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वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स या ग्लोबल छलावा !

UB India News by UB India News
March 21, 2026
in खास खबर, विशेष रिपोर्ट
0
वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स या ग्लोबल छलावा !
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हर साल की तरह इस साल भी वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स जारी हो चुका है. इसे दुनियाभर में खुशी का पैमाना माना जाता है. लेकिन अक्सर इसके आंकड़े चौंकाते कम और उलझाते ज्यादा हैं. वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 2026 के अनुसार, 147 देशों की लिस्ट में भारत 116वें नंबर पर है. एक तरफ भारत जैसी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, तो दूसरी तरफ कंगाली की दहलीज पर खड़ा पाकिस्तान और युद्ध की आग में झुलस रहे रूस, यूक्रेन, ईरान और इजरायल जैसे देश हैं. लेकिन जब बात खुशी की आती है, तो यह रिपोर्ट इन संकटग्रस्त और बदहाल देशों को भारत से ज्यादा ‘खुशहाल’ बता देती है. भूख, युद्ध और बदहाली के बीच कोई देश कैसे खुश रह सकता है? आखिर इन अजीबोगरीब रैंकिंग्स का गणित क्या है? आइए समझते हैं कि यह हैप्पीनेस इंडेक्स कैसे तैयार होता है और क्यों इसकी विश्वसनीयता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.

रैंकिंग का वो गणित जो समझ से परे है

जब भी यह रिपोर्ट आती है, एक बड़ा विरोधाभास सामने आता है. आर्थिक संकट से जूझ रहे और कर्ज में डूबे पड़ोसी देश, या फिर सालों से मिसाइलों और बम धमाकों के साये में जी रहे देश, इस इंडेक्स में भारत से ऊपर नजर आते हैं. यह स्थिति सोचने पर मजबूर करती है कि क्या खुशी का यह पैमाना वास्तव में जमीनी हकीकत को दिखाता है या यह महज एक ग्लोबल छलावा है? इस सवाल का जवाब इस रिपोर्ट को तैयार करने के तरीके और उसके मानकों में छिपा है.

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किस देश की कौन सी रैंकिंग

देश  रैंकिंग
इजरायल 8
नेपाल 99
पाकिस्तान 104
रूस 108
यूक्रेन 111
भारत 116
ईरान 120

आखिर कैसे बनता है ये इंडेक्स?

वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट 6 फैक्टर पर आधारित होती है. यही फैक्टर किसी भी देश की खुशी का आकलन करते हैं.

  • प्रति व्यक्ति जीडीपी: देश की कुल आर्थिक क्रय शक्ति के आधार पर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति.
  • सोशल सपोर्ट: मुश्किल वक्त में क्या आपके पास कोई ऐसा व्यक्ति या रिश्तेदार है जिस पर आप भरोसा कर सकें?
  • हेल्दी लाइफ एक्सपेक्टेंसी: जन्म के समय एक व्यक्ति के स्वस्थ जीवन जीने की उम्मीद. इसमें शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य शामिल है.
  • जीवन के विकल्प चुनने की आजादी: नागरिक अपने जीवन के अहम फैसले लेने में खुद को कितना स्वतंत्र महसूस करते हैं.
  • उदारता: समाज में दान करने और एक-दूसरे की मदद करने की प्रवृत्ति कितनी है.
  • भ्रष्टाचार की धारणा: देश की सरकार और बिजनेस जगत में भ्रष्टाचार को लेकर आम लोगों का नजरिया क्या है.

कैसे जुटाया जाता है सर्वे का डेटा?

इंडेक्स के मानक सुनने में भले ही तार्किक लगें, लेकिन असली खेल डेटा जुटाने के तरीके में है. यह डेटा मुख्य रूप से गैलप वर्ल्ड पोल के सर्वे पर आधारित होता है. सर्वे में लोगों को 0 से 10 के बीच एक अंक चुनने को कहा जाता है. 0  मतलब उनके जीवन की सबसे खराब स्थिति और 10 का मतलब सबसे बेहतरीन स्थिति होता है. लोगों से पूछा जाता है कि वे खुद को इस समय किस पायदान पर देखते हैं. इसके अलावा जीवन की संतुष्टि, सकारात्मक और नकारात्मक भावनाओं जैसे पिछले दिन कितनी बार हंसे, या कितनी टेंशन हुई को लेकर सवाल पूछे जाते हैं.

सर्वे की विश्वसनीयता पर क्यों उठते हैं सवाल?

वर्ल्ड हैप्पीनेस इंडेक्स के लिए सर्वे में जो सवाल पूछे जाते हैं और जो तरीका है, वो जाहिर तौर पर इसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है. भारत जैसे विशाल और भिन्नाओं वाले देश में ये सर्वे खोखला ही लगता है. इस पर सवाल उठने की चार सबसे बड़ी वजहें हैं.

  1. सैंपल साइज: वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट की ऑफिशियल साइट के अनुसार, सर्वे के लिए हर देश से सालाना तौर पर करीब एक हजार लोगों से बातचीत की जाती है. इन लोगों से फोन कॉल या फेस टू फेस बात होती है. अब सवाल यह है कि 140 करोड़ से ज्यादा आबादी वाले भारत जैसे विविधतापूर्ण देश का मूड क्या महज़ कुछ हजार लोग तय कर सकते हैं? छोटे यूरोपीय देशों के लिए यह सैंपल साइज ठीक हो सकता है, लेकिन भारत जैसे देश के लिए यह ऊंट के मुंह में जीरा है.
  2. किन लोगों से की जाती है बात, इसका भी खुलासा नहीं: गैलप पोल में किन लोगों से सवाल पूछे गए, उनका सामाजिक और आर्थिक बैकग्राउंड क्या था, वे किस शहरी या ग्रामीण इलाके से आते हैं, इसका कोई डेटा सार्वजनिक नहीं किया जाता.
  3. ‘खुशी’ की परिभाषा: पश्चिमी देशों में खुशी का मतलब व्यक्तिगत स्वतंत्रता और भौतिक सुख हो सकता है, जबकि एशियाई देशों खासकर भारत में खुशी अक्सर परिवार, अध्यात्म और सामुदायिक जुड़ाव में खोजी जाती है. 0-10 का पैमाना इस सांस्कृतिक अंतर को कैसे माप सकता है.
  4. विरोधाभासी नतीजे: एक व्यक्ति जो युद्ध क्षेत्र में है, वह महज जिंदा बच जाने पर खुद को 7 रेटिंग दे सकता है. वहीं, एक विकासशील देश का मध्यवर्गीय व्यक्ति महंगाई या ट्रैफिक जैसी रोजमर्रा की समस्याओं से परेशान होकर खुद को 4 रेटिंग दे सकता है. यही कारण है कि युद्धग्रस्त देश रैंकिंग में ऊपर और स्थिर देश नीचे आ जाते हैं.

कुल मिलाकर वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट कुछ देशों के मामले में सही हो सकती है. लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि यह रिपोर्ट पश्चिमी नजरिए से तैयार किए गए एक बेहद सीमित सर्वे पर बनती है. जब तक सर्वे का सैंपल साइज देशों की आबादी के अनुपात में नहीं बढ़ता और सांस्कृतिक विविधताओं को मानकों में जगह नहीं मिलती, तब तक ऐसी रैंकिंग्स जमीनी हकीकत से दूर ही नजर आएंगी.

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