बिना किसी तामझाम, पर पूरे जोश-ओ-खरोश के साथ बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने महागठबंधन के साथ रहते विपक्षी गठबंधन की कल्पना को मूर्त रूप दिया था। बाद में कांग्रेस ने गठबंधन की गतिविधियां आगे बढ़ाने की जिम्मेवारी नीतीश से झटक ली थी। कांग्रेस के हाथ कमान आते ही बड़े तामझाम से इंडी अलायंस यानी ‘इंडिया’ बना। कहते हैं कि यह नाम राहुल गांधी की परिकल्पना थी। सुनते हैं, नीतीश कुमार को छोड़ सबने इस नाम को खूब सराहा। बंगाल की सीएम और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी को तो यह नाम बहुत ही भाया था। संभव है कि नामकरण के बहाने कांग्रेस की मंशा राहुल गांधी को विपक्ष का पीएम फेस प्रोजेक्ट करने की रही हो। कांग्रेस अपनी पहली कोशिश में कामयाब हो गई।
विपक्षी एकता की कमान हाथ में लेकर कांग्रेस सुस्त हो गई
कांग्रेस के हाथ कमान जाते ही इंडी अलायंस का काम ठंडा पड़ गया। कांग्रेस पांच राज्यों के चुनाव में व्यस्त हो गई। तीन महीने तो इंडी अलायंस का कोई काम ही नहीं हुआ। नीतीश नाराज होते रहे। मन की भड़ास कांग्रेस पर उतारते रहे। नीतीश कुमार की अपेक्षा थी या नहीं, पर जिस तरह उन्हें संयोजक बनाने की बात मीडिया में उठती रही, उससे उनको उम्मीद तो जरूर बंधी होगी। यह काम उनके इंडी अलायंस से अलग होने तक अधूरा रहा। लंबे इंतजार और अपनी नाराजगी का इजहार करने के बाद नीतीश को अंत में संयोजक बनाने का प्रस्ताव कांग्रेस की ओर से आया, पर ममता की असहमति का उद्गोष भी राहुल गांधी ने कर दिया। किसी भी गैरतमंद व्यक्ति को इस स्थिति में तो शायद ही यह स्वीकार होता। नीतीश ने भी स्वाभिमान का दिखाया और पद लेने से मना कर दिया। उन्होंने न सिर्फ यह पद लेने से इनकार कर दिया, बल्कि अगले ही कुछ दिनों में अलायंस से अपने को अलग भी कर लिया।
शहर दर शहर बैठक होती रही, पर नतीजा ढाक के तीन पात
नीतीश की ताकत को पहचानने में कांग्रेस ने बड़ी भूल कर दी
ममता बनर्जी इंडी अलायंस की कद्दावर नेता हैं। उनकी कद का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि नीतीश कुमार को संयोजक बनाने पर आपत्ति का कांग्रेस ख्याल रखने लगी थी। नीतीश नारजागी नहीं जताते तो कांग्रेस ममता का नाम उजागर करने से भी परहेज करती। नीतीश विपक्षी गठबंधन के लिए तरकश के तीर की तरह थे। एनडीए के साथ लंबा वक्त गुजारने के कारण नीतीश को भाजपा की ताकत और कमजोरी के बारे में दूसरों से बेहतर पता था। इससे भी बढ़ कर नीतीश की उपलब्धि विपरीत ध्रुव के नेताओं को एक मंच पर लाने की थी। इससे भी आगे नीतीश तब निकल गए, जब उन्होंने बिहार में जाति सर्वेक्षण करा लिया और आरक्षण देकर विपक्ष के हाथ राष्ट्रीय स्तर पर जाति सर्वेक्षण और आरक्षण का मुद्दा दे दिया। कांग्रेस चाहती तो नीतीश की मदद से काम निकाल लेती, लेकिन चूक गई। चूक गई या ममता के बहाने कांग्रेस की यह कोई साजिश थी कि नीतीश के कद को बढ़ने ही नहीं दिया जाए। नीतीश कह चुके थे कि वे पीएम फेस नहीं बनेंगे, फिर भी उन्हें सयोंजक बनाने में ममता की आपत्ति के बहाने विलंब किया गया।
ममता के लिए कांग्रेस ने नीतीश को गंवाया, हासिल कुछ नहीं
हालांकि उनके संयोजक बनने में ममता बाधक हैं, यह बता कर कांग्रेस ने एक तीर से दो निशाने साधे। कोई यह दोष भी न मढ़े कि नीतीश को संयोजक पद का आफर नहीं दिया गया और दूसरा कि ममता इसी बहाने एक्सपोज हो जाएं। ममता ने अगर बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में सिर्फ दो ही सीटें कांग्रेस को देना चाहती हैं तो इसी से समझ लेना चाहिए कि कांग्रेस की मंशा पूरी करने में वे कभी मददगार नहीं हो सकतीं। कांग्रेस को शायद इस बात का अनुमान था। इसीलिए पार्टी ने चुप्पी साधने में ही भलाई समझी। वाम दल तो बंगाल में ममता को फूटी आंख भी नहीं सुहाते। अब तो ममता यह भी कहने लगी हैं कि उनकी पार्टी टीएमसी सभी लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी। यानी ममता के लिए नीतीश जैसे कुशल सांगठनिक क्षमता के व्यक्ति को गंना कर कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं आया। इंडी अलायंस में फूट का परसेप्शन बना, वह नुकसान अलग है।
यूपी में अखिलेश, पंजाब में आप की कांग्रेस से नहीं पट रही है
यूपी में समाजवादी पार्टी के अखिलेश के तेवर का तो उसी समय पता चल गया था, जब मध्य प्रदेश में सीटों की साझीदारी की उन्होंने बात की और कांग्रेस ने उनकी बात अनसुनी कर दी। उल्टे कमलनाथ ने उनके लिए ‘अखिलेष-वखिलेश‘ संबोधन उचार कर रही सही कसर भी पूरी कर दी। तब के तिलमिलाए अखिलेश कांग्रेस को अब आंख दिखा रहे हैं। कुल 80 में 10 से अधिक लोकसभा सीटें वे कांग्रेस के लिए नहीं छोड़ना चाहते। वैसे उनकी (अखिलेश की) तैयारी तो सभी 80 सीटों पर है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच दिल्ली में सीट बंटवारा हो भी जाए, पर पंजाब में पहले ही किसी समझौते से पार्टी ने मना कर दिया है। सब साथ हैं, पर सबकी तैयारी सभी सीटों को ध्यान में रख कर हो रही है।
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2019 में भी सीटों के सवाल पर ही टूटी थी विपक्ष की गोलबंदी
पिछले लोकसभा चुनाव (2019) में इसी तरह की विपक्षी गोलबंदी हुई थी। तब टीडीपी के नेता और आंध्र प्रदेश के सीएम चंद्रबाबू नायडू ठीक नीतीश कुमार की तरह सक्रिय हुए थे। वे तो तब तक गठबंधन के साथ अड़े रहे, जब तक गठबंधन की गांठें खुल कर छितरा नहीं गईं। नीतीश इस मामले में समझदार निकले। उन्होंने अंदेशे का आभास होते ही पाला पदल लिया। खैर, तब की विपक्षी राजनीति के परिदृश्य को याद करें तो अभी बने ‘इंडिया’ यानी इंडी अलायंस की स्थिति में कोई फर्क नजर नहीं आता। उसकी परिकल्पना भी नायडू ने चुनाव के साल भर पहले यानी 2018 में की थी और इस बार भी ‘इंडिया’ की योजना साल भर पहले यानी 2023 में ही बनी। तब सीपीएम लीडर सीताराम येचुरी और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी आसपास बैठने में संकोच करते थे। एक मौके पर तो दोनों के बीच की कश्मकश देख कर एनसीपी प्रमुख शरद पवार को बीच-बचाव भी करना पड़ा था। यानी उन्हें दोनों के बीच की कुर्सी पर आसन जमाना पड़ा। सीटों के सवाल पर ही तब भी गठबंधन टूटा था और इस बार यही आधार बने तो कोई आश्चर्य नहीं।
अब उद्धव भी डांवाडोल
‘मैं मोदीजी को बताना चाहता हूं कि हम कभी भी आपके दुश्मन नहीं थे। आज भी हम दुश्मन नहीं हैं। हम आपके साथ थे। हमने पिछली बार आपके लिए प्रचार किया था।’
उद्धव ठाकरे ने सोमवार को ये बात कही। पिछले हफ्ते नीतीश कुमार के BJP के साथ मिलने के बाद उद्धव के सुर भी बदले नजर आ रहे हैं। पिछले 10 दिनों में विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. को 4 बड़े झटके लगे थे, पांचवां झटका उद्धव ठाकरे ने मोदी की तारीफ करके दे दिया है।
I.N.D.I.A. को हाल ही में कौन-से झटके मिले, इनका कितनी सीटों पर असर होगा और इन झटकों ने कैसे साफ किया BJP का रास्ता…
पहला झटका: ममता बनर्जी अकेले चुनाव लड़ेंगी, 42 सीटों पर फिर बंटवारे की झंझट
I.N.D.I.A. को झटके की शुरुआत TMC प्रमुख और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के फैसले से हुई थी। 24 जनवरी को उन्होंने अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया था।
जून 2023 में I.N.D.I.A. की पहली बैठक हुई थी, जिसमें कांग्रेस ने वेस्ट बंगाल में 10-12 सीटों की मांग की थी। ममता बनर्जी केवल दो सीटें बरहामपुर और मालदा दक्षिण देने को तैयार थीं। ये वो सीटें थीं जो कांग्रेस ने 2019 के चुनाव में जीती थीं।
पश्चिम बंगाल के अखबार संगबाद प्रतिदिन के एसोसिएट एडिटर किंगशुक प्रमाणिक कहते हैं कि ममता बनर्जी CPM को हराकर बंगाल में जीतती रही हैं। CPM उनका मुख्य दुश्मन है।
वो गठबंधन में CPM के साथ कम्फर्टेबल नहीं थीं। ऐसे में ममता ने अकेले लड़ने का फैसला लिया।
वेस्ट बंगाल में I.N.D.I.A. गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती भाजपा को रोकने की है। ममता ने आधिकारिक तौर पर I.N.D.I.A. नहीं छोड़ा है, वो इस गठबंधन की बड़ी नेता हैं।
I.N.D.I.A. के सामने कोई ऑप्शन नहीं है। भाजपा को रोकने के लिए ममता को अकेले लड़ने देना होगा। यदि ऐसा नहीं होता है तो सबसे पहले सीटों पर बंटवारे का झगड़ा होगा। किसी पार्टी को तैयारी का समय नहीं मिलेगा। इसका सीधा फायदा भाजपा को होगा।
दूसरा झटका: नीतीश कुमार पलटे, अब सीटों को लेकर RJD और कांग्रेस में ठनेगी
पिछले जून में पटना में बिहार के CM नीतीश कुमार के आधिकारिक बंगले पर I.N.D.I.A. के 27 दलों की पहली बैठक हुई थी। नीतीश की अगुआई में ये गठबंधन आगे बढ़ रहा था। नीतीश को I.N.D.I.A. गठबंधन से PM पद की उम्मीदवारी का दावेदार माना जा रहा था।
अचानक 27 जनवरी को नीतीश के I.N.D.I.A. छोड़ने की खबरें आईं। अगले दिन नीतीश ने 28 जनवरी को फिर से CM पद की शपथ ली, लेकिन NDA के CM के तौर पर।
दैनिक भास्कर डिजिटल बिहार के स्टेट एडिटर प्रवीण वर्मा कहते हैं कि I.N.D.I.A. गठबंधन से अचानक नीतीश कुमार का अलग होना बहुत बड़ा डेंट है। नीतीश ही गठबंधन के सूत्रधार थे।
भाजपा यह बात अच्छे से समझ चुकी थी कि अगर नीतीश को निकाल लिया तो इंडिया गठबंधन की ताकत बिखर जाएगी, यही हुआ भी।
नीतीश के जाने के बाद अब I.N.D.I.A. गठबंधन में सीट शेयरिंग में बड़ा पेंच फंस गया है। नीतीश के बाद अब लालू बिहार में अलायंस की ड्राइविंग सीट पर हैं, वह अपने हिसाब से कांग्रेस को दबाएंगे।
JDU के हिस्से की सीटों पर भी वह अपने हिसाब से कैंडिडेट्स उतारने की तैयारी में हैं।
RJD कभी नहीं चाहेगी कि कांग्रेस ज्यादा सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़े। RJD 20 से अधिक सीटों पर अपने कैंडिडेट्स उतारना चाहती है। उधर कांग्रेस नेशनल पार्टी होने के कारण RJD को ज्यादा सीट नहीं देना चाहेगी। ऐसे में सीटों के बंटवारे को लेकर विवाद हो सकता है।
तीसरा झटका: हेमंत सोरेन गिरफ्तार, 14 सीटों पर जीत का रणनीतिकार सलाखों के पीछे
I.N.D.I.A. को तीसरा झटका 30 जनवरी को लगा जब झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से ED ने पूछताछ की। शाम होते-होते ये कन्फर्म हो गया कि ED उन्हें गिरफ्तार करने वाली है। उन्हें इस्तीफा देना होगा। अगले दिन 31 जनवरी को हेमंत सोरेन ने इस्तीफा दे दिया और ED ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
झारखंड की राजनीति पर पैठ रखने वाले पत्रकार आनंद दत्त कहते हैं कि इस राज्य में I.N.D.I.A. हेमंत सोरेन के भरोसे था। उसे पता था कि हेमंत सोरेन के साथ स्मूदली सीटों का बंटवारा हो जाएगा, लेकिन हेमंत की गिरफ्तारी से I.N.D.I.A. गठबंधन को नए सिरे से डील करनी होगी। यहां कुल 14 लोकसभा सीटें हैं। सोरेन की गिरफ्तारी से पहले कांग्रेस 9 सीटें मांग रही थी।
अनुमान था कि JMM और कांग्रेस में 50-50 का बंटवारा हो जाता। अगर RJD डिमांड करती तो कोई भी अपने खाते से उसे एक सीट देगा। अब JMM के सामने चुनौती ये है कि वह किसके फेस पर चुनाव लड़ेगी। ऐसे में लगता है कि कांग्रेस की मुराद पूरी हो जाएगी। वह 9 सीटों पर लड़ सकती है। हालांकि यहां JMM सत्ता में है। ऐसे में टिकट बंटवारे को लेकर विवाद जरूर होगा।
चौथा झटका : बहुमत होने के बाद भी चंडीगढ़ मेयर का चुनाव हार गया I.N.D.I.A.
पहली बार I.N.D.I.A. गठबंधन मिलकर चुनाव लड़ रहे थे। जानकार मान रहे थे कि ये इस गठबंधन की पहली परीक्षा है। कांग्रेस और आप के पास अपना मेयर बनाने के लिए पर्याप्त नंबर थे। फिर भी पहली परीक्षा में गठबंधन फेल हो गया।
चंडीगढ़ नगर निगम में कुल 35 पार्षद हैं और एक सांसद का वोट है। इस तरह कुल 36 वोट हैं। जीत के लिए 19 वोट चाहिए। चंडीगढ़ नगर निगम में BJP के 14, आम आदमी पार्टी के 13, कांग्रेस के 7 और एक पार्षद शिरोमणि अकाली दल का है।
चंडीगढ़ मेयर चुनाव में वहां सांसद को भी वोटिंग का अधिकार है। BJP सांसद किरण खेर के वोट को भी जोड़ लें तो BJP की ताकत 15 वोट है। आप और कांग्रेस की ताकत 20 वोट की है। जीत I.N.D.I.A. गठबंधन की तय दिख रही थी, लेकिन BJP जीत गई।
BJP मेयर कैंडिडेट के पक्ष में 16 वोट पड़े। कांग्रेस-आप के जॉइंट कैंडिडेट के पक्ष में 20 वोट पड़े। दरअसल कांग्रेस-आप के 8 वोट रिजेक्ट हो गए यानी कम हो गए। इस तरह भाजपा जीत गई।
कांग्रेस-आप ने इस चुनाव के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका खारिज होने के बाद सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है।
दैनिक भास्कर डिजिटल पंजाब के स्टेट एडिटर रोहित चौधरी कहते हैं कि पंजाब में I.N.D.I.A. के बैनर तले आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के एक साथ मिलकर लोकसभा चुनाव लड़ने की संभावना लगभग न के बराबर है। इसका मुख्य कारण ये है कि 6 मार्च 2022 को पंजाब की सत्ता संभालने के बाद मुख्यमंत्री भगवंत मान की अगुआई वाली AAP सरकार ने कांग्रेसी नेताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया है।
दूसरी वजह सीट शेयरिंग को लेकर विवाद है। कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव में पंजाब की 13 में से 8 सीटें जीती थीं और पार्टी उसी प्रदर्शन के आधार पर अब सीटों का बंटवारा चाहती है, लेकिन आप इसके लिए तैयार नहीं है। आप नेता चाहते हैं कि सीटों का बंटवारा वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव नतीजों के आधार पर हो, जब उनकी पार्टी ने प्रदेश की 117 में से रिकॉर्ड 92 सीटें जीती हैं। तीसरी वजह है मुख्यमंत्री और उनके गुट के लोग नहीं चाहते कि कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ा जाए।
पांचवां झटका: उद्धव के सुर बदले, क्या एजेंसियों का दबाव
उद्धव ठाकरे ने सोमवार को प्रधानमंत्री मोदी की तारीफ की है। जानकारों का कहना है कि भाजपा नीतीश कुमार को वापस NDA में ले सकती है तो शिवसेना के लिए भी अवसर है। उद्धव उसी अवसर के लिए तारीफों के पुल बांध रहे हैं।
महाराष्ट्र के सिंधदुर्ग जिले में एक रैली में उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘मैं मोदी जी को बताना चाहता हूं कि हम कभी भी आपके दुश्मन नहीं थे। आज भी हम दुश्मन नहीं हैं। हम आपके साथ थे। शिवसेना आपके साथ थी। हमने पिछली बार अपने गठबंधन के लिए प्रचार किया था। आप प्रधानमंत्री बने क्योंकि विनायक राऊत जैसे हमारे सांसद जीत कर आए। बाद में आपने हमें खुद से दूर कर दिया।’
महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार जीतेंद्र दीक्षित कहते हैं कि उद्धव ठाकरे का दिल अचानक नहीं पिघला है। हाल ही में ED ने आदित्य ठाकरे के खास सूरज चव्हाण को खिचड़ी घोटाले में गिरफ्तार किया है। उद्धव ठाकरे के खास रवींद्र वायकर काे स्पोर्ट्स कोटे की जमीन पर फाइव स्टार होटल बनाने के मामले में दो बार पूछताछ के लिए सेंट्रल एजेंसियां बुला चुकी हैं।
ED का हाथ उद्धव के परिवार तक पहुंच रहा है। उद्धव काफी दबाव में हैं। ऐसे में वो मोदी सरकार को पुराने संबंधों की याद दिला रहे हैं कि आपने हमें छोड़ा है, हमने आपको नहीं। उद्धव सीधे भाजपा को न्योता दे रहे हैं कि बातचीत का दरवाजा खुला हुआ है।
दूसरा कारण ये है कि महाराष्ट्र विकास अघाड़ी को लेकर उद्धव की कांग्रेस के साथ पटरी नहीं बैठ रही है। हाल ही में सीट बंटवारे को लेकर बयानबाजी हुई है। संजय राउत ने कहा कि कांग्रेस महाराष्ट्र में जीरो सांसद वाली पार्टी हो गई है। इसके जवाब में कांग्रेस के संजय निरुपम ने कहा था कि शिवसेना भी पहले जैसी नहीं रही है। शिवसेना में भयंकर बिखराव हुआ है। जिस पार्टी को सब छोड़कर चले गए और पता नहीं कितने बचे हैं और कितने दिन तक बचे रहेंगे?
96 सीटों पर बंटवारे की नई कवायद होगी
- 42 पश्चिम बंगाल : ममता अलग लड़ेंगी इससे पश्चिम बंगाल की 42 सीटों पर फिर से बंटवारे की कवायद करनी पड़ेगी।
- 40 बिहार : नीतीश NDA में चले गए। नीतीश के इंडिया गठबंधन से अलग होने के कारण वहां सबसे ज्यादा विवाद की स्थिति बन सकती हे। अब वहां कांग्रेस और RJD में बंटवारे पर टसल होगी।
- 14 झारखंड : पूर्व CM हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद से झारखंड में कोई चेहरा नहीं है। ऐसे में फिर 14 सीटों पर गणित बैठाना होगा।
- इस तरह से पश्चिम बंगाल, बिहार और झारखंड की सीटों को मिला लें तो इंडिया गठबंधन को कुल 96 सीटों पर फिर से सीट बंटवारे की माथापच्ची करनी होगी।
- अगर ये मान लें कि उद्धव ठाकरे भी NDA में आ गए तो महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटें मिलाने पर ये आंकड़ा बढ़कर 144 हो जाएगा।







