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वायनाड क्यों बन गया ‘कब्रिस्तान’?

UB India News by UB India News
July 7, 2026
in खास खबर, दुर्घटना
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वायनाड क्यों बन गया ‘कब्रिस्तान’?
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7 जुलाई 2026 सुबह… केरल के वायनाड जिले के मेप्पाडी के पास कल्लाडी में मीनाक्षी ब्रिज के नजदीक अचानक धरती चटकी. अंडर-कंस्ट्रक्शन सुरंग सड़क परियोजना (अनक्कमपोयिल-मेप्पाडी ट्विन टनल) की खुदाई का मलबा भरभरा कर नीचे गिर पड़ा. इस हादसे में एक मजदूर की मौत हो गई, सात घायल हुए और सात अब भी लापता हैं. राहत और बचाव दल ने मलबे से छह लोगों को बचाया, लेकिन अब भी 10 से ज्यादा लोगों के मलबे में दबे होने की आशंका है. 2 साल पहले भी त्रासदी में 400 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी.

आखिर क्यों वायनाड कब्रिस्तान बनता जा रहा है और सरकार कहां फेल हुई…

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दिलीप बिल्डकॉन के जिम्मे है परियोजना का काम

इस हादसे ने एक मस्जिद, एक मकान और एक बस स्टॉप को भी अपनी चपेट में ले लिया. सुरंग परियोजना को दिलीप बिल्डकॉन बना रही है, जबकि परियोजना की निगरानी कोकण रेलवे कॉरपोरेशन कर रहा है.

मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन ने साफ कहा, ‘यह ठेकेदार की लापरवाही है.’ उन्होंने बताया कि 20 जून को ही जिला कलेक्टर और आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने ठेकेदार को खुदाई का मलबा हटाने का आदेश दिया था, लेकिन ठेकेदार ने उसे अनसुना कर दिया. कृषि मंत्री टी. सिद्दीक ने तो इसे सीधे तौर पर ‘मानव-निर्मित आपदा’ करार दिया.

पिछले 24 घंटों में इस इलाके में 265 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड की गई. यह बारिश ऐसी नहीं थी जिसका पहले से अंदाजा न लगाया जा सकता था. मौसम विभाग ने पहले ही येलो अलर्ट जारी कर दिया था.

पर यह कोई पहली त्रासदी नहीं

30 जुलाई 2024 को वायनाड ने अपने इतिहास की सबसे भयानक प्राकृतिक आपदा देखी. रात 2 से 4 बजे के बीच मुंडक्कई, चूरालमाला और पुंचिरिमट्टम में एक के बाद एक कई भूस्खलन हुए. 1,550 मीटर की ऊंचाई से शुरू हुआ मलबा 8 किलोमीटर तक बहता चला गया और 86,000 वर्ग मीटर क्षेत्र को तबाह कर दिया.

अप्रैल 2025 में संसद में सरकार ने बताया कि 298 लोगों की मौत हुई, जिनमें 32 लापता लोगों को मृत घोषित किया गया. हालांकि, यह सरकारी आंकड़ा है. हकीकत इससे कहीं ज्यादा भयानक है. राहत एजेंसियों के मुताबिक, 400 से ज्यादा लोग मारे गए.

एक ही रात में 1,721 घर प्रभावित हुए. मुंडक्कई के 1,247 लोग, चूरालमाला के 2,162 लोग और अट्टमाला के 1,424 लोग बेघर हो गए. 6,759 लोगों को 53 राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ी. मुख्य पुल ढह गया, जिससे बचाव कार्य बाधित हुआ. 212 शव और 140 शरीर के अंग बरामद किए गए.

वायनाड को ‘कब्रिस्तान’ क्यों कहा जा रहा है?

इसकी तीन बड़ी वजहें हैं:

  • भूगोल और भूविज्ञान: वायनाड पश्चिमी घाट के बेहद संवेदनशील इको-सिस्टम पर बसा है. यहां की चट्टानें गनीस और शिस्ट हैं यानी प्राकंब्रियन युग की, जो बेहद नाजुक हैं. इन चट्टानों में प्राकृतिक दरारें हैं, जो बारिश में पानी सोखकर और कमजोर हो जाती हैं. 2024 के भूस्खलन से पहले 48 घंटों में 572.6 मिलीमीटर बारिश हुई यानी IMD के पूर्वानुमान से 200 फीसदी ज्यादा रही. वायनाड के वायथिरी तालुक को पश्चिमी घाट इकोलॉजिस्ट पैनल ने इको-सेंसिटिव जोन-1 घोषित किया था, मगर विकास के काम नहीं रुके.
  • चेतावनियां नजरअंदाज की गईं: 2011 में माधव गाडगिल समिति ने चेतावनी दी थी कि पश्चिमी घाट के संवेदनशील इलाकों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट और खनन पर रोक लगाओ. केरल सरकार ने उस रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया. 2024 के भूस्खलन से 16 घंटे पहले ह्यूम सेंटर फॉर इकोलॉजी ने चेतावनी जारी की थी, लेकिन जिला प्रशासन ने उसे नजरअंदाज कर दिया क्योंकि वह ऑफिशियल सिस्टम का हिस्सा नहीं था. केंद्र सरकार ने 23, 24, 25 और 26 जुलाई को भी भारी बारिश और भूस्खलन की चेतावनी दी थी, लेकिन राज्य सरकार ने इसे गंभीरता से नहीं लिया.
  • विकास की होड़ में पर्यावरण की अनदेखी: पिछले कुछ सालों में वायनाड में रिसॉर्ट्स, सड़कें, पर्यटन सुविधाएं और बागान तेजी से बढ़े हैं. पेड़ों की जगह कंक्रीट और बागानों ने ले ली. बारिश का पानी सोखने वाली जमीन कम हुई और अस्थिर ढलानों पर दबाव बढ़ा. सितंबर 2025 में आई एक रिपोर्ट ‘Sliding Earth, Scattered Lives’ के मुताबिक, ‘वायनाड भूस्खलन कुदरत का गुस्सा नहीं था, बल्कि इंसानों की लापरवाही से दखल देना और सरकार की विफलता का सीधा नतीजा था.’

सरकार कैसे फेल हुई?

सरकार की नाकामी की 4 बड़ी वजहें हैं:

1. चेतावनियों को गंभीरता से न लेना

तीन दशकों में वायनाड में 1984 (14 मौतें), 1992 (11 मौतें), 2007 (4 मौतें) और   2019 (पुथुमाला) में भूस्खलन हो चुके थे. इसके बावजूद वार्ड-स्तर की निकासी योजना नहीं बनाई गई. केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के पास मेप्पाडी पंचायत के लिए कोई साइट-स्पेसिफिक प्लान नहीं था. निकासी सिर्फ एक वार्ड तक सीमित रही.

2. राहत और पुनर्वास में लापरवाही

2024 की आपदा के बाद केरल सरकार ने केंद्र से 1,202 करोड़ रुपए की तत्काल सहायता मांगी. नवंबर 2024 में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने कहा कि केंद्र ने बिना मांगे दूसरे राज्यों को आपदा राहत दी, लेकिन वायनाड की मांग को नजरअंदाज किया गया. केंद्र ने आपदा को ‘गंभीर प्रकृति की आपदा’ घोषित करने से इनकार कर दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से मदद और बैंकों के कर्ज माफी का रास्ता बंद हो गया.

अक्टूबर 2025 में केरल हाईकोर्ट ने केंद्र पर ‘वायनाड पीड़ितों के लिए विफल’ रहने का आरोप लगाया. कोर्ट ने कहा, ‘केंद्र सरकार ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने से इनकार करके वायनाड के लोगों को निराश किया है.’ न्यायालय ने बैंकों से कर्ज वसूली के ‘शाइलॉकियन तरीकों’ की भी निंदा की.

3. 2026 में भी वही गलती दोहरा दी

7 जुलाई 2026 का हादसा बताता है कि दो साल बीत जाने के बाद भी कोई सबक नहीं सीखा गया. जिला कलेक्टर ने 20 जून को ठेकेदार को मलबा हटाने का आदेश दिया, पर ठेकेदार ने टाल-मटोल की. कोकण रेलवे को पहले ही भूस्खलन की चेतावनी दे दी गई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.

4. ‘राष्ट्रीय आपदा’ का दर्जा न देने की राजनीति

2024 के भूस्खलन को केंद्र ने ‘राष्ट्रीय आपदा’ घोषित करने से मना कर दिया. इसका सीधा मतलब हुआ कि राष्ट्रीय आपदा मोचन कोष (NDRF) से मदद नहीं मिल पाई, अंतरराष्ट्रीय सहायता का रास्ता बंद रहा और पीड़ितों के कर्ज माफी का कोई कानूनी आधार नहीं बन पाया.

वायनाड सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, एक सिस्टम फेलियर

वायनाड में धरती सिर्फ बारिश से नहीं खिसकती. वह लापरवाही, चेतावनियों को नजरअंदाज करने, कुदरत के कानूनों को ताक पर रखने और सरकार की नाकामी से खिसकती है. माधव गाडगिल ने 2024 में ही कह दिया था, ‘वायनाड आपदा मानव-निर्मित है.’ 2026 का हादसा इस बात का सबूत है कि केरल सरकार और केंद्र सरकार, दोनों ने मिलकर वायनाड को एक ‘कब्रिस्तान’ बनने दिया. 400 से ज्यादा मौतें, हजारों बेघर, बच्चों के सामने माता-पिता मलबे में बह गए. दो साल बाद भी   वही हालात, वही गलतियां और वही लापरवाही.

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