूढ़ हो चुके हैं। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि करें तो क्या करेंॽ इस मामले में उनकी स्थिति संभवतः सांप–छछूंदर वाली हो चुकी है। वह न तो इस कानून में ढील दे सकते हैं‚ न ही इसे ठीक ढंग से लागू।
१६ नवम्बर की मैराथन बैठक के बाद भी कोई खास निर्णय नहीं आया है। जो आया है उसमें काफी झोल है। जहां तक मेरी समझ है‚ आने वाले दिनों में नीतीश सरकार की मुसीबतें इन फैसलों के कारण बढ़ने वाली है। नये फैसले के मुताबिक चौकीदार से लेकर अफसर तक की जवाबदेही तय की गई है कि उनके इलाके में यदि शराबबंदी कानून किसी स्तर पर टूटता है‚ तब उसके लिए उस इलाके के चौकीदार से लेकर अफसर तक दंडित किये जाएंगे। इस फैसले में सनक के सिवा और कुछ नहीं है। क्या यह जवाबदेही पहले नहीं थीॽ यदि थी तो फिर इसे दोहराने का क्या मतलबॽ यह कहावत है कि कोई भी नया कानून कुछ अफसरों की बलि चाहता है। इस कानून के मामले में यह संभव नहीं हुआ था। छोटे सिपाही–जमादार भले दंडित हुए हों‚ मेरे जानते अब तक किसी आईपीएस –आईएएस अधिकारी को दंडित नहीं किया गया है। आगे इसमें परिवर्तन होगा‚ इसमें संदेह है। बलि कभी भी बाघ यानी ताकतवर की नहीं बल्कि कमजोर की होती है। इस बार भी ऐसा ही होगा। चौकीदार–सिपाही से आगे मामला जाएगा‚ इसकी उम्मीद कम ही है।
क्या पिछले हफ्ते के फैसले में चौकीदारों के अधिकार क्षेत्र का विस्तार हुआ हैॽ मेरी जानकारी के अनुसार जो राजकीय विज्ञप्ति आई है उसमें इसकी कोई विवेचना नहीं है। शहरी क्षेत्रों में तो नहीं‚ लेकिन देहाती क्षेत्रों में हर पंचायत में चौकीदार हैं। क्या उनके पास इतनी ताकत है कि वे किसी की भी घर तलाशी ले सकेंॽ खास कर बड़े लोगों के घर कीॽ चौकीदारों की भूमिका उनके क्षेत्र की किसी घटना की थाने में सूचना देने भर की है। वे अपनी मर्जी से न तो कोई फैसला ले सकते हैं‚ न कार्रवाई कर सकते हैं। उन्हें घरों में झांकने का भी अधिकार नहीं है। अब ऐसे में उन्हें यदि जिम्मेदार बनाया जाता है‚ तो साफ है कि उन पर ज्यादती की जा रही है। एक सवाल मुख्यमंत्री की कुंठा को लेकर भी उठाया जा रहा है। नीतीश कुमार ने शराबबंदी कानून को कहीं अपनी व्यक्तिगत जातिवादी कुंठा को शमित करने का एक साधन बनाना तो नहीं चाहा हैॽ दरअसल‚ चौकीदारों में दो जातियों के लोगों का ही बाहुल्य है। नब्बे फीसद चौकीदार–दफादार या तो अहीर हैं या दुसाध। इन दोनों बिरादरी के लोग हमेशा नीतीश कुमार की राजनीति के हिट लिस्ट में रहे हैं। महादलित के फरमान तले दुसाधों को दरकिनार करने की जो कोशिश हुई‚ उससे सब परिचित हैं। अहीरों से उनकी जानी दुश्मनी तो पहले से रही है । बिहार में चौकीदारों की ही सेवा है‚ जिसमें किसी चौकीदार की सेवा काल में यदि मृत्यु हो जाए तो उनके आश्रित को अनुकम्पा के आधार पर नौकरी नहीं मिलती‚ जबकि दूसरी सेवाओं में ऐसा होता है।
यह फैसला नीतीश कुमार के ही कार्यकाल में हुआ। अब इस शराबबंदी के ठीहे पर मनमाने ढंग से उन चौकीदारों की बलि हो सकेगी। यदि इस मामले में थोड़ी भी सच्चाई है तो मानना पड़ेगा पूरा मामला मनोविज्ञान से जुड़ा है। नाजी दौर में जर्मनी में ऐसे फैसले होते थे। काश‚ नीतीश सरकार इस मामले को लेकर गंभीर होती! हर कोई इस बात से सहमत होगा कि शराब के अबाध विस्तार को रोका जाए और इसे काबू में रखा जाए‚ लेकिन जब पूर्णता की बात होती है तब यह एक स्वांग बनने लगता है। इसके ईद–गिर्द मिथ्याचार–पाखंड स्वतः विकसित होने लगते हैं। चोरी‚ असत्य वादन‚ हिंसा‚ यौनिकता पर जैसे ही पूर्ण निषेध की कोशिश होती है‚ यह नाटक बनने लगता है और अंततः इसका एक पाखंड रूप सामने आता है। यौन संबंधों की रोकथाम को सिरफिरे लोगों ने ब्रह्मचर्य तक पहुँचा दिया। यह पूर्ण निषेध की स्थिति है। इसके पाखंडों पर अधिक बोलने की जरूरत नहीं समझता। हिंसा के निषेध को अशोक ने जब पूर्णता की स्थिति देनी चाही थी‚ तो ऐसा ही पाखंड विकसित हुआ था। इसे लेकर ख्यात कथाकार भीष्म साहनी की एक कहानी है। राजा अशोक अपने राजमहल में विचरण कर रहा है। वह देखता है कि राजमार्ग से कुछेक लोग झाल–बाजे के साथ एक बकरी को बलि के लिए ले जा रहे हैं। आरक्षियों को वह रोकने का आदेश देता है। पूर्ण अहिंसा की राजाज्ञा जारी हो चुकी थी। लोग अपने में खोए हुए चले ही जा रहे हैं। आगे स्थित मंदिर में उन्हें बलि देनी थी। उनकी मन्नत थी। आरक्षी उन्हें समझाते हैं। लोग मानते नहीं। अंततः बकरी को लिये–दिये लोग मंदिर के भीतर जाते हैं। अब राजाज्ञा और आमजन में आमना–सामना होता है। आरक्षी दल भी मंदिर में घुसता है। कुछ देर बाद साबूत बकरी लिये आरक्षी दल बाहर निकलता है। मंदिर से खून की एक मोटी धार भी निकलती है। कानून की रक्षा हो गई‚ लोग मार दिए गए। सनक भरे कानूनों का यही हश्र होता है। नीतीश कुमार को इस पाठ से सबक लेना चाहिए था‚ लेकिन शायद सबक लेने की क्षमता ही उन्होंने खो दी है। अतियों के रास्ते पर चल कर इन्ही गतियों की प्राप्ति होती है।
शराबबंदी की इस मैराथन बैठक में इस बिंदु पर भी विमर्श होना चाहिए था कि इस कानून को लेकर जो राजबल लग रहा है उसका राज्य के विकास पर समग्र प्रभाव कैसा होगाॽ शराब की रोकथाम निश्चय ही महत्वपूर्ण है‚ लेकिन कोई नहीं कहेगा कि इसी में राज्य की पूरी ताकत को झोंक दिया जाए। यह तत्परता यदि शिक्षा‚ कृषि या उद्यमिता के विस्तार पर हुई होती तो उसके सफल नतीजे आते। शराबबंदी कोई ऐसा मुद्दा नहीं है कि राज्य के पूरे पुलिस बल और व्यवस्था को उसके उन्मूलन पर लगा दिया जाए। अतिरिक्त सतर्कता ने इसे एक प्रहसन बना कर रख छोड़ा है। समीक्षा बैठक के निर्णय प्रथम दृष्टया ही बेमतलब दिखते हैं। अभी भी मेरा आग्रह होगा कि नीतीश कुमार अपनी जिद वापस लें। शराबबंदी को लेकर ऐसा कानून और व्यवस्था लाएं‚ जिससे यह शराबखोरी पर लगाम लगे।






