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बांकीपुर उपचुनाव : रणनीति का चक्रव्यूह रचने वाले पीके, कहीं राजनीति की चक्रव्यूह में गुम न हो जाएं ………………

UB India News by UB India News
July 7, 2026
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बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव अब केवल एक सीट का चुनाव नहीं रह गया है। यह बिहार की राजनीति की दिशा, विपक्ष की एकजुटता और नए राजनीतिक विकल्प के दावों की सबसे बड़ी परीक्षा बन चुका है। सबसे अधिक दांव पर यदि किसी की राजनीतिक साख लगी है, तो वह हैं प्रशांत किशोर। वर्षों तक दूसरे दलों को चुनाव जिताने की रणनीति बनाने वाले पीके अब पहली बार ऐसी परिस्थिति में हैं, जहां उनकी अपनी राजनीतिक समझ, संगठन और जनाधार की वास्तविक परीक्षा हो रही है।

राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में प्रशांत किशोर की छवि निर्विवाद रही है। उन्होंने कई दलों के लिए चुनावी अभियान तैयार किए, सामाजिक समीकरणों को साधा और सत्ता परिवर्तन की पटकथाएं लिखीं। लेकिन चुनावी सलाहकार और जननेता के बीच का अंतर अब बांकीपुर में साफ दिखाई दे रहा है। रणनीति कमरे में बनती है, लेकिन चुनाव बूथ पर जीता जाता है।

पीके की सबसे बड़ी उम्मीद यह थी कि विपक्ष किसी न किसी स्तर पर भाजपा के विरुद्ध एक साझा रणनीति अपनाएगा। किंतु राजद ने अपना उम्मीदवार उतारकर पूरे समीकरण को बदल दिया। यही वह मोड़ है जिसने पीके के सामने सबसे कठिन राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है।

राजद का चुनाव मैदान में उतरना केवल एक प्रत्याशी खड़ा करना नहीं है, बल्कि विपक्षी वोटों के बंटवारे की औपचारिक शुरुआत है। अब भाजपा विरोधी मतदाता तीन हिस्सों में बंट सकता है—एक हिस्सा राजद के साथ, दूसरा पीके के साथ और तीसरा अन्य विकल्पों की ओर। ऐसे में भाजपा को सीधा लाभ मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

विडंबना यह है कि जिस प्रशांत किशोर ने वर्षों तक विरोधी दलों के वोट विभाजन की रणनीति बनाई, आज वही स्वयं वोटों के विभाजन के सबसे बड़े शिकार बनते दिखाई दे रहे हैं। राजनीति का यह सबसे बड़ा व्यंग्य है कि कभी जो दूसरों के लिए चुनावी चक्रव्यूह तैयार करता था, आज स्वयं उसी प्रकार के चक्रव्यूह में घिरा हुआ नजर आ रहा है।

राजद के इस फैसले के राजनीतिक मायने भी दूरगामी हैं। यदि राजद वास्तव में भाजपा को हराना चाहता, तो वह विपक्षी मतों के एकीकरण की दिशा में पहल कर सकता था। लेकिन अपना उम्मीदवार उतारकर उसने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि उसकी प्राथमिक लड़ाई केवल भाजपा से नहीं, बल्कि बिहार की विपक्षी राजनीति में अपना वर्चस्व बनाए रखने की भी है। राजद अच्छी तरह समझता है कि यदि प्रशांत किशोर जैसे नए खिलाड़ी को राजनीतिक जमीन मिल गई, तो आने वाले विधानसभा चुनावों में सबसे अधिक नुकसान उसी को होगा। इसलिए यह लड़ाई केवल बांकीपुर की सीट की नहीं, बल्कि विपक्ष के नेतृत्व की भी है।

दूसरी ओर भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को अपने पक्ष में बदलने का प्रयास कर रही है। उसका संगठन वर्षों से इस क्षेत्र में सक्रिय है। बूथ प्रबंधन, कार्यकर्ताओं का नेटवर्क और चुनावी मशीनरी उसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। यदि विपक्षी मत बंटते हैं, तो भाजपा अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में पहुंच सकती है। यही कारण है कि बांकीपुर अब केवल भाजपा बनाम विपक्ष का चुनाव नहीं, बल्कि विपक्ष के भीतर नेतृत्व की लड़ाई का मैदान भी बन गया है।

प्रशांत किशोर के सामने एक और चुनौती है—उन्होंने स्वयं को पारंपरिक राजनीति का विकल्प बताया था। लेकिन चुनावी राजनीति की वास्तविकता यह है कि केवल विचार, यात्रा और जनसंवाद पर्याप्त नहीं होते। उम्मीदवार चयन, जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, संसाधन और बूथ स्तर तक फैला संगठन ही अंतिम परिणाम तय करता है। इन सभी मोर्चों पर उनकी पार्टी अभी भी स्थापित दलों की तुलना में कमजोर दिखाई देती है।

राजनीति में सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है, जब व्यक्ति अपनी रणनीति पर इतना भरोसा करने लगे कि वह प्रतिद्वंद्वियों की चालों का सही आकलन ही न कर सके। महाभारत का चक्रव्यूह केवल इसलिए घातक नहीं था कि वह जटिल था, बल्कि इसलिए भी कि उसमें प्रवेश करने वाला बाहर निकलने की पूरी योजना नहीं जानता था। आज प्रशांत किशोर के सामने भी कुछ वैसी ही चुनौती है। उन्होंने बिहार की राजनीति में प्रवेश का रास्ता तो बना लिया, लेकिन अब उन्हें ऐसे प्रतिद्वंद्वियों का सामना करना पड़ रहा है जो दशकों से चुनावी संघर्ष की राजनीति करते आए हैं।

यह भी याद रखना होगा कि जनता किसी राजनीतिक रणनीतिकार को उसके दावों से नहीं, बल्कि उसके परिणामों से आंकती है। यदि बांकीपुर में पीके अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाते, तो उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न उठेंगे। दूसरी ओर, यदि वे इस कठिन त्रिकोणीय मुकाबले में मजबूत प्रदर्शन करते हैं, तो यह साबित होगा कि उनकी राजनीति केवल चुनावी सलाह तक सीमित नहीं, बल्कि जनाधार भी बना सकती है।

बांकीपुर उपचुनाव का सबसे बड़ा संदेश शायद यही होगा कि बिहार की राजनीति में अब लड़ाई केवल सत्ता और विपक्ष के बीच नहीं है, बल्कि विपक्ष के भीतर नेतृत्व की भी है। राजद का उम्मीदवार उतारना इस बात का प्रमाण है कि विपक्ष की एकता का दावा अभी भी वास्तविकता से काफी दूर है। इसका सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान यदि किसी को होता दिखाई दे रहा है, तो वह प्रशांत किशोर हैं।

रणनीतिकार का खुद के चक्रव्यूह में फंस जाना

दरअसल, बीते डेढ़ दशक में प्रशांत किशोर ने देश भर के कई बड़े नेताओं को सत्ता के शिखर तक पहुंचाने का काम किया है. लेकिन जब खुद चुनावी अखाड़े में उतरने की बारी आई, तो बिहार की पारंपरिक और घाघ राजनीति ने उन्हें उनके ही पसंदीदा खेल में घेर लिया. बांकीपुर सीट को चुनना पीके के लिए एक बड़ा दांव था, जहां वह शहरी और बौद्धिक मतदाताओं के सहारे अपनी नई राजनीति की शुरुआत करना चाहते थे. उन्हें उम्मीद थी कि बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत और साझा चेहरा बनकर वह इस गढ़ को भेद देंगे. मगर राजद ने ऐन वक्त पर अपना प्रत्याशी देकर इस पूरे नैरेटिव को ही बदल दिया. अब पीके एक ऐसे मुकाबले में घिर गए हैं, जहां उनकी राजनीति की राहें बेहद कठिन होती दिख रही हैं.

पहला घेरा: भाजपा का परंपरागत गढ़

बांकीपुर विधानसभा सीट पिछले तीन दशक से भाजपा की सबसे सुरक्षित सीटों में गिनी जाती है. शहरी, शिक्षित और परंपरागत मध्यवर्गीय मतदाताओं की बड़ी मौजूदगी ने यहां भाजपा को लगातार बढ़त दिलाई है. यही वजह है कि प्रशांत किशोर ने खुद भी स्वीकार किया कि उन्होंने आसान सीट नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक लड़ाई के लिए भाजपा के गढ़ को चुना. अब राजद के मैदान में आने से अब बीजेपी विरोधी और सत्ता विरोधी यानी एंटी-इंकंबेंसी वोट दो फाड़ होना तय हैं. ऐसे में बांकीपुर की इस लड़ाई में अब पीके का असली मुकाबला पहले नंबर के लिए नहीं, बल्कि दूसरे नंबर पर आने के लिए सिमटता दिख रहा है.

दूसरा घेरा: आरजेडी की रणनीति

दरअसल, जब प्रशांत किशोर की उम्मीदवारी की घोषणा हुई तो राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि कांग्रेस और RJD उन्हें समर्थन दे सकते हैं. लेकिन घटनाक्रम तेजी से बदला और राजद ने न सिर्फ साझा उम्मीदवार की संभावना से दूरी बनाई, बल्कि रेखा गुप्ता को मैदान में उतार दिया. इस फैसले ने चुनाव को बहुकोणीय बना दिया. ऐसे में यहीं से सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल पैदा होता है. क्या RJD का लक्ष्य भाजपा को हराना है या विपक्ष के भीतर उभर रहे नए राजनीतिक विकल्प को सीमित करना? इस पर राजनीति के जानकारों की अलग-अलग राय है, लेकिन इतना तय है कि इस फैसले ने प्रशांत किशोर की राह आसान नहीं रहने दी है.

तीसरा घेरा: विपक्षी वोटों का बंटवारा

दरअसल, इसके पीछे इस शहरी विधानसभा सीट का समाजिक और राजनीतिक ताना-बाना ऐसा है कि पीके के लिए परिदृश्य बदलता दिख रहा है. क्योंकि, बांकीपुर का चुनाव केवल जातीय समीकरणों से तय नहीं होता. यहां शहरी मतदाता, व्यापारी वर्ग, कायस्थ, वैश्य, ब्राह्मण और अन्य उच्च तथा मध्यवर्गीय समुदायों का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक माना जाता है. दूसरी ओर, आरजेडी का पारंपरिक MY (मुस्लिम-यादव) आधार भी यहां मौजूद है. ऐसे में यदि विपक्षी वोट तीन हिस्सों में बंटते हैं तो उसका सीधा लाभ भाजपा को मिलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. चुनावी राजनीति की यही संभावना ही राजद के फैसले को राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है.

चौथा घेरा: प्रशांत किशोर की राजनीतिक परीक्षा

प्रशांत किशोर अब तक दूसरों को चुनाव जिताने की रणनीति बनाते रहे हैं. यह उनका पहला प्रत्यक्ष चुनाव है. 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद बांकीपुर उपचपनाव में यदि वे अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो जन सुराज को बिहार की विपक्षी राजनीति में नई वैलिडिटी (वैधता) मिलेगी. पीके के लिए एक नया बूस्ट (हौसला बढ़ाने वाला) होगा. लेकिन यदि परिणाम उम्मीद से कमजोर रहता है तो विरोधियों को यह कहने का एक और बड़ा अवसर मिल जाएगा कि चुनावी रणनीति बनाना और जनाधार वाली सक्रिय राजनीति में सफल होना, दोनों अलग-अलग चीजें हैं.

तेजस्वी यादव का ‘सख्त’ मगर सटीक राजनीतिक दांव

दूसरी ओर इस पूरे घटनाक्रम में नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने बेहद परिपक्व और ठंडे दिमाग से फैसला लिया है. तेजस्वी का यह कदम किसी व्यक्तिगत दुश्मनी से नहीं, बल्कि अपनी भविष्य की राजनीतिक जमीन को बचाने की मजबूरी को देखते हुए है. क्योंकि तेजस्वी यादव इस बात को बखूबी समझते हैं कि अगर प्रशांत किशोर पटना की इस वीआईपी सीट से जीतकर विधानसभा पहुंच जाते, तो वह अगले कुछ ही महीनों में खुद को बिहार में विपक्ष का नंबर एक चेहरा साबित करने की रेस में आ जाते. पीके का यह उभार सीधे तौर पर तेजस्वी यादव की आगे की राजनीति और उनके मुख्यमंत्री बनने के सपने के आड़े आता. शायद यही वजह रही कि, राजद ने खुद जीतने के लिए नहीं, बल्कि पीके के बढ़ते कदमों को रोकने के लिए बांकीपुर में अपनी गोटी फिट कर दी.

जातीय समीकरण और बिखराव का सीधा नुकसान

बांकीपुर विधानसभा सीट का सामाजिक और भौगोलिक ढांचा हमेशा से भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के अनुकूल रहा है . यहां का मध्यमवर्गीय, सवर्ण और व्यावसायिक वोटर लंबे समय से बीजेपी का कोर सपोर्टर माना जाता है . ऐसे में बीजेपी विरोधी वोटों को समेटकर ही यहां कोई बड़ा उलटफेर किया जा सकता था . लेकिन राजद के मैदान में आने से अब बीजेपी विरोधी और सत्ता विरोधी (एंटी-इंकंबेंसी) वोट दो फाड़ होना तय हैं . एक तरफ राजद अपने पारंपरिक वोट बैंक को सहेजने की कोशिश करेगी, तो दूसरी तरफ जन सुराज को नए और न्यूट्रल वोटर्स पर निर्भर रहना होगा . वोटों का यह बिखराव सीधे तौर पर बीजेपी के प्रत्याशी की राह को बेहद आसान बना रहा है.

बांकीपुर की लड़ाई अब राजनीतिक साख का सवाल

राजद की ओर से कैंडिडेट का नाम सामने आने के बाद अब माना जा रहा है कि बीजेपी यहां बेहद मजबूत स्थिति में है, जबकि प्रशांत किशोर की जन सुराज दूसरे और राजद तीसरे स्थान पर रह सकती है. भले ही राजद इस दौड़ में पिछड़ जाए, लेकिन उसका मुख्य मकसद पूरा होता दिख रहा है. पीके की हार या उनका दूसरे नंबर पर रह जाना, उनके उस पूरे नैरेटिव को कमजोर कर देगा जिसमें वह खुद को बिहार में लालू यादव और नीतीश कुमार के दौर के बाद का एकमात्र विकल्प बता रहे हैं. पहले ही चुनाव में लगने वाला यह झटका पीके की राजनीतिक साख पर बड़ा सवालिया निशान लगा सकता है.
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