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लेटरल एंट्री पर विरोध करने वालों ने राजनीति तो चमका ली, लेकिन देश को बड़ा नुकसान पहुंचा दिया !

UB India News by UB India News
August 22, 2024
in कानून, खास खबर
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लेटरल एंट्री पर विरोध करने वालों ने राजनीति तो चमका ली, लेकिन देश को बड़ा नुकसान पहुंचा दिया !
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मोदी सरकार ने लेटरल एंट्री से केंद्रीय सचिवालय में होने वाली 45 पदों पर भर्तियां फिलहाल रोक दी हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने लेटरल एंट्री में आरक्षण प्रक्रिया का पालन नहीं करने का मुद्दा उठाया। राहुल के साथ अखिलेश यादव समेत विपक्ष के अन्य नेताओं ने लेटरल एंट्री को दलित-पिछड़ा विरोधी करार दिया। फिर मोदी सरकार में शामिल बिहार की दो पार्टियों जेडीयू और एलजेपी(रामविलास) ने भी आरक्षण के बिना लेटरल एंट्री पर आपत्ति जताई। लोकसभा चुनावों में आरक्षण के मुद्दे पर दलित वोटों का बड़ा हिस्सा गंवा चुकी बीजेपी ने कोई जोखिम लेना ठीक नहीं समझा और तुरंत सरकार ने यूपीएससी से विज्ञापन रद्द करने की अनुशंसा कर दी।

देशहित की जरा भी परवाह नहीं?

फिर तो राहुल गांधी, उनकी पार्टी कांग्रेस समेत विरोध करने वाले नेताओं और दलों में श्रेय लेने की होड़ मच गई। राहुल गांधी ने यहां तक कह दिया कि अब 50% की आरक्षण सीमा खत्म करवाकर रहेंगे ताकि जातियों की आबादी के अनुपात में नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की जा सके। भले ही लेटरल एंट्री से भर्तियों के विज्ञापन की वापसी पर कहा जा रहा हो कि अगर सरकार का इतना जल्दी यूटर्न लेना अपने आप में सबूत है कि वह गलत कर रही थी। हालांकि, सच्चाई यह है कि विरोध करने वालों ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए देशहित की जरा भी परवाह नहीं की। दबाव में सरकार ने भी राजनीतिक नुकसान को तत्काल देशहित की हानि से ऊपर रखा। इस तरह राजनीति जीती, देश हार गया।

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सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेंकने का मकसद

केंद्र सरकार में विभिन्न स्तर के सचिवों के 45 पदों पर भर्तियों के लिए यूपीएससी के जरिए आवेदन मंगाए गए। यूपीएससी ने 17 अगस्त को विज्ञापन में कहा था कि विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञ आवेदन कर सकते हैं। लेटरल एंट्री से चयनित उम्मीदवार की सेवा अवधि तीन वर्ष की या अधिकतम पांच वर्ष की होती है। आरक्षण व्यवस्था के मुताबिक, एससी के लिए प्रति 7 सीटों में एक, एसटी के प्रति 14 सीटों में एक, ओबीसी के लिए प्रति चार सीटों में एक जबकि गरीब सवर्णों के लिए प्रति 10 में से एक सीट आरक्षित होती है। इसलिए अगर किसी पद के लिए कम से कम चार सीटों पर भर्तियां नहीं हैं तो वहां आरक्षण लागू नहीं होगा। यूपीएससी ने 45 पदों पर विज्ञापन निकाला था, लेकिन वो सभी एक श्रेणी के नहीं थे। इस कारण अधिकतर पद अनारक्षित कोटे में चले गए। कोई बताए कि यह आरक्षण प्रक्रिया का उल्लंघन कैसे हुआ? तो स्पष्ट है कि बात आरक्षण के जरिए सामाजिक न्याय देने के बजाय राजनीतिक रोटियां सेंकने की है।

क्या लेटरल एंट्री का विरोध करने वालों ने ये सोचा?

अब इन बिंदुओं पर विचार कीजिए और सोचिए कि लेटरल एंट्री में आरक्षण प्रक्रिया लागू करवाने के पीछे क्या मकसद हो सकता है…
➤ यूपीएससी ने जिन 45 पदों पर भर्तियों का विज्ञापन निकाला था, वो सिर्फ 3 वर्षों के सीमित सर्विस पीरियड के थे।
➤ भारत जैसी तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए डोमेन एक्सपर्ट्स की बहुत ज्यादा जरूरत है। नौकरशाह हर क्षेत्र के एक्सपर्ट हों, ऐसा होता नहीं है। लोग यूपीएससी की परीक्षा से पास करके नौकरशाही में आते हैं। यह एक कॉमन टेस्ट पर आधारित परीक्षा है। फिर नौकरशाहों से प्रशासन के अलावा अन्य क्षेत्रों में एक्सपर्टीज की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
➤ अमेरिका और इंग्लैंड जैसे विकसित देशों में भी लेटरल एंट्री के जरिए सरकार के बाहर से विशेषज्ञों की भर्तियां होती रहती हैं।
➤ भारत में भी कांग्रेस की सरकार में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग और छठे वेतन आयोग ने लेटरल एंट्री से भर्तियों की सिफारिश की थी। बाद में मोदी सरकार में योजना आयोग का नाम नीति आयोग हो गया तो उसने भी इस सिफारिश को दोहराया था।
➤ लेटरल एंट्री से भर्तियां मोदी सरकार ने शुरू नहीं की बल्कि यह प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जमाने से चली आ रही हैं। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने यूपीएससी चेयरपर्सन प्रीति सूदन को लिखी चिट्ठी में आरोप लगाया कि कांग्रेस के जमाने में लेटरल एंट्री के जरिए भाई-भतीजावाद का खूब खेल हुआ।
➤ अगर लेटरल एंट्री की सबसे प्रमुख शर्त काबिलियत होती है। अगर आरक्षण लागू हुआ तो असल मकसद पर ही पानी फिर जाएगा। आरक्षण व्यवस्था के तहत नौकरशाही की पूरी फौज तो पहले सी ही खड़ी होती है, फिर लेटरल एंट्री की जरूरत क्या रह जाएगी?
➤ क्या सिर्फ तीन वर्ष के लिए सिर्फ 45 पदों पर भर्तियों से सामाजिक न्याय के उद्देश्य को झटका लग सकता है?
➤ क्या कोई सामाजिक न्याय को झटका देने के लिए सिर्फ तीन वर्ष के लिए सिर्फ 45 पदों पर भर्तियां करने की साजिश रचेगी?

 

नेहरू काल से हो रही लेटरल एंट्री लेकिन मलवा मोदी पर!

इन प्रश्नों पर विचार करते हुए जरा तीन कृषि कानूनों की वापसी को भी याद कीजिएगा। जिस तरह लेटरल एंट्री सिस्टम कांग्रेस का विचार था, उसी तरह कृषि सुधारों पर भी कांग्रेस पार्टी के चुनावी घोषणा पत्रों में वादे किए गए थे। लेकिन कांग्रेस सरकार में यह संभव नहीं हो पाया तो उसने मोदी सरकार के लाए कानूनों का पुरजोर विरोध किया। आखिरकार किसान आंदोलन के दबाव में आकर मोदी सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े। आज उसका नुकसान किसे हो रहा है- किसानों को या कांग्रेस को? निश्चित रूप से कांग्रेस पार्टी ने राजनीतिक फायदा उठाया और किसान नुकसान में रहे। इसका सीधा असर देश की कृषि अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा जो कृषि कानूनों के लागू होने पर तेज रफ्तार से आगे बढ़ सकती थी।

जातिवादी राजनीति को कहां तक पहुंचाएंगे राहुल गांधी?

राहुल पर जातिवादी राजनीति का सुरूर कुछ ऐसा चढ़ा है कि वो अब कह रहे हैं कि 50% आरक्षण सीमा को भी खत्म करवाएंगे। राहुल चाहते हैं कि देशभर में जाति जनगणना हो ताकि कॉलेजों में नामांकन से लेकर सरकारी नौकरियों तक, आबादी के अनुपात में जातियों को आरक्षण मिले। मतलब मेरिट बैकसीट पर चली जाए और सबकुछ जाति आधारित व्यवस्था से संचालित हो। सोचिए, यही राहुल और उनके सहयोगी नेता कहते हैं कि वो जाति के विरोध में हैं, जाति खत्म होनी चाहिए। हर जगह जाति देखने की कानूनी व्यवस्था लागू करके जाति व्यवस्था को खत्म कैसे किया जा सकता है? पूर्णतः जाति आधारित भर्ती प्रक्रिया से देश को किस क्वॉलिटी के सेवक मिलेंगे और वो देश की प्रगति में कितना योगदान दे सकेंगे?

सामाजिक न्याय की फिक्र या स्तरहीन राजनीति?

सामाजिक न्याय की व्यवस्था हमारे संविधान में की गई है तो निश्चित रूप से इस पर दृढ़ रहना चाहिए, लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं कि मेरिट से तनिक भी समझौता हो। ऐसी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने भी नहीं की थी। लेकिन राजनीति के गिरते स्तर का अंदाजा लगाएं कि जो राहुल गांधी देशभर में जाति जनणगना करवाने पर तुले हैं, उन्हीं की कर्नाटक सरकार जाति जनगणना के आंकड़े आज तक जारी नहीं कर पाई है। क्या नैतिकता यह नहीं कहती है कि राहुल गांधी पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से कहें कि उनकी पिछली सरकार ने जो जाति जनगणना करवाई थी, वो उसके आंकड़े जारी करें?

सारे सवाल राहुल से ही क्यों, नीतीश-चिराग ने भी तो किया विरोध?

आप सोच रहे होंगे कि विरोध तो नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू और चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी(आर) ने भी किया है। ये दोनों तो मोदी सरकार के सहयोगी हैं तो फिर लेटरल एंट्री पर सवाल सिर्फ राहुल गांधी से क्यों? वो इसलिए क्योंकि जब आप एक बार मुद्दा उछाल देते हैं तो दलित-पिछड़े की राजनीति करने वाले हर दल पर दबाव बनता है। सबको वोट बैंक की चिंता होती है। नीतीश हों या चिराग, सबने लोकसभा चुनाव में आरक्षण के मुद्दे का असर देखा है। बीजेपी को उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में इतना बड़ा झटका लगा जिसकी कल्पना उसने क्या विरोधियों ने भी नहीं की होगी। और ऐसा हुआ क्यों? इसलिए क्योंकि कांग्रेस और उसके गठबंधन दलों ने आरक्षण का फायदा उठा रही जातियों के बीच यह प्रचार किया मोदी सरकार तीसरी बार आ गई, वो भी 400 सीटों के साथ तो संविधान बदलकर आरक्षण खत्म कर देगी।

इसलिए लेटरल एंट्री पर राहुल को देना चाहिए जवाब

दूध का जला, छाछ को भी फूंक-फूंक कर पीता है। जिस तरह राहुल गांधी और उनके साथी आरक्षण के हथियार की मारक क्षमता पहचान चुके हैं, उसी तरह इस हथियार की मार से चुनावी मैदान में लहूलुहान हुई बीजेपी और उसके साथी भी समझ चुके हैं कि अब जोखिम लेना मूर्खता होगी। राहुल ने अपनी राजनीति चमकाने के लिए लेटरल एंट्री का मुद्दा उठाया तो जेडीयू-एलजेपी(आर) ने अपनी राजनीति बचाने के लिए। 45 पदों पर भर्तियों का लेटरल एंट्री से विरोध पूर्णतः राजनीतिक है, देशहित का विचार कहीं से भी नहीं।

 

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