जब 24 जुलाई 2006 के दिन ‘लोक सभा चैनल’ शुरू किया गया तो यह शायद यह सोचकर किया गया था कि आम जनता तक संसदीय कार्यवाही लाइव देख सकेगी। इससे वह संसद के कामकाज को जानेगी। उसके चुने नेता संसद में कैसे ‘वाद–विवाद–संवाद’ करते हैं वह इसे पहचानेगी और इस संसदीय प्रणाली को अपने जीवन में उतारेगी। यह भी सोचा गया होगा कि ऐसे प्रसारण से नेताओं पर भी एक अंकुश रहेगा। उन्हें अपने व्यवहार के प्रति यथेष्ट सजग रहना होगा ताकि आम जनता उनकी संवाद शैली और भाषा को अपने जीवन में उतारे। लोक सभा की कार्यवाही के ऐसे लाइव प्रसारण का उद्देश्य संसदीय प्रणाली को और भी लोकप्रिय बनाने का तो था ही‚ साथ ही नेताओं पर भी अंकुश लगाने का रहा होगा।
सोचा होगा कि अगर सांसद टीवी में खुद एक आर्दा स्थापित नहीं करेंगे तो उनकी जनता उनसे नाराज हो जाएगी और अगली बार उनको ठुकरा देगी। कहने की जरूरत नहीं कि ‘लोक सभा टीवी’ का उक्त उद्देश्य तो बहुत नेक था‚ लेकिन वक्त के बदलने के साथ टीवी का रोल भी बदल गया‚ उसका चरित्र भी बदल गया और उसे देखने वाली जनता भी बदल गई।
ऐसे में चैनल सिर्फ खबर देने तक ही सीमित न रहे। वे दैनिक खबरों को ‘बहसों’ का मुद्दा बनाकर विचार–विमर्श भी कराने लगे ताकि दर्शक खबर के हर पक्ष को समझ सकें। फिर जैसे ही हमारे सामाजिक व निजी जीवन में सोशल मीडिया निर्णायक हुआ वैसे ही टीवी की खबरों और बहसों का ‘चाल‚ चेहरा और चरित्र’ बदलने लगा। फेसबुक‚ ट्विटर (अब एक्स)‚ इंस्टाग्राम‚ यूट्यूब‚ व्हाटसऐप आदि सोशल मीडिया प्लेटफार्मों में नित्य प्रसारित होने वाला ‘कंटेट’ और ‘बाइटें’‚ चैनलों की बहसों का मुद्दा बनाई जाने लगीं और तरह–तरह के वक्ता–प्रवक्ता और विशेषज्ञ आपस में बहसें करते दिखाई देने लगे। इस बदलाव से जितना पब्लिक ने सीखा उससे भी अधिक उसके नेताओं ने सीखा। पहले खबर बनाने के लिए दल या नेता ‘प्रेस कांफ्रेंस’ करते‚ पत्रकारों को बुलाते‚ दलों के नेता/प्रवक्ता जबाव देते‚ लेकिन जब से सोशल मीडिया और उसमें भी ज्यों ही नेताओं ने ‘ट्वीट कल्चर’ अपनाई और सोशल मीडिया में किसी खबर या बाइट के ‘वायरल’ होने की कल्चर और ‘ट्रेंडिग’ करने की कल्चर को जाना त्यों ही बहुत से नेता भी अपने ‘ट्वीटों’ को कुछ इस अंदाज से गढÃने लगे ताकि उनकी लाइनें भी वायरल हो जाएं। इसलिए ज्यादातर नेता भी रोज–रोज ट्वीट करके अपने को खबरों में रखने लगे। कुछ नेता यह कह कर अपने को सबसे ‘पापूलर’ नेता बताने लगे कि देखिए तो! ‘ट्विटर’ अब (एक्स) पर उनके इतने लाख फॉलोअर्स हैं.चैनल उनको उठाते और अपनी बहसों का मुख्य विषय बनाकर नित्य बहसें कराते!
अगर आज हमारी भाषा अधिकाधिक ‘घृणात्मक’ होती गई है तो उसका एक बडा कारण ‘ट्विटर’ जैसा माइक्रोमीडिया प्लेटफार्म है‚ जिसने हमें अपनी दैनिक भाषा को ‘तीखा’ व ‘भडÃकाउ’ बनाने के लिए मजबूर किया है। सभी जानते हैं कि तब ‘ट्विटर’ पर अधिक–से–अधिक ‘दो सौ चालीस’ शब्दों में ही अपनी बात कहने की इजाजत थी! इतने कम शब्दों में या तो लोगों को ‘तिकतिकाने’ और ‘उकसाने’ वाली भाषा लिखी या बोली जा सकती थी या फिर सबका ध्यान तुरत खींचने के लिए कुछ ‘टारगेटेड कु–बोल’ ही बोले जा सकते थे।
चैनल भी जानते हैं कि आज के कलह भरे समाज में जितने ‘कु–बोल’ बिक सकते हैं‚ उतने ‘सु–बोल’ नहीं बिक सकते। हमारे टीवी चैनलों को भी यह ‘कु–बोल कल्चर’ भाती चली गई। इसीलिए आज ‘चैनल रिपोर्टर’ आदि ऐसे नेताओं और अवसरों को ढूंढते ही रहते हैं जो उनको एक चुटीली और धांसू बाइट देकर उनका दिन बना दें! यह नेताओं की कामना कहिए या कि उनकी जरूरत कि वे भी जानने लगे हैं कि खबर चैनलों की खबरें और बहसें उनके ‘कु–बोल’ के बारे में जितनी देर चर्चा करेंगे वे उतने ही लोकप्रिय होंगे। शायद इसी कारण कई नेता अपने को चैनलों में विवाद का विषय बनाए रखते हैं। कई तो ऐसे ‘घृणाबोल’ बोलकर ही जिंदा रहते दिखते हैं। इस दैनिक लंपटीकरण के जमाने में यह ‘कु–बोल कल्चर’ अब निरी ‘भडकाऊ कल्चर’ में बदल गई है। अब लोग संवाद नहीं करते बल्कि एक दूसरे कोे ‘चिढाने’‚ ‘उकसाने’ और ‘भडकाने’ को ही ‘संवाद’ समझते हैं‚ लेकिन ऐसी हर ‘भडकबाजी’ समाज में प्रतिहिंसा को ही बढाती है। यह कहां जाकर रुकेगाॽ यह अपने जनतंत्र के भविष्य के लिए भी चिंता की बात है।
यह नेताओं की कामना कहिए या कि उनकी जरूरत कि वे भी जानने लगे हैं कि खबर चैनलों की खबरें और बहसें उनके ‘कु–बोल’ के बारे में जितनी देर चर्चा करेंगे वे उतने ही लोकप्रिय होंगे। शायद इसी कारण कई नेता अपने को चैनलों में विवाद का विषय बनाए रखते हैं। कई तो ऐसे ‘घृणाबोल’ बोलकर ही जिंदा रहते दिखते हैं……





