वैश्विक तेल बाजार इस समय भारी अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है. पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, खासकर ईरान युद्ध से जुड़े हालात ने कच्चे तेल की कीमतों को लेकर नई आशंकाएं पैदा कर दी हैं. लैरी फ्रैंक जैसे बड़े वित्तीय दिग्गज भी चेतावनी दे चुके हैं कि अगर तेल 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया तो यह वैश्विक मंदी का कारण बन सकता है. लेकिन इस पूरे संकट के बीच एक देश ऐसा है जो अपेक्षाकृत सुरक्षित नजर आ रहा है. वह चीन. इसके बार में यह भी कहा जा रहा है कि अगर तेल की कीमत 200 बैरल प्रति डॉलर तक पहुंच जाए तो भी ड्रैगन का कुछ नहीं बिगड़ेगा. क्योंकि उसने ऐसे संकट से निपटने की तैयारी काफी पहले कर दी थी.
क्या चीन ने पहले से कर ली थी तैयारी?
हाल के डेटा और विश्लेषणों से संकेत मिलते हैं कि चीन ने इस संभावित तेल संकट के लिए महीनों पहले ही तैयारी शुरू कर दी थी. वर्ष 2025 की शुरुआत से ही चीन ने अपनी जरूरत से कहीं ज्यादा कच्चे तेल का आयात किया. आंकड़ों के मुताबिक जनवरी-फरवरी में ही उसने रोजाना करीब 12.4 लाख बैरल अतिरिक्त तेल स्टोर किए. यह कोई सामान्य व्यापारिक गतिविधि नहीं बल्कि एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है. जब दुनिया के अन्य देश तत्काल जरूरत के हिसाब से खरीद कर रहे थे तब चीन सस्ते दाम पर बड़े पैमाने पर तेल खरीदकर उसका भंडारण कर रहा था.
सस्ता तेल, बड़ा खेल
चीन ने इस दौरान ज्यादातर तेल उन देशों से खरीदा जो पश्चिमी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं. इसमें रूस, ईरान और वेनेजुएला शामिल है. इन देशों से उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार से काफी कम कीमत पर तेल मिला. जब ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 60 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी, तब चीन ने बड़े पैमाने पर ये खरीदारी की. अब जब कीमतें बढ़ रही हैं, तो चीन उसी सस्ते तेल का उपयोग कर रहा है, जिससे उसे भारी लागत लाभ मिल रहा है.
कहां छिपा है ये तेल?
चीन ने पिछले एक दशक में एक विशाल स्टोरेज नेटवर्क तैयार किया है. इसमें सरकारी रणनीतिक भंडार और सरकारी कंपनियों के कमर्शियल टैंक शामिल हैं. ये स्टोरेज भूमिगत गुफाओं से लेकर विशाल टैंक फार्म तक फैले हुए हैं. विशेषज्ञों का अनुमान है कि चीन के पास 1.1 से 1.2 अरब बैरल तक तेल स्टोर करने की क्षमता है और यह क्षमता लगातार बढ़ाई जा रही है.
बाजार पर पकड़ कैसे बनाता है चीन?
चीन सिर्फ तेल खरीदकर स्टोर नहीं करता बल्कि इसे एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है. जब कीमतें कम होती हैं, तो वह भारी खरीदारी करता है. और जब बाजार में आपूर्ति कम होती है तो वह अपने स्टॉक का उपयोग करता है. इस रणनीति का असर यह हुआ है कि 2025-26 के दौरान चीन ने रोजाना 10 लाख बैरल से ज्यादा अतिरिक्त खरीद केवल स्टोरेज के लिए किया. इससे वैश्विक बाजार में एक तरह का बेंचमार्क बन गया और कीमतें गिरने से रुक गईं.
दुनिया के लिए क्यों चिंता का विषय?
अब वैश्विक तेल बाजार सिर्फ ओपेक या पश्चिमी देशों की नीतियों से नहीं चलता, बल्कि चीन की रणनीति भी बड़ा फैक्टर बन चुकी है. अगर चीन अचानक अपने स्टॉक का उपयोग बढ़ा दे और आयात कम कर दे तो बाजार में सप्लाई बढ़ सकती है और कीमतें गिर सकती हैं. वहीं, अगर वह सस्ते तेल की खरीद जारी रखता है तो कीमतों को सपोर्ट मिलता रहेगा. यानी चीन अब डिमांड और सप्लाई दोनों तरफ से बाजार को प्रभावित करने की स्थिति में है.
क्या ईरान संकट की पहले से थी भनक?
यह कहना मुश्किल है कि चीन को ईरान या पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट का सटीक अंदाजा था या नहीं. लेकिन इतना जरूर है कि उसने वैश्विक अनिश्चितता को भांप लिया था. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अहम समुद्री रास्तों पर बढ़ते खतरे, सप्लाई चेन में रुकावट और भू-राजनीतिक तनाव इन सबको देखते हुए चीन ने समय रहते अपनी रणनीति बदल ली. आज जब दुनिया तेल की बढ़ती कीमतों और संभावित संकट से जूझ रही है, चीन अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में खड़ा है.
अगर हालात और बिगड़ते हैं और तेल 120, 150 डॉलर बैरल या उससे भी ऊपर जाता है, तो बाकी देश जहां महंगे आयात से परेशान होंगे, वहीं चीन अपने पुराने सस्ते स्टॉक का फायदा उठाएगा. यही वजह है कि अब वैश्विक तेल बाजार में ड्रैगन सिर्फ एक उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक निर्णायक खिलाड़ी बन चुका है.