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अब नए राजनीतिक संकेत ……..

UB India News by UB India News
January 23, 2023
in खास खबर, प्रदेश, ब्लॉग
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अब नए राजनीतिक संकेत ……..
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में जोड़, घटाव, गुणा, भाग लगातार चल रहा है। लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर सभी राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय कार्यकारिणी और प्रदेश कार्यसमिति की बैठकों के बाद चुनाव को लेकर मिशन मोड में काम करने की तैयारी में है। वहीं, विपक्षी दलों में मायावती राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को साधकर इस बार प्रदेश के प्रमुख राजनीतिक दल की दावेदारी पेश करती दिख रही हैं। इन सबके बीच अखिलेश यादव की राजनीति कुछ अलग ही चल रही है। एक समय में वे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव के साथ खड़े नजर आते हैं। वहीं, दूसरी ओर वे उत्तर प्रदेश में सीट मांगने पर उत्तराखंड और मध्य प्रदेश चुनावों में सीट की डिमांड करते दिख रहे हैं। अखिलेश यादव के बयान ने यूपी की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। बयान के मायने तलाशे जा रहे हैं। सवाल किया जा रहा है कि क्या एक बार फिर अखिलेश यादव लोकसभा चुनाव 2024 को लेकर किसी बड़े राजनीतिक दल के साथ गठबंधन करने जा रहे हैं? अगर हां, तो वह राजनीतिक दल कौन-सा होने वाला है? यूपी चुनाव 2022 में अखिलेश यादव ने किसी भी बड़े राजनीतिक दल से गठबंधन नहीं किया। जातीय समीकरणों को साधने के लिए छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन में गए। माय (Muslim + Yadav) समीकरण के साथ कुछ अन्य जातियों को आने का फायदा उन्हें मिला। विधानसभा चुनाव 2017 में 47 सीटों पर मिली जीत से बढ़ते हुए सपा ने यूपी चुनाव 2022 में 111 सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन, यह लोकसभा चुनाव है और इसके लिए राजनीति भी बड़े स्तर पर चल रही है।

क्यों बदले अखिलेश यादव के सुर?

यूपी की राजनीति में अखिलेश यादव 2014 के बाद से किसी गठबंधन के बिना किसी भी चुनाव में नहीं उतरे। 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी का गठबंधन धुर विरोधी बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन में गई। वहीं, 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा ने राष्ट्रीय लोक दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, महान दल, अपना दल कमेरावादी जैसे छोटे-छोटे दलों के साथ गठबंधन कर चुनावी मैदान में भाग्य आजमाया। हालांकि, इन सभी चुनावों में अखिलेश यादव को कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लगी। 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरी थी। प्रदेश की सत्ता में थी। इसके बावजूद पार्टी को महज 5 सीटों पर जीत मिली। लोकसभा चुनाव 2019 में मायावती के साथ गठबंधन के बाद प्रदेश में बड़े बदलाव की उम्मीद जताई गई। बड़ी-बड़ी भविष्यवाणी हुई। लेकिन, समाजवादी पार्टी 5 सीटों के आंकड़े को पार नहीं कर पाई। हां, बहुजन समाज पार्टी को गठबंधन का फायदा जरूर मिला। 2014 के चुनाव में 0 सीट पर सिमटी बसपा ने 2019 के चुनाव में 10 सीटें हासिल की।

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अब लोकसभा चुनाव 2024 की तैयारी है। अखिलेश यादव विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ अपने संबंधों के आधार पर वोट बैंक की राजनीति को साधने की कोशिश कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में उनके साथ मुलायम सिंह यादव नहीं होंगे। मुलायम सिंह यादव ने 2019 के लोकसभा चुनाव में मैनपुरी सीट से किस्मत आजमाई थी। जीते थे। अखिलेश यादव आजमगढ़ जीते थे। रामपुर से आजम खान जीते थे। मुलायम सिंह यादव नहीं रहे। आजम खान चुनावी राजनीति से बाहर हो चुके हैं। रामपुर एमपी एमएलए कोर्ट ने 2019 के स्पीच केस में आजम को 3 साल की सजा दी। इस कारण उनकी विधायकी चली गई। चुनाव लड़ने पर रोक लग गई। असर, आजम खान ने रामपुर विधानसभा सीट पर भी अपनी पकड़ गंवा दी। ऐसे में चुनाव की अखिलेश यादव के सामने पार्टी की रणनीति को मजबूती के साथ प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर फिट करने की है। इसके लिए उन्हें एक मजबूत साथी की तलाश है। उनके बयान को राजनीतिक विश्लेषक इसी रूप में देख रहे हैं।

राजनीतिक मुलाकातों का अर्थ समझा रहे सपा अध्यक्ष

सपा अध्यक्ष इन दिनों राजनीतिक मुलाकातों का अर्थ भी समझाते दिख रहे हैं। दरअसल, पिछले दिनों अखिलेश यादव तेलंगाना दौरे पर थे। बीआरएस प्रमुख और तेलंगाना के सीएम के. चंद्रशेखर राव ने अपनी पार्टी का कार्यक्रम आयोजित किया था। तेलंगाना राष्ट्र समिति को भारत राष्ट्र समिति बनने के बाद वे राष्ट्रीय राजनीति में खुद को प्रमोट किए जाने के लिए इस कार्यक्रम को रखा। इसमें देश के तमाम विपक्षी दलों के प्रमुखों को बुलाया गया। अखिलेश यादव भी पहुंचे। सपा नेता जनेश्वर मिश्र की पूण्यतिथि के मौके पर प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद अखिलेश ने तेलंगाना दौरे पर बात की। उन्होंने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देश के सभी प्रमुख विपक्षी नेताओं से मुलाकात की है। पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने भी मुलाकातें कीं हैं। इसी कड़ी में तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने भी कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री और पार्टियों के नेताओं से मुलाकात की। मैं भी उनके आमंत्रण पर वहां गया था। संकेतों में अखिलेश कह गए, सबसे मिल रहे हैं। किसके साथ जाएंगे, तय नहीं है।

क्या है मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में सपा की स्थिति?

अखिलेश यादव के जिस ताजा बयान पर चर्चा गरमाई है, उसमें वे कह रहे हैं कि अगर कोई हमसे यूपी में सीट मांगेगा तो हम मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में सीट मांगेंगे। इसका अर्थ राजनीतिक विश्लेषक गठबंधन की राजनीति से लगाते दिख रहे हैं। अब तक अखिलेश यादव ने मिशन 2024 को लेकर अपने रुख का इजहार नहीं किया था। लेकिन, उनके ताजा बयान ने संकेत दे दिया है कि समाजवादी पार्टी एक बार फिर गठबंधन को तैयार है। शर्त यह होगी कि यूपी में जितनी सीटें गठबंधन के तहत वे सहयोगी दलों को देंगे। उस हिसाब से उत्तराखंड और मध्य प्रदेश में सीटें लेंगे। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में समाजवादी पार्टी को कितनी सीटें या वोट मिलते रहे हैं। मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 का परिणाम देखें तो समाजवादी पार्टी ने 50 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। पार्टी को एक सीट पर जीत मिली। पार्टी को 1.3 फीसदी वोट मिला था। लोकसभा चुनाव 2019 में पार्टी को 0.2 फीसदी वोट ही मिल पाए थे। सपा-बसपा गठबंधन के बाद भी पार्टी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई। बसपा को मध्य प्रदेश में तब 2.4 फीसदी वोट मिले थे।

उत्तराखंड में भी पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। पांचों सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। वहीं, कांग्रेस दूसरे स्थान पर थी। वहीं, उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2022 में पार्टी ने 55 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। सभी 55 सीटों पर पार्टी उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई। इस चुनाव में भाजपा को 23,83,838 वोट मिले। यह कुल पड़े वोटों का 44.33 फीसदी था। कांग्रेस को 20,38,509 वोट मिले। यह कुल पड़े वोटों का 37.91 फीसदी था। वहीं, सपा उम्मीदवारों को 15,521 वोट मिल पाए। यह कुल पड़े वोट का 0.29 फीसदी था। ऐसे में यूपी में गठबंधन के आधार पर दी जानी वाली सीट के जरिए अखिलेश यादव की मध्य प्रदेश और उत्तराखंड में सीट की डिमांड कौन पूरी करेगा, देखना दिलचस्प रहेगा।

संकेतों के क्या हैं मायने?

अखिलेश यादव ने गठबंधन के संकेत दिए हैं। इसके मायनों को तलाशा जाना शुरू कर दिया गया है। राजनीतिक गलियारे में चर्चा यह हो रही है कि गठबंधन किस दल के साथ करने की तैयारी सपा अध्यक्ष कर रहे हैं। आइए, इसको समझने का प्रयास करते हैं।

बसपा: सपा और बसपा का गठबंधन वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में हो चुका है। अब बसपा से गठबंधन की उम्मीद कम दिखती है। बसपा प्रमुख मायावती पहले ही ऐलान कर चुकी हैं कि आने वाले चुनावों में पार्टी अपने दम पर उतरेगी। ऐसे में अखिलेश और मायावती की जोड़ी का एक बार फिर चुनावी मंच पर साथ दिखने का चांस कम लग रहा है। वैसे भी अखिलेश यादव ने देखा है कि इस गठबंधन को जमीन पर उतारना संभव नहीं हो पाता है। माय समीकरण तो मायावती के साथ चला जाता है। लेकिन, मायावती के साथ चलने वाले दलित वोट बैंक को सपा से जुड़ने में दिक्कत हो जाती है। 2019 का चुनाव परिणाम इसे साबित करता है।

थर्ड फ्रंट: मायावती के अलग हो जाने से थर्ड फ्रंट का यूपी की सियासत में कुछ हासिल होता नहीं दिख रहा है। थर्ड फ्रंट के साथ अभी जो भी दल दिख रहे हैं, अधिकांश राज्यों की सीमाओं में सिमटे दिखते हैं। चाहे वह टीआरस से बनी बीआरएस हो या फिर शरद पवार की एनसीपी, नीतीश कुमार की जदयू, ममता बनर्जी की टीएमसी या फिर एचडी कुमारस्वामी की जेडीएस। राष्ट्रीय स्तर पर सभी राज्यों तक पहुंचने के लिए इन्हें अभी काफी जतन करना होगा। ऐसे में मोर्चा बना तो अखिलेश अकेले ही यूपी के सियासी मैदान में खड़े नजर आएंगे।

कांग्रेस: एमपी और उत्तराखंड वाले बयान से जो पार्टी सबसे अधिक जुड़ती दिख रही है, वह कांग्रेस ही है। दोनों ही राज्यों में कांग्रेस प्रमुख विपक्षी दल है। वर्ष 2017 में राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी यूपी के चुनावी मैदान में उतर चुकी है। भले ही इससे दोनों को कोई बड़ी सफलता नहीं मिली हो, लेकिन पिछले 6 सालों में गंगा का काफी पानी बह गया है। अखिलेश यादव ने पिछले दिनों राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा की सराहना की। मंच पर नहीं गए। लेकिन, शुभकामनाएं भेजीं। ऐसे में माना जा रहा है कि अखिलेश थर्ड फ्रंट छोड़कर मुख्य विपक्षी गठबंधन के साथ चले जाएं तो अधिक आश्चर्य नहीं होगा।

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