इन दिनों जलवायु बदलाव की समस्या की गंभीरता पर बहुत चर्चा होती है। विशेषकर ग्लासगो में आयोजित जलवायु बदलाव पर संयुक्त राष्ट्र संघ महासम्मेलन के आयोजन से तो यह विमर्श और आगे बढा है। फिर भी जब इस विषय पर विकासशील और निर्धन देशों से न्यायसंगत व्यवहार का सवाल उठता है तो प्रायः धनी देश उम्मीद के अनुकूल व्यवहार नहीं करते। उनकी कथनी तथा करनी में बहुत अंतर नजर आता है।
बडा सवाल यह है कि आखिर‚ धनी देशों की विकासशील और निर्धन देशों के प्रति जो जिम्मेदारी बनती है‚ वे इसे ठीक से क्यों नहीं निभा रहे। पहले औद्योगीकरण करने वाले धनी देशों ने ही ऐतिहासिक स्तर पर सबसे अधिक फॉसिल फ्यूल या जीवाश्म इधन का उपयोग किया। उन्होंने ही उपनिवेशों की लूट की और ऐसी जीवनशैली अपनाई जिससे अत्यधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। अतः जलवायु बदलाव के संकट की समझ बनने के आरंभिक वर्षों में उन्होंने स्वीकार किया कि हालांकि इस संकट का सामना करने के लिए जरूरी कदम सभी देशों ने उठाने हैं‚ पर इसके लिए धनी देशों की जिम्मेदारी अधिक है। इस समझ के अनुसार ही उन्होंने १०० अरब डॉलर वार्षिक के कोष की स्थापना का वादा २००९ में किया। इस वादे के साथ कि इससे विकासशील और निर्धन देशों को जलवायु बदलाव संबंधी नियंत्रण और अनुकूलन के कार्यों में सहायता दी जाएगी। इस वार्षिक कोष की स्थापना २०२० तक हो जानी चाहिए थी‚ पर २०२१ में भी यह लक्ष्य नहीं प्राप्त किया गया। इसमें सबसे बडी कमी पाई गई कि जहां इस कोष के लिए राशि अनुदान के रूप में प्राप्त होने की उम्मीद थी‚ वहां अधिकांश राशि कर्ज के रूप में मिली। हालांकि इसकी ब्याज दर प्रायः सामान्य से कुछ कम रखी गई। जो राशि जलवायु बदलाव का संकट कम करने के लिए दी जा रही है‚ उसको कर्ज के रूप में देना कतई उचित नहीं है अपितु इसे अनुदान के रूप में ही देना चाहिए। पर २०१८–१९ में अनुमान लगाया गया कि जलवायु बदलाव कोष के लिए प्राप्त राशि का ८० प्रतिशत हिस्सा कर्ज के रूप में दिया गया। इस तरह वास्तव में २०२० में १०० अरब डॉलर की जगह १६ अरब डॉलर की व्यवस्था हो सकी। इसके अतिरिक्त‚ अनेक विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या की गंभीरता और इसके नियंत्रण और अनुकूलन से जुडे कार्यों की व्यापकता को देखते हुए १०० अरब डॉलर वार्षिक की व्यवस्था भी बहुत कम है और वास्तव में धनी देशों की जिम्मेदारी इससे कहीं ज्यादा की बनती है।
यदि हम कुछ अन्य तुलनात्मक आंकडों को देखें तो यह स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी। अमेरिका में यानी केवल एक धनी देश में एक वर्ष में केवल शराब पर २५२ अरब डॉलर खर्च होते हैं। अमेरिका के साथ यूरोपियन यूनियन के देशों को जोड कर देखा जाए तो यहां केवल एक वर्ष में केवल सिगरेट पर २१० अरब डॉलर से अधिक खर्च होता है। केवल अमेरिका में छात्रों की शिक्षा के लिए बकाया कर्ज की राशि १७०० अरब डॉलर है। विलासिता की वस्तुओं का उत्पादन करने वाली फ्रांस की केवल एक कंपनी की परिसंपत्तियां १३३ अरब डॉलर की हैं।
विश्व के अरबपतियों की कुल संपदा १३००० अरब डॉलर की है। यदि उन पर केवल २ प्रतिशत टैक्स जलवायु बदलाव के कार्यों के लिए लगाया जाए तो इससे जलवायु बदलाव के प्रकोप को कम करने के कार्यों के लिए २६० अरब डॉलर प्राप्त किए जा सकते हैं। चार सबसे बडे अरबपति ऐसे हैं‚ जिनमें से हरेक की संपदा १०० अरब डॅालर से अधिक है। विश्व के १० सबसे बडे अरबपतियों की संपदा ही ११५३ अरब डॉलर है। २०२०–२१ के दौरान विश्व के सभी अरबपतियों की संपत्ति में ५००० अरब डॉलर की वृद्धि हुई और इस वृद्धि में से मात्र ५ प्रतिशत को यदि निर्धन और विकासशील देशों में जलवायु बदलाव के कार्यों के लिए प्राप्त कर लिया जाए तो लगभग २५० अरब डॉलर की प्राप्ति हो सकती है। यदि विश्व की कुल मनी लांड्रिंग को देखा जाए तो एक वर्ष में धन के अनुचित और अवैध उपयोग की राशि (संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार) लगभग १६०० अरब डॉलर है। इसे नियंत्रित कर यदि इसका १० प्रतिशत भी जलवायु बदलाव से जुडे जरूरी कार्यों में हो सके तो इस तरह १६० अरब डॉलर एक वर्ष में प्राप्त हो सकते हैं। विश्व में अंतरराष्ट्रीय व्यापार का कुल मूल्य एक वर्ष में १७००० अरब डॉलर हैं और इसकी तुलना में १०० अरब डॉलर की राशि तो बहुत ही कम है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर एक प्रतिशत की दर से कर इस दृष्टि से लगाया जाए तो निर्धन और विकासशील देशों में इस सार्थक कार्य के लिए १७० अरब डॉलर की राशि प्राप्त हो सकती है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो १०० अरब डॉलर के विश्व कोष की व्यवस्था जलवायु बदलाव जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए करना और निर्धन व विकासशील देशों तक इस सहायता को पहुंचाना कोई बडी बात नहीं है। निर्धन और विकासशील देशों के लिए विश्व स्तर पर जो जलवायु बदलाव कोष बन रहा है‚ वास्तव में उसकी राशि १०० अरब डॉलर से कहीं अधिक होनी चाहिए‚ जैसा कि अफ्रीका के अनेक जलवायु बदलाव वार्ताकारों और विशेषज्ञों ने कहा है। मान लीजिए कि २०० अरब डॉलर का ऐसा विश्व स्तर का कोष बन सके और विकासशील व निर्धन देशों में अपनी जनसंख्या के अनुकूल भारत को इस सहायता से लगभग २० प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हो जाए तो इस २०० अरब डॉलर के कोष से भारत को ४० अरब डॉलर की सहायता प्राप्त हो सकती है। ४० अरब डॉलर का अर्थ है लगभग ३००० अरब रुपये या ३००००० करोड रुपये और इस तरह की वार्षिक राशि से निश्चय ही बहुत उपयोगी कार्य किए जा सकते हैं।
यह भी जरूरी है कि इन कार्यों को निर्धन वर्ग की रोजी–रोटी के लिए जरूरी ऐसे कार्यों से जोडा जाए जिनसे जलवायु बदलाव नियंत्रण व अनुकूलन भी जुडा हो। पर्यावरण रक्षा से जुडी कृषि‚ वनीकरण और वन–रक्षा‚ आपदाओं से रक्षा के कार्य इस दृष्टि से सबसे अनुकूल है। यह भी जरूरी है कि ये सभी कार्य पारदर्शिता‚ पूरी ईमानदारी से किए जाएं। इनके लिए ऐसी व्यवस्थाएं तैयार हों जिनमें पूर्ण पारदर्शिता व शून्य भ्रष्टाचार सुनिश्चित किया जा सके। ऐसा कर सके तो इस कार्य को विश्व स्तर पर प्रशंसा प्राप्त होगी और इस कार्य को और विस्तार देने का माहौल बनेगा। यह ऐसा अवसर है जहां निर्धन वर्ग और छोटे किसानों व मजदूरों की टिकाऊ आजीविका और पर्यावरण की रक्षा के कार्यों को एक साथ आगे बढाया जा सकता है।







