शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की शिखर वार्ता का सबसे चर्चित वाक्य था‚ ‘यह समय युद्ध का नहीं है’। भारत और रूस ही नहीं पूरी दुनिया में इस छोटे से वाक्य को व्याख्यायित करने की कवायद की जा रही है। अमेरिका और ब्रिटेन सहित पश्चिमी देशों के नेता और मीडि़या इसे लेकर बहुत आनंदित हैं। उन्हें लगता है कि मोदी का यह वाक्य भारत और रूस के बीच दरार का प्रारंभिक संकेत है। भारत में अमेरिकापरस्त विश्लेषक और मीडि़या भी इसे इसी रूप में प्रचारित कर रही है। रूस की मीडि़या में इस पर चुप्पी है। मोदी के कथन के दो अर्थ हो सकते हैं–पहला; यह कि भारत अपनी विदेश नीति को अमेरिकी खेमे की ओर ले जा रहा है। दूसरा; यह कि भारत अपने परंपरागत और भरोसेमंद दोस्त के सामने बेबाकी से अपनी बात रख रहा है। साथ ही उसे विश्वास है कि मित्र देश रूस उसे इसी भावना से लेगा।
रूस के नेता और मीडि़या यह कह सकते हैं कि यह सही है कि वर्तमान समय युद्ध का नहीं है‚ लेकिन उसमें यह भी जोड़़ा जाना चाहिए कि यह समय तख्तापलट और आंतरिक अशांति पैदा करने का भी नहीं है। रूस का मानना है कि वास्तव में यूक्रेन युद्ध का बीजारोपण वर्ष २०१४ में हुआ था‚ जब अमेरिका और पश्चिमी देशों की शह पर वहां अशांति पैदा की गई थी। उस समय जनआंदोलन और गृहयुद्ध जैसी स्थिति के बीच निर्वाचित राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को सत्ता से हटना पड़़ा था और देश छोड़़कर जाना पड़़ा। इस घटना के बाद यूक्रेन के राष्ट्रवादी तबके और रूसी भाषा–भाषी लोगों के बीच आपसी सौहार्द और तालमेल टूट गया था। रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन के सामने दो रास्ते थे। या तो वह यूक्रेन के सत्ता तंत्र को रूस विरोधी शक्तियों और नाटो के हवाले कर दें अथवा रूस के राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा और रूसी भाषा–भाषी लोगों की जान–माल बचाने के लिए हस्तक्षेप करें। पुतिन ने दूसरा रास्ता चुना जिसकी परिणति इस वर्ष फरवरी में पूर्ण युद्ध के रूप में सामने आई। प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन के पहले ही पुतिन अपनी बात कह चुके थे। उन्होंने कहा था कि यूक्रेन युद्ध के बारे में भारत की चिंता को समझते हैं‚ लेकिन यूक्रेन के नेता विवाद को युद्ध के मैदान पर ही हल करने पर आमादा है। मोदी–पुतिन द्विपक्षीय वार्ता के तुरंत बाद पुतिन ने एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया। वह आत्मविश्वास और संकल्प से भरे दिखाई दिए। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि रूस क्रीमिया और ड़ोनबास जैसे रूसी भाषा–भाषी क्षेत्रों को लेकर कोई नरमी नहीं दिखाएगा। क्रीमिया विधिवत रूस का हिस्सा है जबकि ड़ोनबास और लुहान्सक में स्वायत्तशासी शासन है। पुतिन ने पश्चिमी मीडि़या में जोर–शोर से प्रचारित की जा रही यूक्रेन की जवाबी हमलों को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि रूस अपने लक्ष्य हासिल करके रहेगा। अमेरिका और पश्चिमी देशों में युद्धोन्माद के माहौल के बीच कई रणनीतिक विश्लेषक और सैन्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि राष्ट्रपति पुतिन सीमित क्षमता के परमाणु हथियारों का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। राष्ट्रपति पुतिन की सोच और व्यवहार का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने वाले विद्वानों ने उल्लेख किया है कि पुतिन के दिल–दिमाग पर तीन दशक पहले हुए सोवियत संघ के विघटन की छाप है। उस समय युवा पुतिन खुफिया एजेंसी केजीबी के अधिकारी के रूप में पूर्व जर्मनी स्थित सोवियत राजनयिक मिशन पर तैनात थे। जब उत्तेजित भीड़़ ने मिशन पर हमला किया तो पुतिन ने बहुत सूझबूझ के साथ इमारत और सोवियत राजनयिकों की हिफाजत की।
उन्होंने मास्को आपात संदेश भेजकर तुरंत टैंक भेजे जाने की गुहार की। उस समय पुतिन को बताया गया ‘मास्को चुप है’। दशकों बाद पुतिन के हाथ में रूस की बागड़ोर है और ‘मास्को चुप नहीं है’। सोवियत संघ के विघटन के बाद पुतिन अब शेष बचे रूस का विघटन नहीं होने देंगे। किसी भी संघर्ष का समाधान अतिवादी रवैये से नहीं होता। यूक्रेन युद्ध पर भी यही बात लागू है। मोदी यह कह सकते हैं कि ‘यह युद्ध का समय नहीं है’‚ लेकिन क्या वह रूस और विरोधी पक्ष अमेरिका को अतिवादी रवैया छोड़़ने को प्रेरित कर सकते हैंॽ भारत अभी इस स्थिति में नहीं है। मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के सामने यही सबसे अच्छा विकल्प है कि तटस्थता बनाए रखें। उचित सलाह दें और रूस के साथ परंपरागत मैत्री में दरार नहीं पड़़ने दें।







