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अब जलवायु परिवर्तन सिर्फ पर्यावरणीय ही नहीं, बल्कि मानवाधिकार का भी मुद्दा बन गया है………….

UB India News by UB India News
August 11, 2025
in खास खबर, पर्यावरण, ब्लॉग
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भारत की अर्थव्यवस्था पर जलवायु परिवर्तन का हो सकता है बड़ा असर…………….
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हाल ही में इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) द्वारा दिया गया ऐतिहासिक फैसला वैश्विक जलवायु न्याय और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है। इसके जरिये यह संदेश दिया गया है कि जलवायु परिवर्तन अब केवल एक वैज्ञानिक या पर्यावरणीय मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह मानवाधिकारों से सीधे जुड़ा मसला बन चुका है।

यह फैसला दक्षिण प्रशांत महासागर के एक छोटे से द्वीपीय देश, वानुअतु द्वारा लाए गए एक मामले के बाद आया है, जिसे बढ़ते समुद्र स्तर से खतरा है और जिसका समर्थन 131 अन्य देशों ने किया है। न्यायालय ने उनकी दलीलों को स्वीकार कर लिया कि विकासशील देशों ने वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में न्यूनतम योगदान दिया है, फिर भी वे विकसित देशों की तुलना में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से ज्यादा प्रभावित हैं। इस फैसले में भविष्य की पीढ़ियों और जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित समुदायों के अधिकारों की बात की गई है, जो पहले बहुत कमजोर ढंग से पेश होते थे। जलवायु परिवर्तन एक अस्तित्वगत संकट है, जो मानवता के भविष्य के लिए खतरा बन सकता है।

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आईसीजे ने पहली बार औपचारिक रूप से स्वीकार किया कि जलवायु परिवर्तन से निपटना सभी देशों की कानूनी जिम्मेदारी है। न्यायालय ने यह साफ कहा कि जो देश वायुमंडल में सबसे अधिक ग्रीनहाउस गैसें छोड़ रहे हैं, वे केवल अपने नागरिकों के नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के पर्यावरणीय और मानवाधिकारों का उल्लंघन कर रहे हैं। यही कारण है कि इस फैसले को एक वैश्विक नैतिक और कानूनी दिशा-निर्देश के रूप में देखा जा रहा है, जिससे उम्मीद है कि विकसित व उच्च उत्सर्जन वाले देश, अब अपनी जलवायु नीतियों में जवाबदेही और न्याय को प्राथमिकता देंगे। विशेष रूप से प्रशांत महासागर में बसे छोटे द्वीपीय देश, जैसे टुवालू, मार्शल आइलैंड्स, किरीबाती आदि जो समुद्र के बढ़ते जल स्तर के कारण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं, इस फैसले को एक नई उम्मीद के रूप में देख रहे हैं।

अब वे इस आधार पर मुकदमा दायर कर सकते हैं कि जलवायु संकट के लिए जिम्मेदार बड़े देश उनकी जिंदगियों और भूमि को खतरे में डाल रहे हैं। अभी दुनिया के लगभग 60 देशों में 3,000 से अधिक जलवायु न्याय से जुड़े मुकदमे लंबित हैं, जिनमें सरकारों और जीवाश्म ईंधन आधारित कंपनियों पर यह आरोप है कि वे जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने में नाकाम रहे हैं। आईसीजे का यह फैसला इन सभी मुकदमों को एक नैतिक और कानूनी बल प्रदान कर सकता है। अदालत ने यह बात भी कही कि जलवायु परिवर्तन से संबंधित समस्याएं मानवाधिकारों को भी प्रभावित करती हैं, विशेषकर स्वास्थ्य, स्वच्छता, खाद्य सुरक्षा, आवास और स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को। यह सोच मानवाधिकारों की आधुनिक परिभाषा को विस्तारित करती है। विडंबना है कि एक ओर पर्यावरण संरक्षण को लेकर वैश्विक अदालतें जागरूक हो रही हैं, दूसरी ओर पर्यावरण की रक्षा करने वाले लोग लगातार खतरे में हैं। वर्ष 2023 में दुनिया भर में कम से कम 196 पर्यावरण रक्षकों की हत्या कर दी गई। इनमें से अधिकतर मामले उन क्षेत्रों से जुड़े हैं, जहां प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, अवैध खनन, वनों की कटाई या औद्योगिक परियोजनाओं का विरोध किया गया था। ‘ग्लोबल विटनेस’ द्वारा हाल ही में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, भारत सहित 20 से अधिक देशों के 200 से अधिक पर्यावरण कार्यकर्ताओं से बातचीत के आधार पर यह सामने आया कि 90 प्रतिशत से अधिक को शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और 25 प्रतिशत से अधिक पर हिंसक हमले हुए। कई कार्यकर्ताओं पर झूठे मुकदमे चलाए गए, उनके संस्थान बंद किए गए, बैंक खातों को सील किया गया और उन्हें ‘राष्ट्रविरोधी’ करार दे दिया गया।

अब खतरे सिर्फ मैदानों और जंगलों तक सीमित नहीं हैं। सोशल मीडिया  के इस दौर में, पर्यावरण कार्यकर्ताओं की निजी जानकारियां साझा करके उन्हें निशाना बनाना आम रणनीति बन चुकी है—जैसा कि फिलीपीन, थाईलैंड और इंडोनेशिया में बार-बार सामने आया है। भारत में भी कार्यकर्ताओं पर यूएपीए जैसे कड़े कानूनों के तहत मुकदमे चलाए गए हैं। यह सच है कि आईसीजे के फैसले की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है, लेकिन इसका नैतिक प्रभाव और वैश्विक दबाव अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि यह फैसला सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया, तो यह एक खोया हुआ अवसर होगा।

अब जरूरी है कि राष्ट्रीय सरकारें अपने जलवायु कानूनों और नीतियों में इस फैसले को शामिल करें और पर्यावरण कार्यकर्ताओं की रक्षा के लिए विशेष कानून बनाएं। इसके अलावा, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन पर कठोर निगरानी और नियंत्रण की व्यवस्था की जाए। आईसीजे का फैसला एक चेतावनी है और एक मौका भी कि हम अपनी गलतियों को सुधारें, और एक न्यायपूर्ण, सुरक्षित और टिकाऊ भविष्य की ओर कदम बढ़ाएं। यदि पृथ्वी सुरक्षित नहीं रहेगी, तो मनुष्य का अस्तित्व भी नहीं।

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