देश में प्रति वर्ष शक्ति की अधिष्ठात्री दुर्गा पूजा के नवरात्रि और विजय के अधिष्ठाता राम के विजयादशमी पर्व से पहले मंगलमूर्ति‚ बुद्धि और शक्ति के प्रतीक गणेश महोत्सव का आयोजन सुविचारित अनोखी परंपरा रही है। प्रति वर्ष दस दिवसीय सार्वजनिक गणेशोत्सव पर्व मनाने की प्रथा का प्रारंभ अंग्रेजों की दासता से मुक्ति आंदोलन के दौरान स्वाधीनता सेनानी बाल (केशव) गंगाधर तिलक के आह्वान पर शुरू हुआ था।
वस्तुतः १८९० के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन के आरंभिक काल के दौरान लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक अक्सर चौपाटी पर समुद्र के किनारे जाकर बैठते थे और सोचते थे कि कैसे लोगों को एकजुट किया जाए। अचानक उनके दिमाग में विचार आया‚ क्यों न गणेशोत्सव को घरों से निकाल कर सार्वजनिक स्थल पर मनाया जाए‚ ताकि इसमें हर जाति के लोग शिरकत कर सकें। हालांकि इस अभियान में लोकमान्य को काफी मुश्किलों और विरोध का सामना करना पड़ा था। कांग्रेस के उदारवादी नेता तो इसका खुलकर विरोध करने लगे‚ लेकिन इस विरोध की परवाह किए बिना तिलक ने इस गौरवशाली परंपरा की पुणे में नींव रख ही दी। इस तरह सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू करने का श्रेय लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को जाता है। वैसे तो विघ्नहर्ता गणेश की पूजा भारत में प्राचीन काल से होती रही है‚ लेकिन गणेशोत्सव को त्योहार के रूप में मनाने की परंपरा पेशवा काल से शुरू हुई। हालांकि उस कालखंड में भी लोग निजी तौर गणेश पूजा का आयोजन करते थे।
महाराष्ट्र के पेशवाओं के समय में गणेश भगवान को लगभग राष्ट्रदेव के रूप में दर्जा प्राप्त था‚ क्योंकि वह उनके कुलदेवता थे। पेशवाओं के महलों के परिसर में भी गणेशोत्सव का आयोजन होते थे‚ परंतु यहां आम लोगों को प्रवेश नहीं मिलता था। कहने का तात्पर्य पेशवाओं के बाद १८१८ से १८९२ तक के काल में यह पर्व हिंदू घरों के दायरे में ही सिमटकर रह गया। लोकमान्य के गणेशोत्सव अभियान का सबसे रोचक पहलू यह था कि‚ शुरुआती वर्षों में आयोजन समिति के लोग अपने परिसर के आस–पास के गणेश मंदिरों की मूर्ति पांडाल में स्थापित करते और उत्सव के समापन पर प्रतिमा को पुन; मंदिर में स्थापित करने की औपचारिकता पूरी करते थे। लिहाजा‚ उत्सव में गणेश प्रतिमा को मंदिर से बार–बार बाहर निकलने और स्थापित करने की परंपरा लोकमान्य ने अनुचित माना और इस संबंध में सलाह दी। नई व्यवस्था के गणेश की पार्थिव मूर्तियां बनने लगीं। इसे स्थापित किया जाता है और निर्धारित दिन पर विसर्जित किया जाता है। कालांतर में सावर्जिनक गणेशोत्सव स्वतंत्रता संग्राम में आम लोगों को एकजुट करने का एक बेहतरीन जरिया बन गया।
लोकमान्य के आह्वान पर शुरू सार्वजनिक गणेशोत्सव अब वटवृक्ष बन चुका है। पूरे देश में लोग गणेशोत्सव का त्योहार मनाने लगे हैं। अकेले महाराष्ट्र करीब ५० हजार सार्वजानिक गणेशोत्सव मंडल सक्रिय हैं और हर साल गणेशोत्सव का आयोजन करते हैं। कह सकते हैं कि पूरे देश में करोड़ों परिवार आस्था के इस पर्व को धूमधाम से मनाते हैं। सवाल यह है कि गणेशोत्सव का आयोजन कर लोकमान्य ने जनजागृति कैसे कीॽ आखिर अंग्रेज हुक्मरान लोकमान्य को ‘भारतीय अशांति के पिता’ क्यों कहते थेॽ वस्तुतः लोकमान्य शिक्षक‚ समाज सुधारक‚ वकील‚ और ओजस्वी कुशल वक्ता थे। लोकमान्य ने मराठी में नारा दिया ‘स्वराज्य हा माझा जन्म सिद्ध हक्क आहे आणि तो मिवणरच’ अर्थात ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूंगा’। लोकमान्य का देशवासियों के नाम इस संदेश ने आग में घी का काम किया। लोकमान्य जन–जन में व्याप्त हो गए। यह ठीक उसी तरह रहा जैसे कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने कहा था‚ तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। इस वाक्य ने नेताजी को जग प्रसिद्ध कर दिया। उल्लेखनीय है कि‚ लोकमान्य के ही तर्ज पर नासिक से लेकर नागपुर संभाग में स्वातंयवीर विनायक दामोदर सावरकर और उनके साथियों ने स्वाधीनता आंदोलन को धार देने के लिए मित्र मेला के माध्यम से आजादी का अलख जगाया। मित्र मेला में वीर रस में कविता प्रस्तुत करने के अलावा विरोत्तेजक भाषण होते थे। इस बीच गणेशोत्सव ने भी जोर पकड़ा।
मुंबई–कोकण की सीमा से बाहर संपूर्ण महाराष्ट्र गणेशोत्सव की धूम मच गई। उत्सव पंडाल में तत्कालीन दिग्गज नेताओं जैसे वीर सावरकर‚ नेताजी सुभाष चंद्र बोस‚ पंडित मदन मोहन मालवीय‚ मौलिचंद्र शर्मा आदि के व्याखयान होते थे। ऐसे अवसर पर बड़ी संख्या में लोग आते और एकता के सूत्र में बंधते चले गए। अंतत; वह दिन भी आया जब अंग्रेजों ने हार मान ली और यहां से रु खसत हो गए। इस तरह तिलक ने देश को आजाद कराने की जो मुहिम शुरू की थी वह १५ अगस्त १९४७ को फलीभूत हुई।
भारत में जन–मन को एकता के सूत्र में बांधने की परंपरा बहुत पुरानी है। हिंदू त्योहार इसके माध्यम हैं। देवताओं तक ने इस काम को समय आने पर किया है। शिव पुराण के अनुसार शिव–पार्वती ने गणेश को प्रथमेश कहा और हर मांगलिक काम को शुरू करने से पहले गणेश की पूजा–अर्चना करने का विधान बताया। इसी वजह से गणेश को मंगलमूर्ति कहा जाता है। शिव पुराण के अनुसार भगवान शिव का केंद्र कैलाश पर्वत है। शिव ने भारत भूमि को एक सूत्र में पिराए रखने के लिए अपने परिवार के लोगों की नियुक्ति की थी। योजना के अनुसार उन्होंने कार्तिकेय को भारत में दक्षिण की और शैव धर्म का प्रचार करने के लिए भेजा था। इसी तरह गणेश महाराष्ट्र–गुजरात आदि इलाकों में गए। माता पार्वती शैव धर्म का प्रचार करने के लिए पूर्वी भारत के असम और बंगाल भेजी गई थी। इसी तरह भारत इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि गणेशोत्सव का आयोजन सातवाहन‚ राष्ट्रकूट और चालुक्य वंश के कालखंड में भी होता था। महाराज छत्रपति शिवाजी ने भी गणेशोत्सव को संस्कृति से जोड़ा था। कह सकते हैं कि गणेशोत्सव भारतीय संस्कृति का अटूट हिस्सा है।







