समलैंगिकता अपराध या नहीं, सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई

0
243

उच्चतम न्यायालय ने सहमति से दो वयस्कों के बीच शारीरिक संबंधों को फिर से अपराध की श्रेणी में शामिल करने के शीर्ष अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ द्वारा आज सुनवाई स्थगित करने का केन्द्र का अनुरोध ठुकरा दिया। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर और न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चंद्रचूड़ की खंडपीठ ने सुनवाई टालने से इनकार कर दिया। केंद्र सरकार ने समलैंगिक संबंधों पर जनहित याचिकाओं पर जवाब दाखिल करने के लिए और वक्त देने का अनुरोध किया था।

नये सिरे से पुनर्गठित पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को आज से चार महत्वपूर्ण विषयों पर सुनवाई शुरू करनी है जिनमें समलैंगिकों के बीच शारीरिक संबंधों का मुद्दा भी है। इस संविधान पीठ में प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के साथ न्यायमूर्ति आर एफ नरिमन, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनन्जय वाई चन्द्रचूड़ और न्यायमूर्ति इन्दु मल्होत्रा शामिल हैं। उच्चतम न्यायालय ने 2013 में समलैंगिक वयस्कों के बीच संबंधों को अपराध की श्रेणी में बहाल किया था।

यह भी पढ़े  उपचुनाव : लोकसभा की चार, विधानसभा की 10 सीटों के लिए मतदान जारी

न्यायालय ने समलैंगिक वयस्कों के बीच सहमति से संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के दिल्ली उच्च न्यायालय के 2009 के फैसले को रद्द कर दिया था। इसके बाद पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गयीं और उनके खारिज होने पर प्रभावित पक्षों ने मूल फैसले के पुन: अध्ययन के लिए सुधारात्मक याचिकाएं दाखिल की गयी थीं।

सुधारात्मक याचिकाओं के लंबित रहने के दौरान अर्जी दाखिल की गयी कि खुली अदालत में सुनवाई होनी चाहिए जिस पर शीर्ष अदालत राजी हो गया। इसके बाद धारा 377 को अपराध की श्रेणी से बाहर रखने के लिए कई रिट याचिकाएं दाखिल की गयीं। धारा 377 ‘अप्राकृतिक अपराधों’ से संबंधित है।

आईपीसी की धारा 377 के तहत 2 लोग आपसी सहमति या असहमति से अप्राकृतिक सेक्स करने पर अगर दोषी करार दिए जाते हैं तो उन्हें 10 साल से लेकर उम्रकैद की सजा हो सकती है। वहीं सेक्स वर्करों के लिए काम करने वाले एनजीओ नाज फाउंडेशन की ओर से दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की गई थी और धारा-377 के संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था। अर्जी में कहा गया था कि अगर दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से एकांत में अप्राकृतिक संबंध बनाए जाते हैं तो उसे धारा-377 के प्रावधान से बाहर किया जाना चाहिए।

यह भी पढ़े  मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामला : सजा के तौर पर दिन भर कोर्ट के कोने में बैठे रहे नागेश्वर राव

उच्चतम न्यायालय ने 11 दिसंबर 2013 को इस मामले में दिए अपने ऐतिहासिक फैसले में समलैंगिकता के मामले में उम्रकैद तक की सजा के प्रावधान वाले कानून को बहाल रखा। न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले को खारिज कर दिया जिसमें दो बालिगों द्वारा आपस में सहमति से समलैंगिक संबंध बनाए जाने को अपराध की कैटगरी से बाहर किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकार चाहे तो कानून में बदलाव कर सकती है। उच्चतम न्यायालय ने मामले को संसद के पाले में डाल दिया था।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here