राज्य में पूर्व मुख्यमंत्रियों को किस आधार पर दिया जा रहा आवास:पटना हाईकोर्ट

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पटना हाईकोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकार की ओर से आजीवन आवास की सुविधा देने पर हैरानी जताते हुए स्वत: संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश एपी शाही की खंडपीठ ने राज्य सरकार से जवाब तलब करते हुए पूछा है कि राज्य में पूर्व मुख्यमंत्रियों को किस आधार पर आवास दिया जा रहा है। कोर्ट ने इस बात को लेकर भी राज्य सरकार से जवाब तलब किया कि जब यूपी में पूर्व मुख्मंत्रियों को आवंटित आवास सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद निरस्त कर दिया गया तो बिहार में किस आधार पर लागू है। मंगलवार को इस मसले पर राज्य सरकार को कोर्ट में जवाब देना है। कोर्ट के इस संज्ञान के बाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्रियों के आजीवन आवास पर ग्रहण लग गया है। बिहार में जिन मुख्यमंत्रियों को अभी अभी आवास आवंटित है उनमें वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी हैं। मुख्यमंत्री की हैसियत से एक अणो मार्ग में रहने वाले नीतीश कुमार को पूर्व मुख्यमंत्री के नाते सात सकरुलर रोड में भी एक बंगला आवंटित है। जबकि लालू यादव व उनकी पत्नी राबड़ी देवी को एक ही बंगला दस सकुर्लर रोड आवंटित है। पूर्व मुख्यमंत्री के नाते जीतन राम मांझी को स्ट्रैंड रोड में तो 1968 में तीन दिनों के लिए मुख्यमंत्री रहे सतीश प्रसाद सिंह को भी आजीवन के लिए बंगला हार्डिग रोड में स्थित है। डॉ. जगन्नाथ मिश्रा के आजीवन आवास के लाभार्थी होने के बाद भी पटना जू के बगल में बेली रोड स्थित अपने निजी आवास में रहते हैं। इन्हें पूर्व मुख्यमंत्री पद छोड़ने वाला जनप्रतिनिधि के रूप काम करने व सुरक्षा के नियम के तहत आजीवन आवास की सुविधा दी जाती है। सरकार ने उनके लिए स्टाफ से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक का इंतजाम किया है। बिहार सरकार ने इसके लिए बाकायदा कानून बनाया हुआ है। सुरक्षा मुहैया कराने वाली कमेटी की सिफारिश पर कई को ज्यादा सुरक्षा भी है। हाल में लालू परिवार की सुरक्षा, मुद्दा बना था। जबकि सुप्रीम कोर्ट अपने एक आदेश में कह चुका है कि मुख्यमंत्री पद छोड़ने वाला जनप्रतिनिधि के रूप में अन्य प्रोटोकल व सुरक्षा तो मांग सकता है, लेकिन आजीवन आवास की सुविधा समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। यह नियम एक अलग श्रेणी के गठन की बात करता है। सिर्फ महत्वपूर्ण पद पर काम करने के आधार पर किसी को सरकारी आवास देने की बात गलत है। बंगलों से यूपी के पूर्व मुख्यमंत्रियों को किया जा चुका है बेदखलबिहार के हाईकोर्ट के संज्ञान से पहले सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस कानून को रद्द कर दिया था जिसमें पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवास के बंगले का प्रावधान था। जिसके बाद यूपी के छह मुख्यमंत्रियों को आजीवन के लिए आवंटित आवास से बेदखल होना पड़ा था। गौरतलब है कि यूपी में मिनिस्टरी सैलरी अलॉटमेंट एंड फेसिलिटी अमेंडमेंट एक्ट 2016 के तहत पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी आवास और सरकारी बंगला की सुविधा दिलायी गयी थी। जिसे जनहित याचिका के तहत एक एनजीओ ने चुनौती दी थी। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यूपी सरकार के सेक्शन 4(3) को असंवैधानिक मानते हुए अपने आदेश में कहा था कि सरकारी बंगला सार्वजनिक संपत्ति है। कोर्ट के आदेश के बाद मुलायम सिंह यादव, राजनाथ सिंह, मायावती, कल्याण सिंह, नारायण दत्त तिवारी और अखिलेश यादव को पूर्व मुख्यमंत्री के नाते आजीवन के लिए आवंटित बंगला से बेदखल होना पड़ा। राज्यों के मुताबिक व्यवस्थाराज्यों ने अपने मुताबिक पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन आवास देने का कानून बना रखा है। कुछ राज्यों में उत्तर प्रदेश की ही तरह पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगले दिए जाने का प्रावधान है तो कुछ राज्य ऐसे भी हैं, जहां वर्तमान में इस प्रकार की कोई व्यवस्था नहीं है। उत्तराखंड में पूर्व मुख्यमंत्रियों को बंगला आवंटित करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसके अलावा हिमाचल प्रदेश और पश्चिम बंगाल में भी पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला देने की कोई व्यवस्था नहीं है। हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा सरकार के समय बंगला देने का प्रावधान था, परंतु मनोहर लाल ने मुख्यमंत्री बनने के बाद उसे समाप्त कर दिया। हालांकि बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, पंजाब और जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले मिले हुए हैं। समानता के खिलाफ है सरकारी आजीवन आवाससुप्रीम कोर्ट पूर्व मुख्यमंत्रियों को मिलने वाले सरकारी आवास पर अपने आदेश में इसे समानता के खिलाफ बता चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है कि सरकारी आवास सिर्फ जनता के लिए काम करने वालों की खातिर है। मुख्यमंत्री पद छोड़ने वाला जनप्रतिनिधि के रूप में अन्य प्रोटोकल व सुरक्षा तो मांग सकता है, लेकिन आजीवन आवास की सुविधा समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। यह नियम एक अलग श्रेणी के गठन की बात करता है। सिर्फ महत्वपूर्ण पद पर काम करने के आधार पर किसी को सरकारी आवास देने की बात गलत है।

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