मौजूदा दौर में शासक हो गया है दमनकारी : मुखर्जी

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पटना – कार्ल मार्क्‍स की 200 वीं जयंती के मौके पर आद्री के तत्वावधान में ‘‘कार्ल मार्क्‍स-जीवन, विचार, प्रभाव : द्विशतवार्षिकी पर एक आलोचनात्मक परीक्षण’ विषय पर आयोजित पांच-दिवसीय अंतराष्ट्रीय सम्मेलन के दूसरे दिन रविवार को वक्ताओं ने मार्क्‍स के सिद्धांत के बाद दुनिया में आये बदलाव को रखा। जॉन रॉबिंसन स्मारक व्याख्यान देते हुए आद्री के अध्यक्ष तथा जेएनयू के पूर्व प्रो. अंजन मुखर्जी ने कहा कि सूचनाओं के प्रवाह ने श्रमिक वर्ग में अधिक मजदूरी के लिए काफी आशा पैदा की है। इसके कारण सत्ता की ओर से अधिक दमनकारी उपाय भी किये गये हैं। जीवन निर्वाहमूलक मजदूरी की अवधारणा का मार्क्‍स सिद्धांतों में उल्लेख किया भी गया था। लेकिन रेडियो, टेलीविजन और अभी सोशल मीडिया के उद्भव से सूचना के बढ़े प्रवाह ने श्रमिक वर्ग की आकांक्षाओं को बढ़ाया है जो अब उस अधिक वेतन के जरिये सुख-सुविधा के आधुनिक सामान हासिल करना चाहते हैं। इसके कारण दिहाड़ी श्रमिकों की मांगों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण होने के बजाय शासन अधिक दमनकारी हो गया है। ऐसी स्थिति में मार्क्‍स की विचारधारा की प्रासंगिकता और बढ़ गयी है। अमेरिका के मोरहाउस कॉलेज, एटलांटा के एसोसिएट प्रो. क्रिप्टन जेंसन ने अपने डीडी कौशंबी स्मारक व्याख्यान देते हुए कहा कि मार्टिन लूथर किंग ने कहा था कि ‘‘ अन्य देशों में मैं पर्यटक के रूप में जाता हूं, लेकिन भारत में मैं तीर्थयात्री के रूप में जाता हूं। उन्होंने कहा कि अेत लोगों के अधिकारों के यौद्धा मार्टिन ने यह बात स्पष्टत: महात्मा गांधी के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करते हुए कही थी। प्रो. जेंसन ने अमेरिका में मार्क्‍सवाद के इतिहास पर बोलते हुए कहा कि गुलामी के संकट ने यूरोप की आर्थिक शक्ति में वृद्धि कर दी। उन्होंने अमेरिका में मार्क्‍सवाद की 150 वर्ष की यात्रा को विभिन्न काल खंडों के जरिये उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि 1968 में पुनर्निर्माण काल, उसके बाद जन युद्ध, 1918 में समाजवादी दल का उभार, 1968 में गरीब लोगों का अभियान और उसके बाद मार्टिन लूथर किंग की हत्या, तथा विद्वानों द्वारा 2018 में वर्तमान भूराजनीतिक दौर का आशय बताने के लिए मार्क्‍सवाद का उपयोग किया। अमेरिका के अेतों और भारत के अछूतों के बीच समानता की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए उन्होंने कहा कि अपने वैध अधिकारों के लिहाज से अेत अभी भी काफी कुछ हासिल नहीं कर पाए हैं। दिल्ली के हिंदू कॉलेज के एसोसिएट प्रो.ईश मिश्रा ने कहा कि बुजरुआ लोकतांत्रिक क्रांति के अपूर्ण कार्यभार को पूरा करने में भारतीय साम्यवादियों की असफलता बाद में पहचान आधरित राजनीति में वृद्धि का कारण बन गई। उन्होंने कहा कि भारत के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में सामाजिक न्याय समूहों के एक हिस्से द्वारा अपनी मुक्ति के प्रयास में श्रमिकों, किसानों, दलितों, आदिवासियों और अन्य लोगों में वर्ग चेतना के प्रसार के जरिये जातिगत पहचान पर दिया गया जोर सांप्रदायिक ताकतों द्वारा धर्मिक पहचान पर जोर की राह में बड़ी बाधा है। सोवियत में पूर्वी देशों के मार्क्‍सवादी अध्ययन का उद्भव और स्टालिनवादी विरूपण’ शीर्षक फेडरिक एंजेल्स स्मारक व्याख्यान देने वाले यूके के शोफील्ड विविद्यालय के प्रो. क्रेग शामिल थे। रिकाडरे बेलीफियोर ने ‘‘क्या मार्क्‍स पर जीवन है पूंजीवादी उत्पादन के वृहद-मौद्रिक सिद्धांत के बतौर राजनीतिक अर्थशास्त्र की आलोचना’ विषयक मॉरिस डॉब स्मारक व्याख्यान दिया। वहीं ऑक्सफोर्ड विविद्यालय की सेवानिवृत्त प्रो.बारबरा हैरिस शइट ने वैश्वीकरण के दौर में विज्ञान और नीति’ विषयक ऑटो न्यूराथ स्मारक व्याख्यान दिया। अपना आलेख ‘‘क्रांति, मुक्ति और सामाजिक पुनरुत्पादन’ प्रस्तुत करते हुए जेएनयू की एसोसिएट प्रो. चिरश्री दासगुप्ता ने निष्कर्ष प्रस्तुत किया कि सामाजिक पुनरुत्पादन के समतावाद के बजाय उत्पादक शक्तियों के विकास व्यापक रूपांतरण का फोकस मानना क्रांतिकारी प्रक्रिया के उद्देश्यों को पीछे धकेल सकता है। पांच-दिवसीय सम्मेलन के दूसरे दिन सात व्याख्यान दिए गए और चार आलेख प्रस्तुत किए गए।

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