राजस्थान की 199 विधानसभा सीटों के लिए प्रचार का शोर थम चुका है. इन सीटों पर 25 नवंबर यानी शनिवार को मतदान होगा. ऐसे में हर किसी नजरें मतदान के साथ-साथ सत्ता पर कौन काबिज होगा इस पर भी टिकी रहेंगी. क्योंकि मतदान के साथ-साथ दोनों दलों के भाग्य फैसला भी ईवीएम में कैद हो जाएगा. हालांकि राजस्थान में इतिहास पर नजर दौड़ाएंगे तो हर बार प्रदेश की जनता सरकार बदल देती है. यानी ट्रेंड के मुताबिक इस बार बीजेपी की जीत तय है. क्योंकि प्रदेश में बीते तीन दशकों से तो यही होता आया है. एक बार कांग्रेस तो एक बार बीजेपी ने अपनी सरकार बनाने में कामयाबी हासिल की है.
राजस्थान के रण को जीतना इतना आसान नहीं है. यहां पर जनता बहुत बारीकी से उम्मीदवारों को परखती है और हर बार दूसरे दल को चुनने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है. वैसे इस बार 200 की जगह 199 सीटों पर ही मतदान होगा क्योंकि एक सीट श्री गंगाराम पर कांग्रेस विधायक के निधन की वजह से वोट नहीं हो रहा है. हालांकि 199 में 57 सीट ऐसी हैं जो सरकार बनाने और गिराने में अहम भूमिका निभाती हैं.
एक बार बीजेपी तो एक बार कांग्रेस
राजस्थान की सत्ता पर काबिज होने के लिए जिन 57 सीटों की बात हो रही है वहां की खासियत है कि यहां एक बार बीजेपी तो एक बार कांग्रेस का राज होता है. यानी जो ट्रेंड हम बीते 3 दशकों यानी 30 वर्षों से देख रहे हैं उसके लिए इन्हीं 57 सीटों का हाथ है.
किस दल की कैसी स्थिति
आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो दोनों ही दलों ने कुल सीटों में कुछ प्रतिशत सीटों पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई हुई है. भारतीय जनता पार्टी की बात की जाए तो कुल सीटों में से 60 सीट ऐसी हैं जहां पार्टी को हार का डर नहीं रहता है. 1972 से अब तक हुए विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी यहां पर दो से ज्यादा बार जीत दर्ज कर चुकी है.
इनमें से 13 सीट ऐसी हैं जहां चार बार से ज्यादा बीजेपी के विधायक लगातार जीतते आ रहे हैं. यानी इन सीटों को बीजेपी का गढ़ कहा जा सकता है. वहीं 13 सीटें ऐसी है जहां बीजेपी एमएलए तीन बार से ज्यादा जीते हैं. यानी 60 में 26 सीटों पर बीजेपी की पकड़ और भी ज्यादा मजबूत है.
वहीं कांग्रेस की बात की जाए तो कुल सीटों में से कांग्रेस ने भी अपनी कुछ सीटें सुरक्षित बना रखी हैं इनकी संख्या 21 है. कांग्रेस इन 21 सीट में से 5 सीट ऐसी हैं जहां कांग्रेस के विधायक पांच बार से ज्यादा बार जीत चुके हैं. वहीं 6 सीटों पर कांग्रेस ने लगातार तीन बार जीत दर्ज की है. सीएम अशोक गहलोत की सरदारपुरा सीट पांच चुनावों से उन्हीं के पास है.
ऐसे में कुल 81 सीट तो दोनों दलों के पास सेफ मानी जा सकती हैं. अब 199 में 81 कम कर दें तो कुल 118 सीटें बचीं. इनमें से 57 सीट ऐसी है जहां पर वोटर्स का मन हर बार बदल जाता है.
इन सीटों ने ही हर बार सत्ताधारी दल को हटाकर विरोधी दल को सत्ता पर काबिज करने में अहम रोल निभाया है. यानी दोनों ही दलों की नजर इस चुनाव में भी इन 57 सीट पर ही टिकी होगी.
कैसे सामने आईं 57 सीटें
राजस्थान के चुनावी रण को समझें तो वर्ष 2008 में हुए परिसीमन के बाद 57 सीटों को लेकर बड़ा खुलासा हुआ. इन सीटों पर अब तक तीन बार यानी 2008, 2013 और 2018 में विधानसभा चुनाव हुए हैं. लेकिन जो ट्रेंड देखने में आया वो यह था कि यहां पर एक बार फिर भी एक भी एमएलए अपनी सीट बचाने में कामयाब नहीं रहा.
अजमेर सबसे आगे
राजस्थान में सरकार बनाने में अजमेर का रोल भी काफी अहम माना गया है. क्योंकि यहां कि 13 विधानसभा सीटें अजमेर संभाग से ही हैं. वहीं दूसरे नंबर पर जयपुर का नाम आता है. इस संभाग से कुल 12 सीट हैं. यानी इन संभागों में वोटरों का मिजाज बदला तो सत्ताधारी दल को दिक्कत या मदद दोनों मिल सकती है.
हालांकि अजमेर-जयपुर के बाद उदयपुर और जोधपुर ये भी दो बड़े फैक्टर हैं क्योंकि यहां से भी आठ-आठ सीट आती हैं, जबकि बीकानेर और भरतपुर से पांच सीटें सरकार बनाने में अहम रोल निभाती हैं.







