अमित शाह की एनडीए को एकजुट करने की पहल रंग लाने लगी

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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व गृह मंत्री अमित शाह की एनडीए को एकजुट करने की पहल रंग लाने लगी है। शाह की सही समय पर अपने ‘‘खास नेता’ के लिए चेतावनी राजनीतिक बवंडर को थामने में असर दिखायी है। एक तरह से शाह के ‘‘शहद’ ने एनडीए की एकजुटता में मिठास घोलने का काम किया है।शाह के हस्तक्षेप से सहयोगी जदयू के नेता भी अब शुकून महसूस कर रहे हैं। जदयू ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ मिलकर ही चुनाव मैदान में उतरेगा। जदयू के राष्ट्रीय महासचिव आरसीपी सिंह का कहना है कि उनकी पार्टी एनडीए के साथ मजबूती से खड़ी है।

जानकारी के मुताबिक कुछ ऐसा ही बयान जदयू के वरिष्ठ नेता केसी त्यागी की तरफ से आया है। लिहाजा स्पष्ट है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व गृह मंत्री अमित शाह का निर्देश रंग लाया है। संकेत मिल रहे हैं कि भाजपा व जदयू की दोस्ती भी अब पटरी पर आ गई है। सूत्र बताते हैं कि केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के विवादित ट्वीट पर पार्टी अध्यक्ष के कड़े रुख के बाद प्रदेश के सभी बड़बोले भाजपा के नेता भी चेत गए हैं।

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भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की अपने केन्द्रीय मंत्री को दी गई चेतावनी से स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार जदयू के साथ-साथ चलने के मूड में हैं। ज्ञात हो कि भाजपा के फायर ब्रांड नेता और केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने पिछले दिनों सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर इफ्तार पार्टी की चार तस्वीरें ट्वीट कर राजनीतिक हलचल बढ़ा दी थी। सभी तस्वीरों में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अन्य नेताओं के साथ नजर आए। उन्होंने इन तस्वीरों को पोस्ट करते हुए लिखा कि ‘‘कितनी खूबसूरत तस्वीर होती जब इतनी ही चाहत से नवरात्र पर फलाहार का आयोजन करते और सुंदर सुंदर फोटो आते ? अपने कर्म धर्म में हम पिछड़ क्यों जाते और दिखावा में आगे रहते हैं?

इस ट्वीट पर सहयोगी जनता दल यूनाइटेड के नेताओं के साथ एनडीए नेताओं ने ऐतराज व्यक्त किया। चूंकि मामला भाजपा के केन्द्रीय मंत्री का है इसलिए पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने हस्तक्षेप करते हुए अपने नेता को ऐसे ट्वीट पर हिदायत दी। ज्ञात हो कि लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद 30 मई को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मंत्रियों की शपथ के ठीक पहले नीतीश कुमार की मंत्रिमंडल में जदयू की सांकेतिक भागीदारी को ठुकराने की घोषणा के बाद से ही सियासी तापमान काफी बढ़ गया था। इस सियासी गर्मी में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 02 जून को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार किया तब उसके सहयोगी भाजपा और लोजपा इसमें शामिल नहीं हुए। उसी दिन भाजपा और जदयू की ओर से दी गयी इफ्तार की अलग-अलग दावत में दोनों पार्टियों के वरिष्ठ नेता शामिल नहीं हुए लेकिन जदयू की दावत में हम के नेता और पूर्व मुख्यमत्री जीतन राम मांझी आये। वहीं, 03 मई को लोजपा की ओर से दी गयी इफ्तार पार्टी में श्री कुमार और भाजपा के नेता सुशील कुमार मोदी समेत राजग के कई नेता शामिल हुए।

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ताजा राजनीतिक परिस्थितियों से विपक्ष को आक्सीजन मिलने लगी थी। ऐसे में अमित शाह ने एनडीए को एकजुट करने का कदम उठाया।दरअसल भाजपा व जदयू दोनों को एहसास है कि संयुक्त टीम महागठबंधन पर हर समय कहर ढाएगी। दोनों एक दूसरे को स्वभाविक दोस्त भी मानते हैं। साथ ही एक साथ रहने पर दोनों को फायदा है। इसलिए अगले विधानसभा चुनाव तक दोनों चूक की गुंजाइश नहीं चाहते हैं। वर्ष 2014 में जब जदयू अकेले चुनाव लड़ा था तो उसे मात्र दो सीटें हाथ लगी थीं, किंतु वर्ष 2019 के चुनाव में भाजपा से हाथ मिलाने पर उसे 16 सीटें मिलीं। लेकिन बिहार की राजनीति कब किस तरफ करवट लेगी इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता है। उल्लेखनीय है कि इस बार भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए ने आंकड़े के अंकगणित में महागठबंधन को पटखनी दी है।

भाजपा-जदयू-लोजपा के गठजोड़ ने 53.22 फीसद मत लाकर महागठबंधन को पटखनी दी है। महागठबंधन को करीब 31 फीसद ही मद प्राप्त हुआ है। इस तरह एनडीए को करीब 22 फीसद सेअधिक मत प्राप्त हुआ है, जो रिकॉर्ड है। भाजपा को 23.62 फीसद मत प्राप्त हुआ है। जदयू को 21.7 फीसद मत प्राप्त हुआ है जबकि लोजपा को 7.9 फीसद मत प्राप्त हुआ। महागठबंधन में राजद को 15.4 फीसद, कांग्रेस को 7.7 फीसद, हम को 4 फीसद व अन्य को 4 फीसद मत प्राप्त हुआ है। यही कारण है कि बिहार में एनडीए को 39 सीटें मिली हैं। भाजपा की मजबूत गठजोड़ नीति के आगे महागठबंधन की एक भी नहीं चली।

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