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बंगाल में ‘वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल’ पेश करने तैयारी ……………..

UB India News by UB India News
June 27, 2026
in खास खबर, पश्चिम बंगाल
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बंगाल में BJP सरकार के पहले बजट की 7 बड़ी सौगातें…………………….
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पश्चिम बंगाल दो ऐसे कानून विधानसभा में पेश करने जा रही है, जिससे राज्य में हिंसक घटनाएं और समाज विरोधी गतिविधियों को लेकर होने वाली पुलिसिया कार्रवाई काफी हद तक बदल जाएगी. पुलिस प्रशासन के लिए ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई करना आसान हो जाएगा, जिसे वह सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए खतरा मानेगी. दोनों ही बिलों का मकसद पश्चिम बंगाल में संगठित अपराध, जबरन वसूली, सार्वजनिक अव्यवस्था, अवैध खनन और प्राकृतिक संसाधनों की तस्करी पर रोक लगाना है.

शुभेंदु सरकार ‘वेस्ट बंगाल पब्लिक सेफ्टी एंड कंट्रोल ऑफ एंटी-सोशल एक्टिविटीज बिल’ के तहत सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा के लिए खतरा माने जाने व्यक्ति को बिना ट्रायल 12 महीने तक एहतियातन हिरासत मे रख सकती है. वहीं, वेस्ट बंगाल मेंटनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर बिल के तहत हिंसा और दंगे की स्थिति में नुकसान की भरपाई के लिए अपराधी की संपत्ति की नीलामी का अधिकार प्रशासन को दिया जाएगा.

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NCRB 2024 के डेटा के मुताबिक, बंगाल में साल 2024 के दौरान हत्या के 1,467 मामले सामने आए. इस दौरान महिलाओं के खिलाफ 38,112 हुए. किडनैपिंग के 22,530 मामले रिकॉर्ड किए गए. 34,000 से अधिक हिंसक अपराधों की पुष्टि की गई.वहीं, शांति भंग के 5,800 से अधिक मामले सामने आए. हालांकि, एनसीआरबी ने कोलकाता को देश का चौथा सबसे सुरक्षित शहर जरूर घोषित किया है.

मुख्य बातें

  • हिंसक घटनाओं में संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने वालों से लिया जाएगा मुआजवा
  • मुआवजा वसूली पर क्लेम कमीशन का फैसला अंतिम माना जाएगा
  • हिरासत में लिए गए लोगों की अर्जियों की समीक्षा के लिए बनाई जाएगी एडवायजरी बोर्ड

किसे माना जाएगा समाज विरोधी गतिविधि?

24 जून को कोलकाता गजट के एक विशेष अंक में प्रकाशित कॉपी में समाज विरोधी गतिविधियों को परिभाषित भी किया गया है. बिल में समाज-विरोधी गतिविधि का मतलब ऐसी किसी भी हरकत से है, जिससे लोगों में सीधे तौर पर घबराहट, खतरा, डर या असुरक्षा पैदा हो, जान-माल को बड़ा खतरा, सार्वजनिक व्यवस्था में गड़बड़ी हो, व्यापार, कारोबार या पेशे में बाधा आए,किसी व्यक्ति को उसकी चल या अचल संपत्ति से गैर-कानूनी तरीके से बेदखल किया जाए.

सार्वजनिक और निजी संपत्ति को भारी नुकसान या क्षति पहुंचाने, खनन, पत्थर निकालने रेत निकालने, वन उपज या वन्यजीवों से जुड़ी कोई भी ऐसी गैर-कानूनी गतिविधि जिससे सरकारी खजाने को भारी नुकसान हो, उसको भी समाज विरोधी गतिविधि में शामिल किया गया है.

बिल में गुंडा किसे बताया गया है?

बिल में ऐसे अपराधियों को गुंडा कहा गया है, जो जो किसी ग्रुप, गैंग या सिंडिकेट का सदस्य या लीडर हो, जिस पर पहले भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 111 (ऑर्गनाइज्ड क्राइम) या धारा 112 (छोटे स्तर का ऑर्गनाइज्ड क्राइम) के तहत चार्जशीट दायर की गई हो

ऐसे लोगों को गुंडा की श्रेणी में रखा गया है, जिसने आर्म्स एक्ट, एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट, इमोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट या नारकोटिक ड्रग्स या साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट के तहत दंडनीय अपराध किया हो या करने की कोशिश की हो.नोटिफिकेशन में कहा गया है कि इस एक्ट के तहत जारी और धारा 10 के तहत कन्फर्म किए गए डिटेंशन ऑर्डर के आधार पर किसी व्यक्ति को ज़्यादा से ज़्यादा 12 महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है.

राज्य सरकार कभी भी डिटेंशन ऑर्डर में कर सकती है बदलाव

बिल के नोटिफिकेशन के मुताबिकराज्य सरकार किसी भी समय डिटेंशन ऑर्डर को रद्द या उसमें बदलाव कर सकती है. डिटेंशन ऑर्डर रद्द होने या उसकी अवधि खत्म होने के बाद भी उसी व्यक्ति के खिलाफ नया डिटेंशन ऑर्डर जारी किया जा सकता है. अगर रिहाई के बाद वह फिर से असामाजिक गतिविधियों में शामिल पाया जाता है या अगर ऐसी उचित आशंका हो कि वह असामाजिक गतिविधियों में शामिल हो सकता है, तो फिर से उसके खिलाफ डिटेंशन ऑर्डर जारी किया जा सकता है.

मुआवजा वसूलने के लिए बनाया जाएगा क्लेम कमीशन

वेस्ट बंगाल मेंटेनेंस ऑफ पब्लिक ऑर्डर (अमेंडमेंट) बिल, 2026 के तहत ऐसे लोगों से मुआवजा वसूलने का प्रस्ताव है, जो किसी गैर-कानूनी जमावड़े, दंगे, सार्वजनिक अशांति, विरोध-प्रदर्शन या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली अन्य गड़बड़ी के दौरान सार्वजनिक या निजी संपत्ति में तोड़फोड़ के दोषी पाए जाते हैं. बिल में अलग-अलग जगहों पर क्लेम कमीशन बनाने का प्रस्ताव है.

क्लेम कमीशन का फैसला अंतिम फैसला होगा

नोटिफिकेशन में कहा गया है कि क्लेम कमीशन का हर फैसला अंतिम होगा. उसके फैसले के खिलाफ किसी भी अदालत में अपील नहीं की जा सकेगी. बिल में हिरासत में लिए गए लोगों की अर्जियों की समीक्षा के लिए एक या ज़्यादा तीन-सदस्यीय एडवाइज़री बोर्ड बनाने का प्रस्ताव भी दिया गया है.हर बोर्ड की अध्यक्षता हाई कोर्ट के मौजूदा या रिटायर्ड जज करेंगे और उसमें दो ऐसे सदस्य होंगे जो हाई कोर्ट के जज बनने के योग्य हों.

नोटिफिकेशन में कहा गया है कि जब तक इजाज़त न हो, कोई वकील एडवाइज़री बोर्ड के सामने हिरासत में लिए गए व्यक्ति का पक्ष नहीं रख सकता. बोर्ड की कार्यवाही, उसकी राय को छोड़कर, गोपनीय रहेगी. अगर तीनों सदस्य सहमत नहीं होते हैं, तो बहुमत की राय मान्य होगी.

यूपी, तमिलनाडु. गुजरात और महाराष्ट्र में भी है ऐसा बिल

उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्यों में इस तरीके के बिल पहले से ही लागू हैं. बिल्कुल इसी तरह ‘उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ़ ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम एक्ट, 2017’ ज़मानत देने पर रोक लगाता है. न्यायिक रिमांड को 90 दिनों से बढ़ाकर 180 दिन करने की इजाज़त देता है. गुजरात में, ‘कंट्रोल ऑफ टेररिज़्म एंड ऑर्गेनाइज़्ड क्राइम एक्ट 2015’ प्रिवेंटिव डिटेंशन के साथ-साथ इंटरसेप्ट की गई टेलीफ़ोन बातचीत को अदालत में स्वीकार्य सबूत के तौर पर पेश करने की इजाज़त देता है.

तामिलनाडू में भी इसी तरह का बिल है, जिसे आम तौर पर ‘गुंडाज़ एक्ट’ कहा जाता है. यह बिल भी बिना ट्रायल के एक साल तक प्रिवेंटिव डिटेंशन की इजाजत देता है.वहीं, महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ़ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट, 1999′ संदिग्धों को जांच के दौरान अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करने की इजाज़त नहीं देता है और डिटेंशन का अधिकार देता है.

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