अमेरिका ने 4 जुलाई को अपनी स्थापना की 250वीं वर्षगांठ मनाई। पेंसिलवेनिया और न्यूयार्क जैसे तेरह राज्यों के प्रतिनिधियों ने 4 जुलाई, 1776 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र होने की घोषणा की थी। अमेरिका के राज्य ब्रिटिश सम्राट जार्ज तृतीय की व्यापार और आप्रवासन प्रतिबंध लगाने, मनमाने टैक्स लेने और फ्रांस और भारत जैसे देशों के साथ हुए युद्धों का खर्च वसूलने जैसी नीतियों से नाराज थे। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश राज से आजादी का एलान करने के लिए एक घोषणापत्र बनाया था, जिसे थामस जेफर्सन, जान एडम्स, बेंजामिन फ्रेंकलिन, राजर शर्मन और राबर्ट लिविंग्सटन की समिति ने तैयार किया था।
घोषणापत्र में मुक्त व्यापार, खुला आप्रवासन और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को बढ़ावा देने वाली नीतियों को नए अमेरिकी गणतंत्र की आधारभूत नीतियां माना गया था। यह विडंबना ही है कि वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार, आप्रवासन और विदेश नीति उक्त घोषणापत्र की मूल भावना के एकदम विपरीत हैं। ट्रंप अपनी टैरिफ जंग, आप्रवासन विरोध और भरोसेमंद मित्र देशों से संबंध बिगाड़ने की नीतियों की पैरवी में कहते हैं कि वे अमेरिका की खोई महानता को बहाल करना चाहते हैं। हालांकि वे यह नहीं समझा पाते कि जिन नीतियों पर चलकर अमेरिका महान बना है, उनसे विमुख होकर महानता कैसे बहाल होगी? अमेरिका लगभग 150 वर्षों से सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है। चीन की अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद अमेरिका कुल जीडीपी में उससे 35 प्रतिशत आगे है और प्रति व्यक्ति आय में 12 गुना है। यह सब अब तक की मुक्त व्यापार और खुली आप्रवासन नीतियों की बदौलत ही हुआ है।
आप्रवासियों ने अमेरिका की औद्योगिक और डिजिटल दोनों क्रांतियों में प्रमुख भूमिका निभाई है। सिलिकान वैली में काम करने वाले दो तिहाई लोग आप्रवासी हैं, जिनमें एक बड़ी संख्या भारतीयों की है। अमेरिका की 80 प्रतिशत यूनिकार्न कंपनियों का शीर्ष नेतृत्व आप्रवासियों के हाथों में है और एक अरब डालर से अधिक की नई कंपनियों का सबसे बड़ा स्रोत भारत है। अमेरिका की कुल जीडीपी में आप्रवासियों का योगदान 20 प्रतिशत के करीब है। दुनिया भर के प्रतिभावान छात्रों, विज्ञानियों और उद्यमियों की पहली प्राथमिकता अमेरिकी शिक्षण एवं शोध संस्थान और कंपनियां रहती हैं। इसी कारण औद्योगिक क्रांति के बाद आई डिजिटल क्रांति और अब एआई की क्रांति में भी अमेरिका सबसे आगे रहा है। यह सब जानते हुए भी आप्रवासी छात्रों, विशेषज्ञों और सेवाकर्मियों पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाकर प्रतिभा के इस प्रवाह को रोकने से अमेरिका भला कैसे महान बन सकता है?
अमेरिका ने जब-जब आप्रवासियों को रोकने की कोशिश की है, तब-तब उसकी अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा है। 1929 की महामंदी के बाद हूवर प्रशासन ने बेरोजगारी पर काबू पाने के लिए आप्रवासियों पर रोक लगाने के साथ-साथ दक्षिण अमेरिकी आप्रवासियों को बड़ी संख्या में देश से निकाला था, जिसके कारण मजदूरी की दरें गिरी और कारोबार ठप हो गए थे। इसी तरह 1970 के दशक में फोर्ड और कार्टर की सरकारों ने आप्रवासियों पर पाबंदियां लगाईं, जिनके कारण कृषि की विकास दर गिरी और महंगाई में तेज उछाल दिखा। इस समय अमेरिकी अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी और महंगाई की उतनी समस्या नहीं है। समस्या विनिर्माण के क्षेत्र में आई बेरोजगारी, ईरान युद्ध की वजह से बढ़ी महंगाई और बढ़ती आर्थिक विषमता की है। डिजिटल क्रांति ने वैश्वीकरण को गति प्रदान की, जिसकी वजह से उद्योगों को उन देशों में लगाना संभव हुआ, जहां मजदूरी और बुनियादी चीजें सस्ती थीं। इससे अमेरिका के वस्तु निर्माण में लगे लोग बेरोजगार हो गए। डिजिटल और सेवा क्षेत्रों में नए रोजगारों के अवसर खुले, पर उनका लाभ उन्हीं को मिला जो नए कौशल सीखने को तैयार थे।
डिजिटल और सेवा क्षेत्रों में तेजी से हुए विकास ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को विनिर्माण की जगह सेवा प्रधान अर्थव्यवस्था बना दिया। जीडीपी का विकास हुआ, मगर निर्माण उद्योग बंद होने से बेरोजगार हुए नौकरी-पेशा लोगों तक उसका लाभ नहीं पहुंचा। मिसाल के तौर पर पिछले 40 वर्षों में लोगों की औसत आय केवल 20 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि एसएंडपी शेयर सूचकांक 4100 प्रतिशत तक उछला। इससे पूंजी बाजार में पैठ वाले लोग तो खुश हैं, लेकिन बाकी ठगा महसूस करते हैं। अमेरिकी राष्ट्र निर्माताओं ने ऐसे खुले बाजार और स्वस्थ प्रतिस्पर्धा वाले समाज की कल्पना की थी, जहां प्रतिभा और लगन वाले हर मेहनती इंसान को विकास के अवसर मिलें। इसीलिए यहां रंक से राजा बनने के लाखों किस्से हैं और इसे अवसरों की भूमि कहा जाता है, लेकिन पिछले कुछ दशकों से सारे अवसर और संपत्ति कुछ हाथों में सिमटने लगी है, जो पूरे समाज में फैलते अविश्वास और निराशावाद की जड़ है।
एक समय लोग मान कर चलते थे कि उनकी संतानों का जीवन उनसे अधिक खुशहाल होगा, लेकिन अब लोग मानते हैं कि अगली पीढ़ियों के लिए चुनौतियां बढ़ेंगी। यही कारण है कि अमेरिकी नागरिक होने पर गर्व की भावना अपने न्यूनतम बिंदु पर पहुंच गई है। इसके साथ-साथ लोगों का सर्वोच्च न्यायालय, संसद और राष्ट्रपति जैसी संवैधानिक संस्थाओं से भी विश्वास उठ रहा है। वियतनाम युद्ध के दौरान भी लोगों में इसी तरह अविश्वास की भावना पनपी थी। राजनीतिक कटुता के साथ-साथ आपसी कटुता भी बढ़ रही है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 53 प्रतिशत लोगों को दूसरों की नैतिकता और आचार-विचारों में बुराइयां नजर आती हैं।
इसी कटुता और निराशावाद को भुनाने के लिए ट्रंप ने अमेरिका को लुटा-पिटा और असहाय देश बता कर उसकी खोई प्रतिष्ठा बहाल करने के नाम पर चुनाव जीता था, लेकिन हकीकत यही है कि देश की प्रतिष्ठा को वे स्वयं लुटा रहे हैं। अपने पद का लाभ उठाकर मालामाल हो रहे हैं। गत साल उनकी कंपनियों के ट्रस्ट ने 202 करोड़ डालर का मुनाफा कमाया, जिसमें 104 करोड़ उस क्रिप्टोकरेंसी कारोबार से आया है, जिसे वे कुछ साल पहले तक घोटाला बताते थे। उनकी कंपनियां टैरिफ जंग शुरू करने और उसे रोकने के एलान के बीच धड़ाम हुए शेयर बाजार से मालामाल होती रही हैं।






