किन वजहों से ग्लोबल आतंकी घोषित हुआ पुलवामा हमले का मास्टरमाइंड मसूद अजहर

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पुलवामा आतंकी हमले के मास्टरमाइंड मसूद अजहर को बुधवार को संयुक्त राष्ट्र ने ग्लोबल आतंकी घोषित किया. यह भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत में से एक है. लेकिन दिलचस्प है कि जिस पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने मसूद अजहर को ग्लोबल आतंकी घोषित कराने के लिए कोशिश में तेजी लाई, उसका संयुक्त राष्ट्र के फैसले में जिक्र नहीं है.

मसूद अज़हर को ब्लैक लिस्ट किए जाने और वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने को लेकर चीन के राज़ी होने पर सबके मन में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा कैसे हो गया? जो चीन पिछले दस सालों से इस काम में रोड़े अटका रहा था वह आखिर इस बात के लिए मान कैसे गया? लेकिन पिछले कुछ हफ्तों में जो घटनाएं घटित हुईं उन पर अगर नज़र दौड़ाई जाए तो इसे समझना थोड़ा आसान हो जाएगा.

इसी साल 13 मार्च में अमेरिका, यूके और फ्रांस मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने का प्रस्ताव लेकर आए थे, जिसका चीन ने विरोध किया था. हालांकि, भारत जैश-ए-मोहम्मद सरगना मसूद अज़हर के खिलाफ लगातार सबूत दे रहा था और तीनों देश इस बात के लिए चीन पर लगातार दबाव भी बना रहे थे. कई कूटनीतिक जानकारों को उम्मीद थी कि चीन इस बार झुक सकता है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के 15 देशों में से 14 देश, जैश सरगना को वैश्विक आतंकवादी घोषित किए जाने का समर्थन कर रहे थे. चीन लगातार अपने आपको सबसे अलग-थलग नहीं दिखाना चाहता था.

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पिछली बार चीन द्वारा रोक लगाने के बाद उसके पास इस मामले में फैसला करने के लिए 6 महीने का समय था. लेकिन, ऐसा लग रहा था कि अमेरिका इतना इंतज़ार करने के मूड में नहीं है. अमेरिका ने ये संदेश दे दिया था कि वह फिर से यूके और फ्रांस के साथ मिलकर सुरक्षा परिषद में प्रस्ताव लेकर आएगा. सूत्रों का कहना है कि इसी दबाव के चलते चीन, मसूद अज़हर को ब्लैक लिस्ट करने के लिए तैयार हुआ.

इस बीच अमेरिका से चीन के लिए कई बार फोन भी गया और कहा गया कि अगर चीन अपने स्टैंड में बदलाव नहीं करेगा तो अमेरिका रिज़ोल्यूशन का रास्ता अपनाएगा. दरअसल, सुरक्षा परिषद में किसी प्रस्ताव पर आम सहमति से विचार किया जाता है जबकि रिज़ोल्यूशन लाने पर उसे कम से कम नौ सदस्यों द्वारा पारित होना ज़रूरी होता है. बशर्ते, कोई स्थाई सदस्य इस पर वीटो न करे. अगर चीन रिज़ोल्यूशन पर वीटो करता तो वह पूरी तरह से बेनकाब हो जाता क्योंकि स्थाई सदस्यों का कर्तव्य है कि वह दुनिया में शांति बनाए रखने के लिए काम करें.

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बाद में एक खास प्रक्रिया ‘साइलेंस प्रोसीजर’ को अपनाया गया, जिसके तहत सदस्यों को अपना विरोध दर्ज करने के लिए एक या दो हफ्ते का समय दिया जाता है. अगर कोई सदस्य अपना विरोध दर्ज नहीं करता तो इसे पारित समझ लिया जाता है. इस मामले में न्यूयॉर्क के समयानुसार यह डेडलाइन 1 मई सुबह 9 बजे थी.

इसी बीच 22 अप्रैल को डेडलाइन खत्म होने के पहले भारत के विदेश सचिव विजय गोखले बातचीत के लिए बीजिंग भी गए थे. बाद में मीडिया के सामने उन्होंने कहा था कि चीन को मसूद अज़हर के आतंकवादी हमले में शामिल होने के सबूत दे दिए गए हैं.

उधर अमेरिका ने भले ही ईरान से तेल खरीदने के मामले में भारत को आगे छूट देने से मना कर दिया हो, लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर वह भारत का समर्थन करता है, क्योंकि उसे उम्मीद थी कि भारत भी ईरान में आतंकवाद को खत्म करने में उसका समर्थन करेगा.

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चीन ने इस बात की पुरज़ोर कोशिश की कि मसूद अज़हर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने में पुलवामा हमले का ज़िक्र न किया जाए, लेकिन सूत्रों का कहना है कि उसे ब्लैक लिस्ट करने के कई कारणों में से पुलवामा हमला भी एक वजह बताया गया है. साल 2009 में भारत अकेला ऐसा देश था जिसने मसूद अज़हर को ब्लैक लिस्ट करने का प्रस्ताव रखा था और आज भारत के साथ इतने देश खड़े हैं जो कि कूटनीतिक स्तर पर भारत की एक बड़ी जीत है.

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