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आधी शताब्दी बाद ये पहला मौका होगा, जब केंद्र की सत्ता के खिलाफ विपक्षी पार्टियों द्वारा आयोजित है बड़ी बैठक

UB India News by UB India News
June 23, 2023
in खास खबर, पटना, बिहार
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आधी शताब्दी बाद ये पहला मौका होगा, जब केंद्र की सत्ता के खिलाफ विपक्षी पार्टियों द्वारा आयोजित है बड़ी बैठक
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राजनीतिक महामंथन पटना में होने जा रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री और जनता दल (यूनाइटेड) सुप्रीमो नीतीश कुमार इसके अगुवा हैं। 2024 लोकसभा चुनावों के लिए विपक्षी एकता का पहला ऑफिसियल शो के तौर पर देखा जा रहा है। 48 साल से अधिक के राजनीतिक करियर में नीतीश कुमार कई इस तरह की दौर से गुजरे होंगे। सियासी उतार-चढ़ाव में पाटलिपुत्र की धरती से लुटियन की ताज पर राज करने का ख्वाब पाले हुए हैं। तैयारी भले ही पटना में की जा रही है, मगर नजर दिल्ली के लालकिले पर है। पहली बार नीतीश कुमार नेशनल लेवल पर विपक्षी दलों को लामबंद करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। 2024 के चुनावों में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के खिलाफ ‘मिशन तख्त-ओ-ताज’ पर लगे हैं।

वैसे, नीतीश कुमार ने इसकी शुरुआत 9 साल पहले की थी। 2015 बिहार विधानसभा चुनाव में आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन जरिए सत्ता भी हासिल की थी। उस समय भी विपक्षी एकता की पहल की थी, लेकिन सहयोगियों की ओर से बहुत उत्साहजनक प्रतिक्रिया नहीं मिलने से सफल नहीं हो सके। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। इस बार सब कुछ नीतीश के कंट्रोल में नजर आ रहा है। हालांकि अबतक नीतीश को आधिकारिक तौर पर कोई समन्वयक पद नहीं दिया गया है। इन सबके बीच ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल के साथ कांग्रेस को एक मंच पर लाने का श्रेय तो दिया ही जा सकता है। नीतीश ने अपनी पहुंच राहुल गांधी, शरद पवार, उद्धव ठाकरे, हेमंत सोरेन, अखिलेश यादव, एमके स्टालिन के साथ लेफ्ट पार्टियों तक बनाई। ये सभी पटना में 2024 लोकसभा चुनाव में सत्ताधारी बीजेपी को हराने के लिए स्ट्रैटजी बनाने में जुटे हैं।

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जेपी आंदोलन के 49 साल बाद ये पहला मौका होगा, जब केंद्र की सत्ता के खिलाफ विपक्षी पार्टियों की इतनी बड़ी बैठक पटना में होने जा रही है। पटना में मीटिंग करने का सुझाव पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में नीतीश के साथ बैठक के दौरान दी थीं। इस दौरान उन्होंने 1974 आंदोलन के प्रमुख जयप्रकाश नारायण के आह्वान का भी जिक्र किया था। इस आंदोलन के बाद 1977 के आम चुनावों से पहले आपातकाल के दौरान जनता पार्टी की छतरी की नीचे सभी विपक्षी दलों ने चुनाव लड़ा और इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं। ममता बनर्जी के आइडिया पर दिल्ली का सपना लिए नीतीश कुमार आगे बढ़े। 2024 लोकसभा चुनाव के रोडमैप और पटना में महाजुटान पर काम करना शुरू किया। मेजबानी पर सबकी सहमति लेते चले गए। 23 जून की वो तारीख भी आ गई।

सत्ता विरोधी लहर के प्रतीक बने पटना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 5 जून 1974 को जेपी ने पटना के गांधी मैदान में ऐतिहासिक ‘इंदिरा हटाओ’ अभियान का आगाज किया था। बुजुर्ग जेपी जनता को संबोधित करने के लिए कुर्सी पर बैठे थे। गांधी मैदान में 10 लाख लोगों को समा लेने की क्षमता थी। तब लगभग खचाखच भरा हुआ था। जेपी को सुनने के लिए पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी बड़ी संख्या में पहुंचीं थी। कुछ लोगों का कहना था कि इससे पहले 1942 के आंदोलन के दौरान गांधी मैदान में भीड़ जुटी थी। उस वक्त हजारीबाग जेल ब्रेक के बाद जेपी एक नेशनल हीरो बन गए थे। पटना के गांधी मैदान में दो सबसे अच्छे राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित करने श्रेय जेपी को दिया जाता है। इसके बाद से सत्ता के खिलाफ संघर्ष करनेवालों के लिए पटना सूट करने लगा।

कहा जाता है कि 1974 बिहार मूवमेंट राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व नहीं कर सकता था, अगर जेपी ने इसे आगे नहीं बढ़ाया होता। पटना के गांधी मैदान में जेपी के दिए भाषण का असर दिल्ली पर पड़ा। ‘संपूर्ण क्रांति के आह्वान से तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार तिलमिला गई। 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा कर दी गई। उसके बाद ही राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन राजनीति के युग की शुरुआत हुई। जेपी ने समाजवादियों, भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल, कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी और बाकी दलों को जनता पार्टी बनाने के लिए एक साथ लाया। 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में केंद्र में पहली कांग्रेस विरोधी सरकार बनी।

वैसे, राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि जेपी की 1977 की कवायद और नीतीश की 2023 की पॉलिटिकल मैनेजमेंट के बीच कोई तुलना नहीं हो सकती। फिर भी राजनीतिक प्रतीक तो हो ही सकता है। जेपी का मिशन कांग्रेस सत्ता के खिलाफ विपक्ष को एक साथ लाना था। जबकि नीतीश का टारगेट बीजेपी से मुकाबला करना है, ताकि कांग्रेस को उसका फायदा मिले। 1977 में जेपी के दो नौजवान शिष्य लालू और नीतीश कांग्रेस विरोधी नारे लगा रहे थे। लेकिन 23 जून को पटना में हो रही मीटिंग कांग्रेस के समर्थन में 2024 महासंग्राम की आवाज को बुलंद करना है।

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