अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग जब मार्च 2026 के स्तर पर दोबारा पहुंच चुकी है, तो 17-18 जून को दोनों पक्षों के बीच हुआ ‘इस्लामाबाद समझौता’ (MoU) भारी दबाव में है. अगर अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान में जमीनी सैन्य कार्रवाई नहीं करते हैं, तो ग्लोबल एनर्जी इकोनॉमी के दबाव को देखते हुए वाशिंगटन और तेहरान को आखिरकार बातचीत की मेज पर लौटना ही होगा. हालांकि, यह देखना अभी बाकी है कि मौजूदा लड़ाई वाशिंगटन को इस समझौते की शर्तों (खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के मामले में) को मानने के लिए कितना मजबूर करती है. लेकिन इस समझौते में एक तीसरा मुख्य हस्ताक्षरकर्ता भी है. वो हैं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री.
यह लेख आपको इस बहस में नहीं उलझाएगा कि अमेरिका और ईरान के बीच ‘मध्यस्थता’ करने में पाकिस्तान कितना कामयाब रहा या नाकाम. इसके बजाय, यह एक बेहद अहम सवाल को टटोलता है. ये सवाल है कि पाकिस्तान की इस अचानक दिखी कूटनीतिक सक्रियता का ईरान-पाकिस्तान संबंधों पर क्या असर पड़ा है?
कोई पारंपरिक मध्यस्थ तो है नहीं
सच तो यह है कि इस्लामाबाद को मध्यस्थ की भूमिका मिलना ट्रंप प्रशासन और पाकिस्तानी हुक्मरानों के बीच करीबी का नतीजा था. इस पाकिस्तानी कमान का नेतृत्व असल में सेना प्रमुख आसिम मुनीर और कानूनी तौर पर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ कर रहे हैं.
जनवरी 2026 में इस्लामाबाद में बड़े तामझाम के साथ हुए एक ‘क्रिप्टो डील’ ने दोनों के बीच इस करीबी को और हवा दी. वैसे, अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्ते साल 2025 के मध्य से ही काफी बेहतर होने लगे थे, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने जून 2025 में व्हाइट हाउस में जनरल मुनीर के लिए एक अभूतपूर्व लंच की मेजबानी की थी.
यह वह दौर था जब इजरायल और ईरान के बीच 12 दिनों की जंग चल रही थी और इजरायल ने ईरान के सैन्य व परमाणु ठिकानों पर हमले किए थे. जनरल मुनीर के लिए ट्रंप की पसंद जैसे-जैसे बढ़ी, यह रिश्ता और मजबूत होता गया. आखिरकार, मार्च की जंग को रोकने के लिए इस्लामाबाद को बातचीत के केंद्र के तौर पर चुना गया.
तेहरान के लिए शायद इस बात की कोई खास अहमियत नहीं थी, जब तक कि पाकिस्तान अमेरिका का पसंदीदा मध्यस्थ बनकर नहीं उभरा. खासकर ओमान की जगह, जिसने अमेरिका के बातचीत के तौर-तरीकों पर खुलकर नाराजगी जताई थी.
पाकिस्तान का असली असर कहां है?
पाकिस्तान इस मध्यस्थता से जो फायदे उठाना चाहता है, उसकी जड़ें असल में वाशिंगटन के साथ उसके रिश्तों में हैं, तेहरान के साथ नहीं. पाकिस्तान के लिए सबसे अहम बात यह है कि वह ईरान को किस हद तक समझौतों के लिए मना पाता है. इसके लिए जाहिर तौर पर उसे ईरान का भरोसा जीतना था. यही वजह है कि पाकिस्तान सिर्फ बातचीत की मेज़ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने जमीन पर भी हालात को प्रभावित करने की कोशिश की.
मिसाल के तौर पर, अप्रैल के महीने में पाकिस्तान ने अपने बंदरगाहों के ज़रिए ईरानी तेल के परिवहन की इजाजत दी, जिससे तेहरान को अमेरिकी पाबंदियों से बचने में मदद मिली. इस कदम से वाशिंगटन का इस्लामाबाद पर भरोसा खत्म नहीं हुआ, जो यह दिखाता है कि नए अमेरिका-पाकिस्तान संबंध कितने मजबूत हो चुके हैं. इसने यह भी साबित किया कि इस्लामाबाद के इन कदमों का मकसद तेहरान में अपनी अहमियत बढ़ाना था, ताकि बातचीत के दौरान अमेरिका की मांगों की वकालत करने से जो नाराजगी पैदा हो, उसे कम किया जा सके. इस बात का जिक्र ईरानी सांसद और राष्ट्रीय सुरक्षा-विदेश नीति आयोग के प्रवक्ता इब्राहिम रजाई ने खुलकर किया था.
अफगानिस्तान का सबक
क्या इस तरह की मध्यस्थता से पाकिस्तान और ईरान के बीच लंबे समय का भरोसा पैदा होता है? इस सवाल का जवाब अफगानिस्तान में पाकिस्तान के पुराने अनुभवों से मिल जाता है. अफगानिस्तान में अमेरिका और नाटो सेनाओं के खिलाफ तालिबान की गुरिल्ला लड़ाई का शुरुआती समर्थन करने के बावजूद (चाहे वह आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध में अमेरिका का मुख्य क्षेत्रीय भागीदार रहने के दौरान हो या बाद में), आज पाकिस्तान और तालिबान के रिश्ते सबसे निचले स्तर पर हैं. पाकिस्तान अब तालिबान पर अपनी धरती पर अलगाववादी और आतंकवादी हमलों को बढ़ावा देने का आरोप लगा रहा है.
हालांकि ईरान-पाकिस्तान के रिश्ते अफगानिस्तान-पाकिस्तान जैसे नहीं हैं, लेकिन अफगानिस्तान के तजुर्बे से यह साफ है कि मध्यस्थ की भूमिका निभाने से किसी भी पक्ष के साथ दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ की गारंटी नहीं मिलती.
ईरान-पाकिस्तान के मामले में भी दूरियां कम नहीं हैं. ईरान इस बात से खफा है कि पाकिस्तान अपनी धरती पर मौजूद ईरान-विरोधी आतंकवादी गुटों पर लगाम नहीं कस रहा है. इसके अलावा, अमेरिका और अफगानिस्तान को लेकर तेहरान का नजरिया पाकिस्तान से बिल्कुल जुदा है. याद रहे कि सीरिया में इस्लामिक स्टेट के खिलाफ लड़ाई के दौरान ईरान ने पाकिस्तान के शिया स्वयंसेवकों (जैनबियून ब्रिगेड, जिसे पाकिस्तान ने 2024 में आतंकवादी संगठन घोषित किया था) को संगठित करने में मदद की थी, लेकिन दोनों देशों के बीच सांप्रदायिक मतभेद हमेशा अविश्वास की एक वजह बने रहे हैं.
एक पेचीदा अतीत
साल 1979 में जब ईरान में शिया इस्लाम पर आधारित इस्लामी क्रांति हुई, तो यह साफ हो गया कि ईरान खाड़ी में अमेरिका के सबसे बड़े सहयोगी से बदलकर उसका सबसे बड़ा दुश्मन बनने जा रहा है. ऐसे में पाकिस्तान एक अजीब कशमकश में फंस गया. एक तरफ जिया-उल-हक पाकिस्तान में सुन्नी इस्लामीकरण को बढ़ावा दे रहे थे (जो ईरान की शिया क्रांति के उलट था), तो दूसरी तरफ 1979 में अफगानिस्तान पर सोवियत संघ के हमले के खिलाफ जंग में मददगार बनने के कारण पाकिस्तान अमेरिका का और भी करीबी सहयोगी बनता जा रहा था (जबकि ईरान अमेरिका से कोसों दूर जा चुका था).
नतीजतन, भले ही इस्लामाबाद ने तेहरान के साथ खुलकर सहयोग की वकालत की (यहां तक कि जिया-उल-हक ने इसे इस्लाम की बड़ी जीत बताया), लेकिन वह ईरान के साथ भू-राजनीतिक मतभेदों के कारण पैदा होने वाले दीर्घकालिक खतरे को भी समझता था. इसके बाद दोनों देशों के बीच जो ठंडे रिश्ते शुरू हुए, वे शाह के दौर की गहरी दोस्ती के बिल्कुल उलट थे. शाह रजा पहलवी ने कभी जनरल याह्या खान से भारत के खिलाफ युद्धों में पाकिस्तान का खुलकर साथ देते हुए कहा था, “पाकिस्तान की सुरक्षा ही ईरान की सुरक्षा है.”
लेकिन इस कोशिश के पीछे एक वजह यह भी थी कि पाकिस्तान के अघोषित परमाणु कार्यक्रम और ए.क्यू. खान नेटवर्क की कथित गतिविधियों के कारण अमेरिका पाकिस्तान से नाराज चल रहा था.
ईरान को जब भी किसी अमेरिकी सहयोगी को अपनी तरफ खींचने का मौका मिलता है (भले ही वह उसका स्वाभाविक साझेदार न हो), तो वह इसे अपने आपसी मतभेदों से ज्यादा तवज्जो देता है. यह बात उस दौर में भी उतनी ही सच थी जितनी आज है, जब ईरान लगातार अपने ‘भाईचारे वाले’ अरब देशों से अमेरिकी सुरक्षा तंत्र से बाहर निकलने की अपील करता है.
इसके बावजूद, 1990 का दशक दोनों देशों के लिए बेहद तनावपूर्ण रहा. वजह था अफगानिस्तान का गृहयुद्ध, जहां ईरान (भारत के साथ मिलकर) ‘उत्तरी गठबंधन’ का समर्थन कर रहा था और पाकिस्तान ‘तालिबान’ के साथ खड़ा था. हालांकि तालिबान सरकार बनाने में कामयाब रहा, लेकिन उत्तरी गठबंधन के साथ ईरान के रिश्ते इतने गहरे थे कि 9/11 के तुरंत बाद उसने अमेरिका का साथ दिया और तालिबान के ठिकानों की खुफिया जानकारी साझा की. बदले में अमेरिकी सेनाओं ने ईरान को अपने देश में अल-कायदा के नेटवर्क की पहचान करने में मदद की.
लेकिन जॉर्ज बुश प्रशासन की तरफ से ईरान को ‘बुराई का धुरी’घोषित करने, इराक पर अमेरिकी हमले और पाकिस्तान के साथ अमेरिका की नई साझेदारी ने ईरान-पाकिस्तान के रिश्तों को फिर से उलझा दिया. इराक से सद्दाम हुसैन के हटने के बाद ईरान को वहां रणनीतिक बढ़त तो मिली, लेकिन ईरान को लगा कि वह पूर्व (पाकिस्तान) और पश्चिम (इराक) दोनों तरफ से अमेरिकी सेनाओं से घिर चुका है. इस माहौल में, पाकिस्तान एक ऐसा अमेरिकी सहयोगी बनकर उभरा जिसे ईरान नजरअंदाज नहीं कर सकता था (दोनों के बीच 909 किलोमीटर लंबी सीमा है). इसलिए ईरान को पाकिस्तान के साथ सीधे टकराव से बचने के लिए बातचीत का रास्ता खुला रखना पड़ा, लेकिन साथ ही अपनी लक्ष्मण रेखा भी साफ करनी पड़ी.
एक तनावपूर्ण सरहद
2024 के हमलों के बाद दोनों देशों की ओर से ‘भाईचारे’ के दावों को दोहराना इस रिश्ते के अंतर्विरोधों को दिखाता है. जैसा कि विशेषज्ञ एलेक्स वतांका ने 2015 में अपने शोध में लिखा था, ‘भाईचारे’ के ये खोखले दावे हकीकत से कोसों दूर हैं क्योंकि दोनों देशों के भू-राजनीतिक नजरिए में गहरे मतभेद हैं. असल में यह एक ऐसा रिश्ता है जहां मीठी बातें और कड़वी हकीकतें एक साथ चलती हैं.
अफगानिस्तान में ईरान ने खुद को सुरक्षित रखने के लिए तालिबान के साथ अपने रिश्ते मजबूत किए हैं. इसका फायदा उसे अगस्त 2021 में तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद मिला है. यह सच है कि अफगान शरणार्थियों की जबरन वापसी जैसे मुद्दों पर तालिबान को तेहरान से भी शिकायतें रही हैं, जितनी इस्लामाबाद से हैं. लेकिन ईरान-अफगानिस्तान के रिश्ते उस हद तक नहीं बिगड़े जितने पाकिस्तान-अफगानिस्तान के रिश्ते बिगड़े हैं. तेहरान और काबुल के रिश्ते शांत और स्थिर हैं, जबकि इस्लामाबाद और काबुल के बीच हालात अब खुली जंग जैसे हैं, जैसा कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने फरवरी 2026 में खुद स्वीकार किया था.
अविश्वास की डगर
आज पाकिस्तान जहां सऊदी अरब का रक्षा भागीदार बन चुका है, अमेरिका के साथ नई साझेदारियां कर रहा है और पश्चिम एशिया के अलावा उत्तरी अफ्रीका व काकेशस क्षेत्र में अपना कूटनीतिक दायरा बढ़ा रहा है. वहीं दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिका को सैन्य जीत हासिल नहीं करने दी है, होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण के जरिए वैश्विक ऊर्जा अर्थव्यवस्था पर अपना दबदबा बनाया है और क्षेत्रीय सुरक्षा पर अपना रणनीतिक प्रभाव कायम रखा है. पाकिस्तान की मध्यस्थता का आकलन इसी संदर्भ में किया जाना चाहिए.
शॉर्ट-टर्म में पाकिस्तान के जरिए ईरान के लिए एक नया खतरा यह है कि अमेरिका पश्चिमी ईरान में अस्थिरता पैदा करने के लिए हवाई हमलों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है. ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में बढ़ती अस्थिरता से उन बलूच ईरान-विरोधी समूहों को मौका मिलता है जो अक्सर पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में शरण लेते हैं (ईरान ने 2024 में इन्हीं समूहों को निशाना बनाया था).
लॉन्ग-टर्म में, फारस की खाड़ी में भू-राजनीतिक वर्चस्व हासिल करने की ईरान की कोशिशों को खाड़ी के अरब देशों के सुरक्षा तंत्र के साथ पाकिस्तान के बढ़ते तालमेल (खासकर सितंबर 2025 के बाद से) का ध्यान रखना होगा. चूंकि तेहरान खुद को एक ‘स्थिरता लाने वाले’ देश के तौर पर पेश करता है. इसलिए पाकिस्तान के प्रति उसका सार्वजनिक रुख व्यावहारिक ही रहेगा.
ईरान यह सुनिश्चित करेगा कि भले ही दोनों के बीच ऊपरी तौर पर अच्छे संबंध रहें, लेकिन पाकिस्तान को पश्चिम या मध्य एशिया में ईरान-विरोधी कोई भू-राजनीतिक फायदा न मिले. इसलिए, ईरान के साथ कोई नया रणनीतिक भरोसा कायम करने के बजाय, पाकिस्तान की यह मध्यस्थता उसी पुराने ढर्रे को आगे बढ़ाती है, जहां कूटनीतिक अविश्वास और दोस्ती की मीठी बातें साथ-साथ चलती हैं.







