महीने की शुरुआत में जब भारतीय अर्थव्यवस्था ब्रिटेन को हटाकर विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनी थी‚ तभी बहुतों ने ध्यान दिलाया था कि इस ‘कामयाबी’ में ज्यादा खुश होने की गुंजाइश नहीं है। आखिरकार कुल घरेलू उत्पाद के आंकड़े में ब्रिटेन को पीछे छोड़ने के बावजूद भारत की प्रतिव्यक्ति आय उसके बीसवें हिस्से के बराबर भी नहीं थी। बहरहाल‚ अब एक के बाद एक तीन बुरी खबरों ने हमें झकझोर कर इसका अहसास कराया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था अब भी संकट से जूझ ही रही है। याद रहे कि ताजा बुरी खबरें और पहले आर्थिक मोर्चे से आयीं‚ आपस में जुड़ीं तीन और बुरी खबरों के उपर से आई हैं। वो थीं–रुपये का विनिमय मूल्य गिरकर ८० रुपये प्रति डॉलर के करीब हो जाना‚ वित्तीय पुंजी का उल्लेखनीय पैमाने पर पलायन और विदेश व्यापार घाटे व चालू खाता घाटे में‚ परेशान करने वाली बढ़ोतरी। ताजा बुरी खबरों में पहली तो‚ अगस्त के महीने में खुदरा मुद्रास्फीति की दर बढ़कर ७ फीसद पर पहुंच जाना ही है। जुलाई के महीने में यही दर ६.७१ फीसद थी। याद रहे कि यह लगातार आठवां महीना है जब खुदरा मुद्रास्फीति की दर खुद भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अपने नीतिगत हस्तक्षेप के लिए तय की गई ६ फीसद की अधिकतम सीमा से उपर है। साफ है कि यह मुद्रास्फीति किसी तात्कालिक समस्या की नहीं‚ गहरे आर्थिक रुझान की सूचक है। और खुदरा मुद्रास्फीति में इस बढ़ोतरी को खाद्य सामग्री की कीमतों में और भी ज्यादा ७.६२ फीसद बढ़ोतरी का ठेल रहा होना‚ इस महंगाई के खासतौर पर गरीबमार होना सामने लाता है। इस महंगाई की सबसे ज्यादा मार अनाज‚ दाल‚ दूध‚ फल–सब्जियों आदि पर पड़ रही है और गरीबों की तो सारी कमाई इन्हीं सब पर खर्च होती है। दूसरी बुरी खबर‚ जुलाई में औद्योगिक उत्पाद में वृद्धि गिरकर २.४ फीसद रह जाना है‚ जोकि अप्रैल से सबसे निचली वृद्धि है। यह पिछले महीने के मुकाबले २.७५ फीसद की गिरावट को दिखाता है। तीसरी बुरी खबर‚ सीएमआइई के रोजगार में उल्लेखनीय गिरावट के ताजा आंकड़ों की है। अब अगर रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति की अपनी अगली समीक्षा में‚ मुद्रास्फीति पर अंकुश लगाने के लिए ब्याज की दरों में कुछ बढ़ोतरी करता भी है तो‚ मुद्रास्फीति पर चाहे असर पड़े या नहीं पड़े उससे आर्थिक वृद्धि पर और रोजगार पर चोट पड़ना तय है। यानी ‘इधर कुंआ‚ इधर खाई’ वाली स्थिति के बीच से रास्ता निकालने की कठिन चुनौती आर्थिक नीति निर्माताओं के सामने है। साफ है कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के वास्ते सरकार को कड़़ी मेहनत करनी होगी।
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