नशा मुक्ति दिवस के मौके पर शुक्रवार को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पुन: यह शपथ दिलाएंगे कि आजीवन शराब नहीं पीनी है। दूसरों को भी शराब के सेवन के लिए प्रेरित नहीं करना है। शराब से जुड़ी गतिविधियों से अपने को अलग रखना है। राज्य सरकार के सभी कर्मचारी व अफसर अपने-अपने सरकारी कार्यालयों में इसकी शपथ लेंगे। इससे जुड़ा शपथ-पत्र भी भरेंगे और हस्ताक्षर करेंगे, जिसकी प्रति डीएम के माध्यम से मुख्यालय तक आएगी।
2018 में भी दिलाई गई शपथ
इसके पूर्व 2018 में भी सरकारी कर्मियों व अफसरों ने शराब न पीने की शपथ ली थी। पटना में सुबह 11:30 बजे से ज्ञान भवन में आयोजित होने वाले कार्यक्रम में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अतिरिक्त उप मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद व रेणु देवी की विशेष उपस्थिति रहेगी। इस बार के शपथ कार्यक्रम की खासियत यह है कि शपथ लेने वालों को शपथ पत्र पर अपना हस्ताक्षर भी करना है। इस आयोजन का सीधा प्रसारण फेसबुक, यू-ट्यूब तथा ट्विटर पर होगा।
गांधीजी के संदेश की होगी चर्चा
नशा मुक्ति दिवस के आयोजन में यह चर्चा भी होगी कि गांधीजी ने किस तरह हमेशा शराब का विरोध किया। उन्होंने कहा था कि शराब आदमियों से न सिर्फ उसका पैसा छीन लेती है, बल्कि उनकी बुद्धि भी हर लेती है। शराब पीने वाला इंसान हैवान हो जाता है। यदि मुझे एक घंटे के लिए भारत का तानाशाह बना दिया जाए तो मैं सबसे पहले शराब की सभी दुकानों को बिना क्षतिपूर्ति के बंद कर दूंगा।
शराब के कारण 30 लाख लोगों की मौत
शराब के दुष्प्रभावों पर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट पर भी बात होगी। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट यह कहती है कि 2016 में शराब के कारण विश्व भर में 30 लाख लोगों की मृत्यु हुई है। यह विश्व में कुल मृत्यु का 5.3 प्रतिशत है। शराब के सेवन के कारण युवाओं में मृत्यु दर बूढ़े लोगों की अपेक्षा काफी अधिक है। 20 से 39 आयु वर्ग के लोगों में 13.5 प्रतिशत मृत्यु शराब के कारण होती है। शराब के कारण टीबी, एचआइवी व मधुमेह से होने वाली मृत्यु अधिक है। शराब लगभग दो सौ बीमारियों को बढ़ाती है। आत्महत्या के कुल मामलों में 18 प्रतिशत, आपसी झगड़े में 18 प्रतिशत, सड़क दुर्घटनाओं में 27 प्रतिशत और मिर्गी में 13 प्रतिशत मामले शराब के सेवन के कारण ही होते हैं।
शपथ, अग्निपथ और सरकार…
एक तरफ बिहार में शराबबंदी को फेल बताया जा रहा है। कानून को वापस को लेने की मांग हो रही है। इसमें पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव से लेकर बीजेपी के विधायक तक शामिल हैं। मगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ‘अग्निपथ’ से पीछे हटने को तैयार नहीं है। नीतीश कुमार का मानना है कि कानून तो अपना काम करेगा, मगर उससे ज्यादा जरूरी आमलोगों की भागीदारी और जागरूकता है।
बिहार में शराबबंदी मजाक बन गया है। अमीर से लेकर गरीब तक कानून का माखौल उड़ाने में शामिल हैं। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव कहते हैं कि ‘नीतीश कुमार के पास जो लोग बैठते हैं, वही लोग इस काम में लगे हैं। कितने विधायक, कितने मंत्री इस में लगे हैं, कौन-कौन है, यह सब लोग जान रहे हैं। सरकार किस से पूछ रही है? खुद जाकर जांच क्यों नहीं करती है? शराबबंदी के नाम पर सिर्फ ढकोसला किया जा रहा है। हर जगह होम डिलिवरी की जा रही है।’
‘प्रतिबंध दिवस’ पर फिर शपथ का कोरम?
26 नवंबर को फिर से शराब नहीं पीने की शपथ दिलाई जाएगी। वैसे इससे पहले भी बिहार के सरकारी मुलाजिम शराब नहीं पीने की कसमें खा चुके हैं। मगर ‘बोतल’ देखते ही इनमें कुछ का जी मचलने लगता है और कसमें टूट जाती है। मगर ‘सरकार’ छोड़ने के मूड में नहीं हैं। फिर से वादा पूरा करने की शपथ दिलाएंगे।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि ‘सभी कानून प्रवर्तन एजेंसियों को निर्देश दिया गया है कि शराब पर प्रतिबंध को पूरे प्रदेश में उचित तरीके से लागू किया जाए। इसका उल्लंघन करने वालों समेत सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। 26 नवंबर को ‘प्रतिबंध दिवस’ के मौके पर राज्य के सभी लोग ये शपथ लेंगे कि न तो वह खुद शराब का सेवन करेंगे और न ही इसकी बिक्री होने देंगे।’
कर्पूरी वाली चुनौती से कैसे निपटेंगे नीतीश?
ऐसी बात नहीं कि शराब बंद करने की कसम खाने वाले नीतीश कुमार पहले मुख्यमंत्री हैं। इनसे पहले साल 1977 में जननायक कर्पूरी ठाकुर ने भी शराब पर प्रतिबंध लगाया था। शराब की कालाबाजारी और कई दूसरे परेशानियों की वजह से ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका। नीतीश सरकार भी कुछ इसी तरह की परेशानियों से जूझ रही है।
मगर सीएम नीतीश का धैर्य अभी जवाब नहीं दिया है। एक बार फिर से वो शपथ दिला कर ही मानेंगे। दरअसल बिहार में शराबबंदी लागू करने से पहले पर्याप्त शोध नहीं हुआ। उसके विकल्पों की उपलब्धता और कालाबाजारी जैसे कारणों पर विचार ही नहीं किया गया। इसका ही नतीजा है कि जहरीली शराब की ओर लोग खींचे चले जाते हैं और फिर जान गंवा देते हैं।
क्या बिहार में शराबबंदी ढोंग की तरह है?
एक सर्वे में दावा किया गया था कि शराबबंदी से पहले बिहार में लगभग 29 प्रतिशत लोग शराब का सेवन करते थे। इसमें 0.2 फीसदी महिलाएं भी शामिल हैं। इसका मतलब ये हुआ कि करीब साढ़े तीन करोड़ लोग शराब का सेवन करते थे। इसमें 40 लाख लोग आदतन शराब पीते थे। मगर 1 अप्रैल 2016 को बिहार देश का ऐसा पांचवां राज्य बना, जहां शराब के सेवन और उसकी जमाखोरी पर प्रतिबंध लगा दी गई। पिछले पांच साल में करीब ढाई लाख से ज्यादा लोगों को शराबबंदी कानून के उल्लंघन पर जेल हुई।
भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 2020 में जो रिपोर्ट जारी की है उसके अनुसार बिहार में महाराष्ट्र से ज्यादा शराब का सेवन किया जाता है। राज्य में 15.5 प्रतिशत पुरुष शराब पीते हैं। महाराष्ट्र में शराब प्रतिबंधित नहीं है लेकिन शराब पीने वाले पुरुषों की तादाद 13.9 फीसदी है। ऐसे में शराबबंदी कानून एक ढोंग की तरह है। इसके वजह से भ्रष्टाचारियों ने सत्ता के समानांतर अर्थव्यवस्था खड़ी कर ली है। चंद लोग बहुत अमीर बन गए, जो लोग पकड़े जा रहे वो बहुत छोटे लोग हैं। असली धंधेबाज या फिर उन्हें मदद करने वाले ना तो पकड़े जा रहे हैं और ना ही उनपर किसी की नजर है।







