पश्चिम एशिया में बीते चार महीने से जारी संघर्ष में अब एक नया और खतरनाक मोड़ सामने आ गया है। समझौते के तहत अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे 60 दिनों का संघर्ष विराम महज दो हफ्ते में ही टूट गया है। इसके बाद से पश्चिम एशिया एक बार फिर बारूद की ढेर पर खड़ा होता दिख रहा है। पूरी बात को ऐसे समझिए कि ईरान और अमेरिका के बीच 60 दिनों के लिए युद्धविराम हुआ था, जिसके तहत अमेरिका ने ईरान को खुले बाजार में तेल बेचने की छूट दी थी। लेकिन जहाजों पर हमले के बाद अमेरिका ने यह छूट वापस ले ली है, जिससे ईरान अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर में तेल नहीं बेच पाएगा।
क्या हुआ था होर्मुज में?
शांति वार्ता पर इसका क्या असर?
- यह हमले दोनों पक्षों के बीच विश्वास बढ़ाने की प्रक्रिया को गंभीर झटका दे रहे हैं. मौजूदा बातचीत ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा पर केंद्रित थी और अब दोनों देश एक-दूसरे पर समझौता तोड़ने का आरोप लगा रहे हैं. अमेरिका कह रहा है कि व्यापारिक जहाजों पर हमला रेड लाइन को पार करना है.
- वहीं ईरान कह रहा है कि अमेरिका के नए हमलों और तेल निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंध समझौते का उल्लंघन हैं. विश्लेषकों का कहना है कि समुद्र में जितनी ज्यादा हिंसा होगी, बातचीत की टेबल पर रियायतें देना दोनों देशों के लिए उतना ही मुश्किल होता जाएगा. घरेलू स्तर पर नेता कमजोर नहीं दिखना चाहते.
- हमलों के तुरंत बाद अमेरिका ने ईरानी तेल बिक्री की अनुमति रद्द कर दी, जो उसके लिए बड़ा आर्थिक झटका है. ट्रंप प्रशासन ने साफ संदेश दिया कि वह सैन्य जवाब के साथ-साथ आर्थिक दबाव भी बढ़ाएगा. ईरान के लिए प्रतिबंध हटाना किसी भी स्थायी समझौते की शर्त है, इसलिए यह कदम बातचीत को और जटिल बना रहा है.
खाड़ी में फिर बढ़ सकता है तनाव
भारत के लिए क्या मायने?
- इन सब गतिविधियों के बीच भारत इस स्थिति को बहुत ध्यान से देख रहा है. भारत अपनी करीब 40 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति खाड़ी देशों से ही करता है, जो हॉर्मुज के रास्ते आती है. स्थितियां बिगड़ते ही एक बार फिर से तेल-गैस की किल्लत हो सकती है.
- इसके अलावा यहां लाखों भारतीय काम करते हैं. ऐसे में अगर यातायात बाधित हुआ तो माल ढुलाई लागत, बीमा खर्च और तेल की कीमतें बढ़ेंगी, जो भारत में पेट्रोल-डीजल और महंगाई को प्रभावित कर सकती हैं.
- ईरान पर से तेल बेचने का प्रतिबंध हटने की वजह से भारत को कच्चा तेल भी आसान दामों पर मिलने का रास्ता मिल गया था लेकिन इस पाबंदी लगने के बाद तेल का एक सोर्स भी कम होने की आशंका है.
- भारत की ज्यादातर गैस कतर से ही आती है, ऐसे में किसी भी तरह की अशांति इसकी आपूर्ति में रुकावट पैदा करेगी. होर्मुज में जब युद्ध तेज था, तब गैस की किल्लत भारत ने देखी है और अगर हालात बिगड़ते हैं तो एक बार फिर से उसे इन्हीं हालात का सामना करना पड़ सकता है.
क्यों इतना अहम है स्ट्रेट ऑफ होर्मुज?
- हॉर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे संवेदनशील ऊर्जा मार्ग है. फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ने वाला यह रास्ता सऊदी अरब, इराक, कुवैत, UAE और कतर जैसे देशों के तेल और LNG निर्यात का मुख्य रास्ता है.
- दुनिया का लगभग 20% तेल और LNG इसी रास्ते से गुजरता है. अगर यहां यातायात रुक जाए तो पूरी दुनिया में तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, बीमा लागत बढ़ सकती है और व्यापार प्रभावित हो सकता है.
- फिलहाल दोनों पक्ष बातचीत से पीछे नहीं हटे हैं, लेकिन हर नया हमला शांति की राह को और पथरीला बना रहा है. कतर और ओमान जैसे मध्यस्थ देश कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अगर हिंसा का चक्र जारी रहा तो कूटनीति की जगह फिर से सैन्य तनाव ले सकता है.
ईरान के निशाने पर कुवैत, दागी मिसाइलें
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी हमले के बाद ईरान ने कुवैत पर बमबारील करना शुरू भी कर दिया है। कुवैती सेना ने आधिकारिक बयान जारी कर बताया है कि देश पर दुश्मन की ओर से मिसाइल और ड्रोन हमले किए गए हैं, जिसका सेना मुस्तैदी से जवाब दे रही है।
इस बीच, सुरक्षा को देखते हुए पूरे कुवैत में एयर रेड साइरन (हवाई हमले की चेतावनी देने वाले साइरन) बजा दिए गए हैं। सरकारी समाचार एजेंसी ‘कुना’ (KUNA) ने भी देशव्यापी साइरन बजाए जाने की पुष्टि की है।
धमाकों की आवाज पर सेना की सफाई
इतना ही नहीं कुवैत के अलग-अलग हिस्सों में धमाकों की आवाजें सुनी गई हैं, जिससे नागरिकों में चिंता का माहौल है। हालांकि, कुवैती सेना ने साफ किया है कि घबराने की कोई बात नहीं है। सेना के मुताबिक, ये धमाके आसमान में ही दुश्मन की मिसाइलों और ड्रोन को सफलतापूर्वक मार गिराने की वजह से हुए हैं।
इसके अलावा कुवैत मिलिट्री ने आम जनता से अपील की है कि वे किसी भी तरह की अफवाहों पर ध्यान न दें और प्रशासन व सुरक्षा बलों द्वारा जारी किए जा रहे सुरक्षा निर्देशों का पूरी तरह पालन करें। सभी को सुरक्षित स्थानों पर रहने की सलाह दी गई है।
कहां टूटा समझौता, विवाद की असली जड़ क्या?
बता दें कि ईरान और अमेरिका के बीच पिछले महीने 18 जून को एक समझौता (इस्लामाबाद समझौता) हुआ था, जिसके तहत 60 दिनों तक लड़ाई रोकने और व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित रास्ता देने पर सहमति बनी थी। लेकिन मंगलवार को ईरान की ‘इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स’ (IRGC) ने स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में तीन बड़े कमर्शियल तेल टैंकरों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला कर दिया।
इन हमलों में सऊदी अरब और कतर के जहाजों को निशाना बनाया गया। ओमान के तट के पास एक एलएनजी (LNG) टैंकर में आग भी लग गई। हालांकि ईरान ने दावा किया कि इन जहाजों ने उसकी चेतावनियों को नजरअंदाज किया था।
अमेरिका का पलटवार- सैन्य कार्रवाई से दहला तेहरान
ईरान के इस कदम के बाद अमेरिका ने तुरंत और बेहद सख्त रुख अपनाया। अमेरिकी सेना की सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने संघर्ष विराम का उल्लंघन करने के आरोप में ईरान के अंदर कई ठिकानों पर ताबड़तोड़ हवाई हमले किए।
इसके अलावा अमेरिका ने ईरान को दी गई सबसे बड़ी राहत छीन ली है। दो हफ्ते पहले अमेरिका ने ‘जनरल लाइसेंस X’ के तहत ईरान को तेल बेचने की छूट दी थी। हालांकि अब ट्रंप प्रशासन ने इसे रद्द कर दिया है।
अमेरिकी हमले में क्या-क्या हुआ तबाह?
अमेरिकी सेना के सेंट्रल कमांड ने बताया कि उन्होंने ईरान सटीक निशाना लगाने वाले हथियारों से ईरान के 80 से ज्यादा ठिकानों को ध्वस्त कर दिया है। नष्ट किए गए ठिकानों में ईरान के हवाई रक्षा सिस्टम, सेना के कमांड और कंट्रोल नेटवर्क, तटीय राडार और जहाज-रोधी मिसाइल ठिकानों के साथ-साथ ईरानी सेना (IRGC) की 60 से ज्यादा छोटी नावें शामिल हैं।
अमेरिका लागू किए नए और सख्त नियम
इसके इतर अमेरिका ने अब ‘जनरल लाइसेंस X1’ लागू किया है, जिसके तहत मंगलवार के बाद ईरान किसी भी देश को नया तेल नहीं बेच पाएगा। जो पुराने सौदे प्रोसेस में हैं, उनके लिए 17 जुलाई तक का समय दिया गया है और वह पैसा भी एक फ्रीज अकाउंट में रहेगा।
नहीं मान रहा ईरान, दी गंभीर चेतावनी
दूसरी ओर अमेरिका के इस कदम से ईरान बुरी तरह भड़क गया है। ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गारीबाबादी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि अमेरिका ने इस समझौते को तोड़कर अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन किया है।
ईरान अपने राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा की रक्षा के लिए कड़ा पलटवार करेगा और अमेरिका को इस उल्लंघन के गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। ईरान का कहना है कि उसने यह कदम इजरायल द्वारा लेबनान में की जा रही कार्रवाई और अमेरिका की धमकियों के जवाब में उठाया है।
अब दुनिया पर क्या होगा इसका असर?
गौरतलब है कि इस खबर के आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें तुरंत बढ़ गईं। ब्रेंट क्रूड 75 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी वेस्ट टेक्सस इंटरमीडिएट (WTI) 71 डॉलर पर पहुंच गया। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव ऐसे ही रहा, तो आने वाले दिनों में तेल की कीमतें और तेजी से भागेंगी।
इसके अलावा दुनिया का 20% तेल इसी ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ के रास्ते से गुजरता है। युद्ध के कारण यह रास्ता असुरक्षित हो गया है, जिससे आने वाले समय में दुनिया भर में ईंधन का संकट गहरा सकता है।







