क्या भारत की आंतरिक-बाह्य नीतियां विदेश से प्रभावित हैं? लोकसभा में नेता-प्रतिपक्ष राहुल गांधी का आरोप है कि भारत ने अमेरिकी दबाव में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को स्थगित किया। इस संदर्भ में राहुल का व्यवहार कैसा है? क्या यह सत्य नहीं कि वह अपने विदेश दौरों में अक्सर अमेरिका-यूरोप से भारत में ‘लोकतंत्र बचाने’ की गुहार लगाते हैं? राहुल की ही पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता पाकिस्तान जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने की भी मांग कर चुके हैं। जब राहुल कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी सार्वजनिक रूप से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को झूठा कहें, तो मुझे आश्चर्य होता है। वैश्विक राजनीति कोई किशोरावस्था की तकरार नहीं, जिसमें व्यक्ति क्षणिक आवेश में अपमानजनक या कटु शब्दों का प्रयोग करता हो। इस तरह के गैर-जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा केवल राहुल गांधी से ही की जा सकती है, जिन्होंने वर्ष 2013 में सार्वजनिक रूप से अपनी ही सरकार के एक अध्यादेश को फाड़कर कूड़ेदान में फेंकने की बात कही थी।
वास्तव में, ट्रंप के टैरिफ प्रहार और लंबित व्यापार समझौते पर भारत ने जो निर्भीक रुख अपनाया है, वह राहुल के दावे को पूरी तरह झुठलाता है। जैसे अमेरिका अपने हितों के अनुसार मित्र और शत्रु चुनने हेतु स्वतंत्र है, उसी प्रकार भारत को भी अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर स्वतंत्र निर्णय लेने का पूरा अधिकार है। शीतयुद्ध काल से रूस (तब सोवियत संघ) भारत का भरोसेमंद सहयोगी रहा है। इस ऐतिहासिक संबंध को किस दिशा में और कितनी गहराई तक ले जाना है, यह केवल भारत तय करेगा, कोई अन्य देश नहीं। भारत के इस आत्मविश्वासपूर्ण और स्वायत्त दृष्टिकोण से शेष विश्व, विशेषकर अमेरिका और यूरोप स्तब्ध हैं। दशकों तक भारत की विदेश नीति बाह्य-वैचारिक प्रभाव से संचालित होती रही, जिसके कारण भारत को बार-बार उन देशों के सामने झुकना पड़ा, जो हमारे दूरगामी हितों के विपरीत खड़े थे। वर्षों तक भारत ने फलस्तीन और इस्लामी देशों का समर्थन किया, जबकि वे कश्मीर के मुद्दे पर मजहबी कारणों से पाकिस्तान का साथ देते रहे। जब पाकिस्तान या चीन से भारत का टकराव हुआ, तब भारतीय नेतृत्व अमेरिका-यूरोप से मध्यस्थता की याचना करता दिखा, जिसमें कई बार स्थिति गिड़गिड़ाने तक पहुंच गई थी। वर्ष 1971 के युद्ध में भारत ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त करते हुए पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए थे। इस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को पत्र लिखकर पाकिस्तानी आक्रमण रोकने हेतु संपर्क साधा था। 5 दिसंबर, 1971 को लिखे पत्र में उन्होंने कहा था, ‘इस संकट की घड़ी में भारत सरकार और भारत की जनता आपकी सहानुभूति की आकांक्षी है…आपसे आग्रह है कि आप पाकिस्तान को अकारण आक्रामकता एवं सैन्य दुस्साहस की नीति से तत्काल विरत होने के लिए प्रेरित करें…मैं महामहिम से विनम्र निवेदन करती हूं कि आप पाकिस्तान पर अपने निर्विवाद प्रभाव का उपयोग करें…।’
इंदिराजी का यह रुख उनके पिता पं. नेहरू की परंपरा से ही प्रेरित था। 1962 में भारत को न केवल चीन से अपमानजनक पराजय झेलनी पड़ी, बल्कि हम हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि से भी हाथ धो बैठे। यह सब नेहरूजी की मार्क्स-मैकॉले चिंतन से निकटता और चीन की साम्राज्यवादी मंशा की उपेक्षा का परिणाम था। पंचशील, सुरक्षा परिषद की सदस्यता चीन को सौंपना और ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ जैसे नारे भारत के लिए घातक सिद्ध हुए। उस पर अमेरिका के समक्ष पं. नेहरू की बारंबार मिन्नतों ने भारत की संप्रभुता और आत्मसम्मान को और भी आहत किया।
अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व अधिकारी ब्रूस रीडेल ने अपनी पुस्तक जेएफके फॉरगॉटन क्राइसिस: तिब्बत, द सीआईए एंड द सीनो-इंडियन वार में भारत-चीन युद्ध के समय पं. नेहरू द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी को लिखे गुप्त पत्रों के अंश सार्वजनिक किए हैं। 11–19 नवंबर के बीच हुए पत्राचार में पं. नेहरू ने कहा था, ‘यह संकट केवल भारत का नहीं, समूचे उपमहाद्वीप और एशिया में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के अस्तित्व का प्रश्न है।’ उन्होंने तत्काल हवाई मदद मांगते हुए लिखा— ‘हमें कम से कम 12 स्क्वाड्रन सुपरसोनिक सर्व-मौसमी लड़ाकू विमानों की तत्काल आवश्यकता है। देश में आधुनिक राडार व्यवस्था का पूर्णतः अभाव है। जब तक हमारे सैनिकों को इस हेतु प्रशिक्षण नहीं मिल जाता, तब तक इन विमानों एवं राडार प्रतिष्ठानों का संचालन अमेरिका की वायुसेना के कर्मियों को करना होगा।’ तब पं. नेहरू यह आश्वासन भी देते दिखे कि अमेरिकी बमवर्षक विमानों का उपयोग पाकिस्तान के विरुद्ध नहीं, केवल ‘चीन के विरुद्ध प्रतिरोध हेतु’ किया जाएगा। इन पत्रों की भाषा से स्पष्ट होता है कि पं. नेहरू ने अमेरिका के समक्ष भारत का स्वाभिमान गिरवी रख दिया था।
वर्ष 1965 के युद्ध में जब भारतीय सेना लाहौर तक पहुंच गई थी, तब भारतीय नेतृत्व ने जो कुछ जीता था, उसे अगले वर्ष ताशकंद जाकर सोवियत संघ (रूस) की मध्यस्थता से लौटा दिया। इसका रणनीतिक औचित्य आज तक स्पष्ट नहीं है। क्या इससे पाकिस्तान सुधरा? क्या उसने भारत के प्रति शत्रुभाव छोड़ दिया? ताशकंद में तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्रीजी की रहस्यमयी मौत ने इस समझौते को और भी विवादास्पद बना दिया। ऐसे ही 1960 में पं. नेहरू ने राष्ट्रीय हितों की कीमत पर पाकिस्तान के साथ अव्याहारिक ‘सिंधु जल समझौता’ किया था।
इसी तरह अमेरिकी दबाव में वर्ष 1995 में प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने पोखरण परमाणु परीक्षण टाल दिया था। परंतु 1998 में दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद अटल बिहारी वाजपेयीजी ने अमेरिकी-यूरोपीय प्रतिबंधों की धमकियों को दरकिनार करते हुए सफलतापूर्वक पोखरण परीक्षण किया और भारत परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित हो गया। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत से लड़ाई रोकने को कहा था। मैं प्रत्यक्षदर्शी हूं कि तब अटलजी ने कहा था कि पाकिस्तानी सेना के कारगिल से निकलते ही युद्ध स्वत: समाप्त हो जाएगा। अर्थात-जब तक पाकिस्तानी सेना भारतीय जमीन पर है, युद्ध जारी रहेगा।
विश्व बदल रहा है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अप्रत्याशित व्यवहार से दुनिया सकते में है। वैश्विक संबंधों की सुनामी में भारत ने अपने आत्मसम्मान को अक्षुण्ण रखते और हितों की रक्षा करते हुए अपनी भूमिका को पुनःपरिभाषित किया है। यह अतीत की गलतियों और बंधनों से मुक्ति का एक सुखद और प्रशंसनीय नव दृष्टिकोण है।







