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भारत-अमेरिका व्यापार समझौता, कृषि व डेयरी क्षेत्र के हितों से समझौता नहीं करने के क्या है मायने?

UB India News by UB India News
February 5, 2026
in Breaking News, कारोबार, खास खबर
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अमेरिकी टैरिफ से निपटने के लिए भारत का बड़ा प्लान, 20,000 करोड़ के इस मिशन की तैयारी शुरू
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भारत में कृषि सिर्फ आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि जीवनशैली है व घरेलू अर्थव्यवस्था के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्र है। कृषि एवं पशुपालन से जुड़ी गतिविधियों देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, जो 70 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार देती है। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में कृषि जहां अत्यधिक मशीनीकरण और कॉरपोरेट आधारित है, वहीं भारत में यह जीवनयापन एवं आजीविका का सवाल है।

वैश्विक खाद्य व्यापार का 90 फीसदी से अधिक हिस्सा करीब पांच बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में है, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से आक्रामक मूल्य निर्धारण रणनीतियों का इस्तेमाल किया है। अपने किसानों को भारी सब्सिडी देने वाले विकसित देशों की इन कंपनियों को भारत अगर कृषि आयात शुल्क में छूट देता है, तो देश में सस्ते अनाज और उत्पादों की बाढ़ आ सकती है। इससे भारतीय किसानों की आय और आजीविका पर गंभीर असर पड़ेगा।

ज्यादा बाजार चाहते हैं विकसित देश

भारत अनाज उत्पादन में काफी हद तक आत्मनिर्भर है, जबकि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय संघ जैसे देशों के लिए कृषि एक बड़ा व्यापारिक उद्योग है। बड़े पैमाने पर मशीनी खेती एवं भारी सरकारी सब्सिडी से अमेरिका और अन्य विकसित देश भारत को अपने निर्यात विस्तार के लिए आकर्षक बाजार मानते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, 2024 में अमेरिका का कृषि निर्यात 176 अरब डॉलर का रहा, जो उसके कुल वस्तु निर्यात का करीब 10 फीसदी है।

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इसलिए, संवेदनशील क्षेत्र है कृषि
देश की 50 फीसदी से अधिक आबादी कृषि पर निर्भर है। इसलिए, भारत पूरे कृषि क्षेत्र को संवेदनशील मानता है। विशेष रूप से मुख्य फसलों, दूध और प्रमुख कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क ग्रामीण आजीविका के लिए बेहद अहम हैं।

उच्च शुल्क से मिलता है संरक्षण
भारत का कृषि क्षेत्र फिलहाल मध्यम से ऊंचे शुल्क या आयात शुल्क और नियमों के जरिये संरक्षित है, ताकि घरेलू किसानों को अनुचित प्रतिस्पर्धा से बचाया जा सके। किसी क्षेत्र को खोलने का मतलब आयात प्रतिबंध और शुल्क कम करना होता है। भारत कृषि क्षेत्र की सुरक्षा के लिए शून्य से 150 फीसदी तक का शुल्क लगाता है। अमेरिका भी कुछ कृषि उत्पादों पर ऊंचे शुल्क लगाता है, जैसे तंबाकू पर 350 फीसदी। विशेषज्ञों का कहना है, अमेरिका जटिल नॉन-एड वैलोरेम (एनएवी) शुल्क भी लगाता है, जिससे आयात महंगा हो जाता है। इस तथ्य को व्यापार चर्चाओं में अक्सर नजरअंदाज किया जाता है।

भारत का कृषि निर्यात
मूल्य के आधार पर भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कृषि उत्पादक है, लेकिन वैश्विक कृषि निर्यात में उसकी हिस्सेदारी सिर्फ 2.2 फीसदी है, जो 2000 में 1.1 फीसदी थी। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का कुल कृषि निर्यात बढ़कर 51 अरब डॉलर से अधिक पहुंच गया, जो 2023-24 में 45.7 अरब डॉलर था। इसमें से करीब पांच अरब डॉलर का निर्यात अमेरिका को किया गया।

भारत का लक्ष्य
2024-25 में भारत का कुल निर्यात 437 अरब डॉलर रहा। भारत ने अगले चार वर्ष में कृषि, समुद्री उत्पाद और खाद्य-पेय पदार्थों के संयुक्त निर्यात को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। प्रमुख निर्यात उत्पादों में चाय, कॉफी, चावल, कुछ अनाज, मसाले, काजू, तेल खली, तिलहन, फल और सब्जियां शामिल हैं।

डब्ल्यूटीओ के नियम और भारत
भारत के कृषि शुल्क विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन नहीं करते। नियम सदस्य देशों को खाद्य सुरक्षा एवं ग्रामीण रोजगार से जुड़े संवेदनशील क्षेत्रों की रक्षा की अनुमति देते हैं, जो भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

अमेरिका का कृषि निर्यात-सब्सिडी
भारत को अमेरिका का कृषि निर्यात 2024 में 1.6 अरब डॉलर रहा। प्रमुख निर्यातों में छिलके रहित बादाम (86.8 करोड़ डॉलर), पिस्ता (12.1 करोड़ डॉलर), सेब (2.1 करोड़ डॉलर) और इथेनॉल/एथाइल अल्कोहल (26.6 करोड़ डॉलर) शामिल हैं। व्यापार विशेषज्ञों के मुताबिक, अमेरिका अपने कृषि क्षेत्र को भारी सब्सिडी देता है और पिछले कुछ वर्षों मे यह उत्पादन मूल्य के 50 फीसदी से भी ज्यादा रही है। अमेरिका चावल पर 82 फीसदी, कैनोला पर 61 फीसदी चीनी पर 66 फीसदी, कपास पर 74 फीसदी, मोहायर पर 141 फीसदी व ऊन पर 215 फीसदी सब्सिडी देता है।

क्या है भारत-अमेरिका ऊर्जा गलियारा?

भारत 2047 तक विकसित होने के लक्ष्य के तहत अपनी प्राथमिकताओं को लगातार हासिल करने का प्रयास कर रहा है। इसके लिए ऊर्जा जरूरतें भी बड़ी और अहम प्राथमिकताओं में हैं, क्योंकि भारत के उच्च आर्थिक विकास की महत्वाकांक्षा उसके दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा से गहराई से जुड़ी हुई है। यह बात भारत के ह्यूस्टन में महावाणिज्य दूत डी सी मंजुनाथ ने कही। उन्होंने अमेरिकी उद्योग के साथ संवाद और सहयोग की अहमियत पर जोर दिया। ताकि विश्वसनीय और किफायती ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित हो सके, साथ ही स्वच्छ तकनीकों और नवाचार को बढ़ावा मिले।

कई बड़ी ऊर्जा कंपनियों के प्रतिनिधि हुए शामिल

भारत के महावाणिज्य दूतावास (CGI) ह्यूस्टन ने बुधवार को अपने कार्यालय में अमेरिका-भारत स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिफ फोरम (USISPF) के सहयोग से ‘ग्लोबल एनर्जी आउटलुक 2026’ पर एक उच्च-स्तरीय अमेरिका-भारत ऊर्जा राउंडटेबल का आयोजन किया। यह अहम बैठक बंद कमरे में आयोजित की गई। इसमें वैश्विक ऊर्जा, इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी कंपनियों के 30 से अधिक वरिष्ठ कार्यकारी शामिल हुए, जिनमें ExxonMobil, Chevron, Honeywell, GAIL, Larsen & Toubro, Weatherford, LanzaTech, S&P Global, McKinsey और Society of Petroleum Engineers के प्रतिनिधि शामिल थे। महावाणिज्य दूतावास ने कहा कि यह राउंडटेबल नीति-निर्माताओं और उद्योग नेताओं के बीच साझा ऊर्जा चुनौतियों तथा व्यावसायिक अवसरों पर संवाद के लिए मंच उपलब्ध कराने के उसके निरंतर प्रयासों का हिस्सा है। इसका मतलब भारत की ऊर्जा दक्षता को बढ़ाना है।

आद्यौगिक और विमानन क्षेत्र पर रहा फोकस

यह बैठक फरवरी 2026 में भारत-अमेरिका व्यापार फ्रेमवर्क के बाद हुई, जिसमें ऊर्जा और प्रौद्योगिकी सहयोग को द्विपक्षीय विकास के मुख्य चालकों के रूप में चिह्नित किया गया था। LanzaTech और Honeywell जैसी कंपनियों की भागीदारी से सस्टेनेबल एविएशन फ्यूल और कार्बन रिसाइक्लिंग जैसी तकनीकों में बढ़ती व्यावसायिक रुचि का संकेत मिला, जो भारत के औद्योगिक और विमानन क्षेत्रों के लिए प्रासंगिक हैं। USISPF के अनुसार, चर्चा वैश्विक आपूर्ति-मांग रुझानों, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और नीति फ्रेमवर्क पर केंद्रित रही, जो अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों तथा भारतीय सार्वजनिक-निजी क्षेत्र के बीच गहन व्यावसायिक जुड़ाव को सक्षम बना सकती हैं।

क्या है भारत-अमेरिका ऊर्जा गलियारा?

भारत-अमेरिका ऊर्जा गलियारा एक रणनीतिक और व्यावसायिक संवाद का रूपक है, जो भारत और अमेरिका के बीच ऊर्जा क्षेत्र में बढ़ती सहयोग, व्यापार और निवेश को दर्शाता है। यह कोई भौतिक गलियारा नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला, स्वच्छ ऊर्जा तकनीक और आर्थिक विकास से जुड़े द्विपक्षीय प्रयासों का प्रतीक है। यह अवधारणा हाल के वर्षों में उभरी है, खासकर 2025-2026 में ट्रंप प्रशासन के दौरान भारत-अमेरिका व्यापार समझौते (ट्रेड डील) के बाद, जहां ऊर्जा को द्विपक्षीय विकास का मुख्य चालक माना गया।

इसमें शामिल प्रमुख पहलू:ऊर्जा व्यापार बढ़ाना, अमेरिका से LNG, कच्चा तेल और अन्य ऊर्जा उत्पादों की भारत की खरीद बढ़ाना। अमेरिका भारत के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार बन रहा है, जहां द्विपक्षीय ऊर्जा व्यापार 13-14 अरब डॉलर से अधिक पहुंच चुका है।  भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग (औद्योगिक विस्तार, शहरीकरण और बिजली खपत से) को पूरा करने के लिए अमेरिकी कंपनियां (जैसे ExxonMobil, Chevron, Honeywell) सक्रिय हैं। इसका रणनीतिक उद्देश्य चीन पर निर्भरता कम करना, क्षेत्रीय ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करना और इंडो-पैसिफिक में स्थिरता लाना है।

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