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US-Israel Iran War: शिया-सुन्नी विवाद या ताकत की होड़……………

UB India News by UB India News
March 9, 2026
in अन्तर्राष्ट्रीय, खास खबर, संपादकीय
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US-Israel Iran War: शिया-सुन्नी विवाद या ताकत की होड़……………
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ईरान की मिसाइल्स और ड्रोंस सऊदी अरब को भी टार्गेट कर रहे हैं. सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी बेस पर कई हमले हुए हैं. सऊदी ने कई ईरानी ड्रोन को मार गिराया और ईरान को कड़े शब्दों में चेतावनी भी दी है. अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने कई खाड़ी देशों में अमेरिकी बेस को टार्गेट किया है. ईरानी हमले बताते हैं कि अब मामला सिर्फ अमेरिकी बेस पर टार्गेट करने तक सीमित नहीं है.

इन हमलों के पीछे सऊदी और ईरान की पुरानी रंजिश का भी असर है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सऊदी अरब और ईरान में असल दुश्मनी किस बात की है? यह ताकत की होड़ है या शिया-सुन्नी विवाद?

सऊदी अरब और ईरान में पुरानी रंजिश

सऊदी अरब और ईरान के बीच का विवाद दुनिया के सबसे जटिल और पुराने संघर्षों में से एक है. अक्सर इसे केवल शिया-सुन्नी के धार्मिक चश्मे से देखा जाता है, लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा गहरी है. यह लड़ाई केवल धर्म की नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व इलाके में अपना दबदबा कायम करने की है. सऊदी अरब और ईरान के बीच दुश्मनी के दो मुख्य पहलू हैं. पहला धार्मिक है और दूसरा राजनीतिक. धार्मिक तौर पर, सऊदी अरब खुद को सुन्नी इस्लाम का नेतृत्व करने वाला देश मानता है. दुनिया के सबसे पवित्र स्थल मक्का और मदीना सऊदी अरब में ही हैं.

Mecca

दूसरी ओर, ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया मुस्लिम देश है. साल 1979 की ईरानी क्रांति के बाद, ईरान ने खुद को शिया इस्लाम के रक्षक के रूप में पेश करना शुरू किया. लेकिन जानकारों का मानना है कि यह विवाद धर्म से ज्यादा ताकत की होड़ है. दोनों देश चाहते हैं कि मुस्लिम जगत और तेल से भरपूर इस इलाके में उनकी बात सबसे ऊपर रखी जाए. यह ठीक वैसा ही है जैसे शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच मुकाबला हुआ करता था.

साल 1979 की क्रांति ने रंजिश को नए मुकाम पर पहुंचाया

साल 1979 से पहले सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते इतने खराब नहीं थे. दोनों देशों के अमेरिका के साथ अच्छे संबंध थे. लेकिन 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई. वहां के शाह को गद्दी से हटा दिया गया और अयातुल्ला खुमैनी सत्ता में आए. ईरान की नई सरकार ने राजशाही का विरोध किया. उन्होंने नारा दिया कि इस्लाम में राजाओं के लिए कोई जगह नहीं है. यह बात सऊदी अरब के शाही परिवार के लिए एक बड़ी चुनौती थी. सऊदी अरब को डर लगने लगा कि ईरान अपने क्रांतिकारी विचारों को उनके देश में भी फैला सकता है. यहीं से दोनों के बीच अविश्वास की खाई गहरी होती गई.

Ayahtollah Khomeini

अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमेनी.

दूसरों के मैदान में अपनी जंग लड़ते

सऊदी अरब और ईरान सीधे तौर पर एक-दूसरे से कभी नहीं लड़े. वे अपनी जंग दूसरे देशों की जमीन पर लड़ते हैं. इसे प्रॉक्सी वॉर कहा जाता है. सीरिया, यमन, इराक और लेबनान इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं. यमन में सऊदी अरब वहां की सरकार का साथ दे रहा है. वहीं ईरान हुती विद्रोहियों की मदद कर रहा है. इस जंग ने यमन को पूरी तरह तबाह कर दिया है. सीरिया में भी यही कहानी है. ईरान वहां के राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन करता है, जबकि सऊदी अरब ने विद्रोही गुटों की मदद की है. इन देशों में होने वाली हिंसा के पीछे कहीं न कहीं इन दो महाशक्तियों की आपसी रंजिश है. वे चाहते हैं कि इन देशों में ऐसी सरकारें रहें जो उनके इशारों पर चलें.

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अमेरिका और इजराइल फैक्टर भी एक महत्वपूर्ण कारण

इस दुश्मनी में बाहरी देशों की भूमिका भी बहुत बड़ी है. सऊदी अरब दशकों से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है. अमेरिका को सऊदी अरब से तेल मिलता है और सऊदी को अमेरिका से आधुनिक हथियार. दूसरी तरफ, ईरान और अमेरिका के रिश्ते 1979 के बाद से ही बेहद खराब हैं. अमेरिका ने ईरान पर कई कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं. इजरादल भी इस समीकरण का एक अहम हिस्सा है. ईरान इजराइल को अपना कट्टर दुश्मन मानता है. इसी वजह से हाल के वर्षों में सऊदी अरब और इजराइल के बीच नजदीकियां बढ़ी हैं, क्योंकि दोनों का एक जानी दुश्मन ईरान है.

Oil

$115 के पार निकला कच्चा तेल

तेल और अर्थव्यवस्था की लड़ाई

सऊदी अरब और ईरान दोनों ही तेल के बड़े उत्पादक हैं. तेल की कीमतों को लेकर भी दोनों के बीच अक्सर खींचतान रहती है. सऊदी अरब चाहता है कि तेल का बाजार उसकी मर्जी से चले. ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ज्यादा से ज्यादा तेल बेचना चाहता है. जब भी ईरान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगते हैं, सऊदी अरब को फायदा होता है. जब ईरान बाजार में वापस आता है, तो सऊदी अरब की चिंता बढ़ जाती है. यह आर्थिक वर्चस्व की लड़ाई भी इस दुश्मनी को हवा देती आ रही है.

क्या दोनों के बीच कभी शांति संभव है?

पिछले कुछ समय में कुछ सकारात्मक बदलाव भी देखे गए हैं. मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच एक समझौता हुआ. दोनों देश अपने दूतावास फिर से खोलने और रिश्तों को सुधारने पर सहमत हुए. यह एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन क्या इससे दुश्मनी खत्म हो जाएगी? इसका जवाब देना मुश्किल है. दोनों देशों के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि उसे भरने में सालों लग सकते हैं. यमन और सीरिया जैसे मुद्दों पर अभी भी दोनों के विचार अलग हैं.

इस तरह यह कहा जा सकता है कि सऊदी अरब और ईरान का विवाद केवल शिया और सुन्नी की लड़ाई नहीं है. यह इलाके का बॉस बनने की जंग है. धर्म का इस्तेमाल अक्सर लोगों की भावनाओं को भड़काने और अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया जाता है. जब तक दोनों देश एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेंगे और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल देना बंद नहीं करेंगे, तब तक मध्य-पूर्व में पूरी तरह शांति आना मुश्किल है. हालिया बातचीत ने एक उम्मीद की किरण जरूर जगाई है. दुनिया को उम्मीद है कि ये दो बड़े देश अपनी दुश्मनी भुलाकर विकास और शांति की राह पर चलेंगे लेकिन ताजा घटनाक्रम यानी रिहायशी इलाकों में मिसाइल का हमला ईरान को सऊदी अरब दे दूर कर सकता है. उसे संयम से काम लेना होगा.

ईरान की मिसाइल्स और ड्रोंस सऊदी अरब को भी टार्गेट कर रहे हैं. सऊदी अरब में स्थित अमेरिकी बेस पर कई हमले हुए हैं. सऊदी ने कई ईरानी ड्रोन को मार गिराया और ईरान को कड़े शब्दों में चेतावनी भी दी है. अमेरिकी हमलों के बाद ईरान ने कई खाड़ी देशों में अमेरिकी बेस को टार्गेट किया है. ईरानी हमले बताते हैं कि अब मामला सिर्फ अमेरिकी बेस पर टार्गेट करने तक सीमित नहीं है.

इन हमलों के पीछे सऊदी और ईरान की पुरानी रंजिश का भी असर है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर सऊदी अरब और ईरान में असल दुश्मनी किस बात की है? यह ताकत की होड़ है या शिया-सुन्नी विवाद?

सऊदी अरब और ईरान में पुरानी रंजिश

सऊदी अरब और ईरान के बीच का विवाद दुनिया के सबसे जटिल और पुराने संघर्षों में से एक है. अक्सर इसे केवल शिया-सुन्नी के धार्मिक चश्मे से देखा जाता है, लेकिन असलियत इससे कहीं ज्यादा गहरी है. यह लड़ाई केवल धर्म की नहीं, बल्कि मध्य-पूर्व इलाके में अपना दबदबा कायम करने की है. सऊदी अरब और ईरान के बीच दुश्मनी के दो मुख्य पहलू हैं. पहला धार्मिक है और दूसरा राजनीतिक. धार्मिक तौर पर, सऊदी अरब खुद को सुन्नी इस्लाम का नेतृत्व करने वाला देश मानता है. दुनिया के सबसे पवित्र स्थल मक्का और मदीना सऊदी अरब में ही हैं.

Mecca

दूसरी ओर, ईरान दुनिया का सबसे बड़ा शिया मुस्लिम देश है. साल 1979 की ईरानी क्रांति के बाद, ईरान ने खुद को शिया इस्लाम के रक्षक के रूप में पेश करना शुरू किया. लेकिन जानकारों का मानना है कि यह विवाद धर्म से ज्यादा ताकत की होड़ है. दोनों देश चाहते हैं कि मुस्लिम जगत और तेल से भरपूर इस इलाके में उनकी बात सबसे ऊपर रखी जाए. यह ठीक वैसा ही है जैसे शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और सोवियत संघ के बीच मुकाबला हुआ करता था.

साल 1979 की क्रांति ने रंजिश को नए मुकाम पर पहुंचाया

साल 1979 से पहले सऊदी अरब और ईरान के रिश्ते इतने खराब नहीं थे. दोनों देशों के अमेरिका के साथ अच्छे संबंध थे. लेकिन 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई. वहां के शाह को गद्दी से हटा दिया गया और अयातुल्ला खुमैनी सत्ता में आए. ईरान की नई सरकार ने राजशाही का विरोध किया. उन्होंने नारा दिया कि इस्लाम में राजाओं के लिए कोई जगह नहीं है. यह बात सऊदी अरब के शाही परिवार के लिए एक बड़ी चुनौती थी. सऊदी अरब को डर लगने लगा कि ईरान अपने क्रांतिकारी विचारों को उनके देश में भी फैला सकता है. यहीं से दोनों के बीच अविश्वास की खाई गहरी होती गई.

Ayahtollah Khomeini

अयातुल्लाह रुहोल्लाह खोमेनी.

दूसरों के मैदान में अपनी जंग लड़ते

सऊदी अरब और ईरान सीधे तौर पर एक-दूसरे से कभी नहीं लड़े. वे अपनी जंग दूसरे देशों की जमीन पर लड़ते हैं. इसे प्रॉक्सी वॉर कहा जाता है. सीरिया, यमन, इराक और लेबनान इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं. यमन में सऊदी अरब वहां की सरकार का साथ दे रहा है. वहीं ईरान हुती विद्रोहियों की मदद कर रहा है. इस जंग ने यमन को पूरी तरह तबाह कर दिया है. सीरिया में भी यही कहानी है. ईरान वहां के राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन करता है, जबकि सऊदी अरब ने विद्रोही गुटों की मदद की है. इन देशों में होने वाली हिंसा के पीछे कहीं न कहीं इन दो महाशक्तियों की आपसी रंजिश है. वे चाहते हैं कि इन देशों में ऐसी सरकारें रहें जो उनके इशारों पर चलें.

अमेरिका और इजराइल फैक्टर भी एक महत्वपूर्ण कारण

इस दुश्मनी में बाहरी देशों की भूमिका भी बहुत बड़ी है. सऊदी अरब दशकों से अमेरिका का करीबी सहयोगी रहा है. अमेरिका को सऊदी अरब से तेल मिलता है और सऊदी को अमेरिका से आधुनिक हथियार. दूसरी तरफ, ईरान और अमेरिका के रिश्ते 1979 के बाद से ही बेहद खराब हैं. अमेरिका ने ईरान पर कई कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं. इजरादल भी इस समीकरण का एक अहम हिस्सा है. ईरान इजराइल को अपना कट्टर दुश्मन मानता है. इसी वजह से हाल के वर्षों में सऊदी अरब और इजराइल के बीच नजदीकियां बढ़ी हैं, क्योंकि दोनों का एक जानी दुश्मन ईरान है.

Oil

$115 के पार निकला कच्चा तेल

तेल और अर्थव्यवस्था की लड़ाई

सऊदी अरब और ईरान दोनों ही तेल के बड़े उत्पादक हैं. तेल की कीमतों को लेकर भी दोनों के बीच अक्सर खींचतान रहती है. सऊदी अरब चाहता है कि तेल का बाजार उसकी मर्जी से चले. ईरान अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ज्यादा से ज्यादा तेल बेचना चाहता है. जब भी ईरान पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगते हैं, सऊदी अरब को फायदा होता है. जब ईरान बाजार में वापस आता है, तो सऊदी अरब की चिंता बढ़ जाती है. यह आर्थिक वर्चस्व की लड़ाई भी इस दुश्मनी को हवा देती आ रही है.

क्या दोनों के बीच कभी शांति संभव है?

पिछले कुछ समय में कुछ सकारात्मक बदलाव भी देखे गए हैं. मार्च 2023 में चीन की मध्यस्थता से सऊदी अरब और ईरान के बीच एक समझौता हुआ. दोनों देश अपने दूतावास फिर से खोलने और रिश्तों को सुधारने पर सहमत हुए. यह एक बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन क्या इससे दुश्मनी खत्म हो जाएगी? इसका जवाब देना मुश्किल है. दोनों देशों के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि उसे भरने में सालों लग सकते हैं. यमन और सीरिया जैसे मुद्दों पर अभी भी दोनों के विचार अलग हैं.

इस तरह यह कहा जा सकता है कि सऊदी अरब और ईरान का विवाद केवल शिया और सुन्नी की लड़ाई नहीं है. यह इलाके का बॉस बनने की जंग है. धर्म का इस्तेमाल अक्सर लोगों की भावनाओं को भड़काने और अपनी राजनीति चमकाने के लिए किया जाता है. जब तक दोनों देश एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करेंगे और एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में दखल देना बंद नहीं करेंगे, तब तक मध्य-पूर्व में पूरी तरह शांति आना मुश्किल है. हालिया बातचीत ने एक उम्मीद की किरण जरूर जगाई है. दुनिया को उम्मीद है कि ये दो बड़े देश अपनी दुश्मनी भुलाकर विकास और शांति की राह पर चलेंगे लेकिन ताजा घटनाक्रम यानी रिहायशी इलाकों में मिसाइल का हमला ईरान को सऊदी अरब दे दूर कर सकता है. उसे संयम से काम लेना होगा.

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