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इस्राइल अपने दुश्मनों के साथ सहयोगियों के खिलाफ भी खुफिया जानकारी जुटाता है !…………..

UB India News by UB India News
June 9, 2026
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इस्राइल अपने दुश्मनों के साथ सहयोगियों के खिलाफ भी खुफिया जानकारी जुटाता है !…………..
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28 फरवरी को जब इस्राइल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर हमला बोला था, तब पूरी दुनिया के सामने यह खुलकर सामने आया कि दोनों ही देश एक-दूसरे से खुलकर खुफिया जानकारियां साझा कर रहे हैं। धीरे-धीरे अलग-अलग रिपोर्ट्स में भी यह साफ होने लगा कि आखिर कैसे इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान पर हमले के लिए तैयार किया। यहां तक कि कौन सी खुफिया जानकारी उनसे साझा की और कौन से खतरों पर ट्रंप को आगाह किया, जिसके चलते दोनों देशों ने साथ में ही ईरान पर हमला बोला।

हालांकि, अब ईरान युद्ध के बीच में ही अमेरिका और इस्राइल के बीच दरार पड़ती नजर आ रही है। दरअसल, हाल ही में अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस्राइल की जासूसी के जोखिम को लेकर अलर्ट जारी किया है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले इस्राइली खुफिया गतिविधियों को लेकर जो सतर्कता उच्च स्तर पर थी, अब उसे बढ़ाकर क्रिटिकल यानी संकटपूर्ण घोषित कर दिया गया है। सीधे शब्दों में समझें तो अमेरिका को इस्राइली खुफिया तंत्र की तरफ से जासूसी का खतरा और ज्यादा महसूस होने लगा है।

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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर पेंटागन की रिपोर्ट में इस्राइल को लेकर क्या कहा गया है? ट्रंप प्रशासन का इस पर क्या रवैया है? इस्राइल की तरफ से इस मामले में क्या सफाई दी गई है? साथ ही इस्राइल पर पहले कब अमेरिका की जासूसी करने के आरोप लगे हैं?
पेंटागन की रिपोर्ट में इस्राइल को लेकर क्या कहा गया है?
पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) की रिपोर्ट में इस्राइल के जासूसी खतरे के स्तर को सर्वोच्च स्तर पर कर दिया गया है। इसे लेकर पहले अमेरिकी मीडिया चैनल एनबीसी न्यूज और बाद में अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (एनवाईटी) ने ब्योरा दिया। बताया गया है कि पेंटागन की सात पन्नों की इस रिपोर्ट में इस्राइल को लेकर कई गंभीर दावे किए गए हैं।

अमेरिका के किन अधिकारियों की जासूसी का शक?

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस्राइल अमेरिकी सैन्य कर्मियों, सरकारी अधिकारियों और नीति-संबंधी चर्चाओं की जानकारी इकट्ठा करने के लिए आक्रामक रूप से जासूसी कर रहा है। जिन लोगों की जासूसी की जा रही है, उनमें ट्रंप के करीबी स्टीव विटकॉफ का नाम भी शामिल है।
जासूसी के लिए क्या तरीका अपना रहा इस्राइल?
पेंटागन की रिपोर्ट्स में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि इस्राइल की मानवीय जासूसी और तकनीकी खुफिया जानकारी जुटाने की क्षमता दोनों पर ही उच्चतम स्तर पर काम कर रही हैं। रिपोर्ट में उन घटनाओं का जिक्र किया गया है जहां इस्राइली जाससूों की तरफ से पहले अमेरिकी रक्षा कर्मियों के फोन में उनकी बातचीत सुनने के लिए गुप्त रूप से सॉफ्टवेयर इंस्टॉल किए थे। साथ ही होटल में लिसनिंग डिवाइस (बातचीत सुनने वाले उपकरण) लगाए गए थे।

पेंटागन ने क्या बताया इस्राइल की तरफ से जासूसी का मकसद?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों की जासूसी करने के पीछे इस्राइल का पहला और मुख्य मकसद ईरान के साथ चल रही शांति वार्ता और पश्चिम एशिया को लेकर अमेरिका की रणनीतियों की खुफिया जानकारी जुटाना है। ईरान के साथ ट्रंप प्रशासन कूटनीतिक प्रयासों के जरिए ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने और एक व्यापक समझौता करने का प्रयास कर रहा है। इसके उलट इस्राइल इन वार्ताओं के सख्त खिलाफ है और वह ईरानी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए सैन्य दबाव जारी रखना चाहता है। इस्राइल इस वार्ता में अमेरिका के रुख, बातचीत की स्थिति और रणनीतियों को वास्तविक समय में जानने के लिए यह जासूसी कर रहा है।

पेंटागन की रिपोर्ट के अनुसार, इस्राइली नीति निर्माताओं को डर है कि अगर वॉशिंगटन और तेहरान के बीच कोई लंबी अवधि का कूटनीतिक समझौता हो जाता है, तो इससे भविष्य में ईरान के खिलाफ इस्राइल की सैन्य कार्रवाई करने की स्वतंत्रता सीमित हो जाएगी। इसलिए, इस खुफिया जानकारी का रणनीतिक मकसद ऐसी किसी भी बातचीत को प्रभावित करना, पटरी से उतारना या कमजोर करना है, जो इस्राइल के सुरक्षा हितों के खिलाफ हो।

ईरान के अलावा, इस्राइल इस बात की भी आक्रामक रूप से जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहा है कि ट्रंप प्रशासन पश्चिम एशिया के बाकी संघर्षों को लेकर आंतरिक रूप से क्या विचार-विमर्श कर रहा है।

ट्रंप प्रशासन का इस्राइली जासूसी के दावों पर क्या रवैया? 

व्हाइट हाउस का स्पष्ट इनकार: व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने इन जासूसी रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया है। अधिकारी ने कहा कि यह पूरी कहानी गलत है और इसे ऐसे व्यक्तियों के हवाले से तैयार किया गया है, जिन्हें आंतरिक मामलों या घटनाक्रमों की कोई जानकारी नहीं है।

पेंटागन ने साधी चुप्पी: जहां एक ओर ये रिपोर्ट्स पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी की तरफ से जारी की गई बताई जा रही हैं, वहीं अमेरिकी रक्षा विभाग- पेंटागन और राष्ट्रीय खुफिया निदेशक के कार्यालय ने सार्वजनिक रूप से इस मामले पर कोई भी आधिकारिक टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया है।

ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ता टकराव: भले ही व्हाइट हाउस जासूसी की रिपोर्ट्स को नकार रहा है, लेकिन पश्चिम एशिया की नीतियों को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इस्राइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के बीच रिश्ते इस समय बेहद तल्ख दौर से गुजर रहे हैं। हाल ही में दोनों नेताओं के बीच एक बेहद तनावपूर्ण फोन कॉल भी हुई थी।

  • इस बातचीत में ट्रंप ने लेबनान और ईरान को लेकर इस्राइल की आक्रामक सैन्य कार्रवाइयों पर नेतन्याहू पर कड़ा गुस्सा जाहिर किया था।
  • ट्रंप ने नेतन्याहू को स्पष्ट चेतावनी दी कि उनके कदम इस्राइल की छवि को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
  • रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने नेतन्याहू से यहां तक कहा था कि अब हर कोई आपसे नफरत करता है। इस वजह से हर कोई इस्राइल से नफरत करता है।

पेंटागन की रिपोर्ट पर इस्राइल की क्या सफाई?

वॉशिंगटन में इस्राइली दूतावास के एक प्रवक्ता ने इन जासूसी के दावों को पूरी तरह से झूठ करार दिया है। दूतावास ने इस बात का भी खंडन किया कि इस्राइल किसी भी प्रकार का काउंटर-इंटेलिजेंस खतरा पैदा करता है। इस्राइली प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इस्राइल अमेरिकी संस्थाओं की खुफिया जानकारी इकट्ठा नहीं करता है, अमेरिकी सरकारी अधिकारियों की तो बात ही छोड़ दें।

तो क्या पहले अमेरिका में जासूसी के आरोपों में घिरा है इस्राइल?

ऐसा नहीं है कि अमेरिका की तरफ से इस्राइल के जासूसी के खतरे को लेकर पहली बार अलर्ट जारी हुआ है। इससे पहले भी अमेरिका में जासूसी के कई गंभीर मामलों में शामिल रहा है और इसका एक लंबा इतिहास है। अधिकारी और विशेषज्ञ यह मानते हैं कि अमेरिका और इस्राइल दोनों को लंबे समय से एक-दूसरे की जासूसी करने की जानकारी रही है और वे इसे काफी हद तक बर्दाश्त भी करते आए हैं।

1. जोनाथन पोलार्ड जासूसी कांड (1985)

यह अमेरिका और इस्राइल के बीच अब तक के सबसे जाने-माने और बड़े जासूसी कांडों में से एक माना जाता है। जोनाथन पोलार्ड अमेरिकी नौसेना के लिए एक नागरिक खुफिया विश्लेषक के तौर पर काम करते थे। उन्हें 1985 में इस्राइल को भारी मात्रा में खुफिया जानकारी और दस्तावेज सौंपने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। पोलार्ड ने अपना दोष स्वीकार किया था और 2015 में पैरोल पर रिहा होने से पहले 30 साल जेल में बिताए थे।

2. अमेरिकी नीतियों में घुसपैठ की कोशिश का आरोप

किंग्स कॉलेज लंदन के सुरक्षा विभाग के प्रोफेसर एंड्रियास क्रेग ने कतर के अखबार अल-जजीरा को बताया कि इस्राइल का अमेरिका के अंदर खुफिया अभियान चलाने का एक बहुत लंबा ट्रैक रिकॉर्ड रहा है। दशकों से इस्राइल ने अमेरिकी रणनीतिक सोच और निर्णयों को समझने के लिए औपचारिक और अनौपचारिक नेटवर्क, जिनमें खुफिया और लॉबिंग चैनल शामिल हैं, के जरिए अमेरिकी नीति-निर्माण हलकों में गहरी पैठ बनाने की कोशिश की है।

3. जासूसी की हालिया घटनाएं

  • 2021 में इस्राइली सैन्य खुफिया अधिकारियों को पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी के मुख्यालय में ही कथित तौर पर बातचीत सुनने वाले उपकरण लगाते हुए पकड़ा गया था।
  • पिछले साल इस्राइल की घरेलू खुफिया एजेंसी शिन बेत के अधिकारियों को एक अमेरिकी सीक्रेट सर्विस के वाहन में भी ऐसा ही सुनने वाला डिवाइस लगाने की कोशिश करते पकड़ा गया।
डीआईए की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि इस्राइल की तरफ से अमेरिका की जासूसी की घटनाओं में 2024 के अंत से काफी तेजी आई थी। यह उछाल उस समय शुरू हुआ जब तत्कालीन बाइडन प्रशासन गाजा युद्ध को लेकर इस्राइल पर दबाव डाल रहा था, और यह सिलसिला नए ट्रंप प्रशासन के आने और ईरान के प्रति नीतियां बनाने तक जारी रहा। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इस्राइल अपने दुश्मनों के साथ-साथ अपने सहयोगियों (जैसे अमेरिका) के खिलाफ भी खुफिया जानकारी जुटाने में बहुत आक्रामक रहा है।

28 फरवरी को जब इस्राइल और अमेरिका ने मिलकर ईरान पर हमला बोला था, तब पूरी दुनिया के सामने यह खुलकर सामने आया कि दोनों ही देश एक-दूसरे से खुलकर खुफिया जानकारियां साझा कर रहे हैं। धीरे-धीरे अलग-अलग रिपोर्ट्स में भी यह साफ होने लगा कि आखिर कैसे इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को ईरान पर हमले के लिए तैयार किया। यहां तक कि कौन सी खुफिया जानकारी उनसे साझा की और कौन से खतरों पर ट्रंप को आगाह किया, जिसके चलते दोनों देशों ने साथ में ही ईरान पर हमला बोला।

हालांकि, अब ईरान युद्ध के बीच में ही अमेरिका और इस्राइल के बीच दरार पड़ती नजर आ रही है। दरअसल, हाल ही में अमेरिकी रक्षा विभाग ने इस्राइल की जासूसी के जोखिम को लेकर अलर्ट जारी किया है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले इस्राइली खुफिया गतिविधियों को लेकर जो सतर्कता उच्च स्तर पर थी, अब उसे बढ़ाकर क्रिटिकल यानी संकटपूर्ण घोषित कर दिया गया है। सीधे शब्दों में समझें तो अमेरिका को इस्राइली खुफिया तंत्र की तरफ से जासूसी का खतरा और ज्यादा महसूस होने लगा है।

ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर पेंटागन की रिपोर्ट में इस्राइल को लेकर क्या कहा गया है? ट्रंप प्रशासन का इस पर क्या रवैया है? इस्राइल की तरफ से इस मामले में क्या सफाई दी गई है? साथ ही इस्राइल पर पहले कब अमेरिका की जासूसी करने के आरोप लगे हैं?
पेंटागन की रिपोर्ट में इस्राइल को लेकर क्या कहा गया है?
पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (डीआईए) की रिपोर्ट में इस्राइल के जासूसी खतरे के स्तर को सर्वोच्च स्तर पर कर दिया गया है। इसे लेकर पहले अमेरिकी मीडिया चैनल एनबीसी न्यूज और बाद में अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स (एनवाईटी) ने ब्योरा दिया। बताया गया है कि पेंटागन की सात पन्नों की इस रिपोर्ट में इस्राइल को लेकर कई गंभीर दावे किए गए हैं।

अमेरिका के किन अधिकारियों की जासूसी का शक?

रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि इस्राइल अमेरिकी सैन्य कर्मियों, सरकारी अधिकारियों और नीति-संबंधी चर्चाओं की जानकारी इकट्ठा करने के लिए आक्रामक रूप से जासूसी कर रहा है। जिन लोगों की जासूसी की जा रही है, उनमें ट्रंप के करीबी स्टीव विटकॉफ का नाम भी शामिल है।
जासूसी के लिए क्या तरीका अपना रहा इस्राइल?
पेंटागन की रिपोर्ट्स में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि इस्राइल की मानवीय जासूसी और तकनीकी खुफिया जानकारी जुटाने की क्षमता दोनों पर ही उच्चतम स्तर पर काम कर रही हैं। रिपोर्ट में उन घटनाओं का जिक्र किया गया है जहां इस्राइली जाससूों की तरफ से पहले अमेरिकी रक्षा कर्मियों के फोन में उनकी बातचीत सुनने के लिए गुप्त रूप से सॉफ्टवेयर इंस्टॉल किए थे। साथ ही होटल में लिसनिंग डिवाइस (बातचीत सुनने वाले उपकरण) लगाए गए थे।

पेंटागन ने क्या बताया इस्राइल की तरफ से जासूसी का मकसद?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों की जासूसी करने के पीछे इस्राइल का पहला और मुख्य मकसद ईरान के साथ चल रही शांति वार्ता और पश्चिम एशिया को लेकर अमेरिका की रणनीतियों की खुफिया जानकारी जुटाना है। ईरान के साथ ट्रंप प्रशासन कूटनीतिक प्रयासों के जरिए ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने और एक व्यापक समझौता करने का प्रयास कर रहा है। इसके उलट इस्राइल इन वार्ताओं के सख्त खिलाफ है और वह ईरानी सरकार को सत्ता से बेदखल करने के लिए सैन्य दबाव जारी रखना चाहता है। इस्राइल इस वार्ता में अमेरिका के रुख, बातचीत की स्थिति और रणनीतियों को वास्तविक समय में जानने के लिए यह जासूसी कर रहा है।

पेंटागन की रिपोर्ट के अनुसार, इस्राइली नीति निर्माताओं को डर है कि अगर वॉशिंगटन और तेहरान के बीच कोई लंबी अवधि का कूटनीतिक समझौता हो जाता है, तो इससे भविष्य में ईरान के खिलाफ इस्राइल की सैन्य कार्रवाई करने की स्वतंत्रता सीमित हो जाएगी। इसलिए, इस खुफिया जानकारी का रणनीतिक मकसद ऐसी किसी भी बातचीत को प्रभावित करना, पटरी से उतारना या कमजोर करना है, जो इस्राइल के सुरक्षा हितों के खिलाफ हो।

ईरान के अलावा, इस्राइल इस बात की भी आक्रामक रूप से जानकारी जुटाने की कोशिश कर रहा है कि ट्रंप प्रशासन पश्चिम एशिया के बाकी संघर्षों को लेकर आंतरिक रूप से क्या विचार-विमर्श कर रहा है।

ट्रंप प्रशासन का इस्राइली जासूसी के दावों पर क्या रवैया? 

व्हाइट हाउस का स्पष्ट इनकार: व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने इन जासूसी रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया है। अधिकारी ने कहा कि यह पूरी कहानी गलत है और इसे ऐसे व्यक्तियों के हवाले से तैयार किया गया है, जिन्हें आंतरिक मामलों या घटनाक्रमों की कोई जानकारी नहीं है।

पेंटागन ने साधी चुप्पी: जहां एक ओर ये रिपोर्ट्स पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी की तरफ से जारी की गई बताई जा रही हैं, वहीं अमेरिकी रक्षा विभाग- पेंटागन और राष्ट्रीय खुफिया निदेशक के कार्यालय ने सार्वजनिक रूप से इस मामले पर कोई भी आधिकारिक टिप्पणी करने से साफ इनकार कर दिया है।

ट्रंप और नेतन्याहू के बीच बढ़ता टकराव: भले ही व्हाइट हाउस जासूसी की रिपोर्ट्स को नकार रहा है, लेकिन पश्चिम एशिया की नीतियों को लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इस्राइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के बीच रिश्ते इस समय बेहद तल्ख दौर से गुजर रहे हैं। हाल ही में दोनों नेताओं के बीच एक बेहद तनावपूर्ण फोन कॉल भी हुई थी।

  • इस बातचीत में ट्रंप ने लेबनान और ईरान को लेकर इस्राइल की आक्रामक सैन्य कार्रवाइयों पर नेतन्याहू पर कड़ा गुस्सा जाहिर किया था।
  • ट्रंप ने नेतन्याहू को स्पष्ट चेतावनी दी कि उनके कदम इस्राइल की छवि को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
  • रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने नेतन्याहू से यहां तक कहा था कि अब हर कोई आपसे नफरत करता है। इस वजह से हर कोई इस्राइल से नफरत करता है।

पेंटागन की रिपोर्ट पर इस्राइल की क्या सफाई?

वॉशिंगटन में इस्राइली दूतावास के एक प्रवक्ता ने इन जासूसी के दावों को पूरी तरह से झूठ करार दिया है। दूतावास ने इस बात का भी खंडन किया कि इस्राइल किसी भी प्रकार का काउंटर-इंटेलिजेंस खतरा पैदा करता है। इस्राइली प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि इस्राइल अमेरिकी संस्थाओं की खुफिया जानकारी इकट्ठा नहीं करता है, अमेरिकी सरकारी अधिकारियों की तो बात ही छोड़ दें।

तो क्या पहले अमेरिका में जासूसी के आरोपों में घिरा है इस्राइल?

ऐसा नहीं है कि अमेरिका की तरफ से इस्राइल के जासूसी के खतरे को लेकर पहली बार अलर्ट जारी हुआ है। इससे पहले भी अमेरिका में जासूसी के कई गंभीर मामलों में शामिल रहा है और इसका एक लंबा इतिहास है। अधिकारी और विशेषज्ञ यह मानते हैं कि अमेरिका और इस्राइल दोनों को लंबे समय से एक-दूसरे की जासूसी करने की जानकारी रही है और वे इसे काफी हद तक बर्दाश्त भी करते आए हैं।

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यह अमेरिका और इस्राइल के बीच अब तक के सबसे जाने-माने और बड़े जासूसी कांडों में से एक माना जाता है। जोनाथन पोलार्ड अमेरिकी नौसेना के लिए एक नागरिक खुफिया विश्लेषक के तौर पर काम करते थे। उन्हें 1985 में इस्राइल को भारी मात्रा में खुफिया जानकारी और दस्तावेज सौंपने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। पोलार्ड ने अपना दोष स्वीकार किया था और 2015 में पैरोल पर रिहा होने से पहले 30 साल जेल में बिताए थे।

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3. जासूसी की हालिया घटनाएं

  • 2021 में इस्राइली सैन्य खुफिया अधिकारियों को पेंटागन की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी के मुख्यालय में ही कथित तौर पर बातचीत सुनने वाले उपकरण लगाते हुए पकड़ा गया था।
  • पिछले साल इस्राइल की घरेलू खुफिया एजेंसी शिन बेत के अधिकारियों को एक अमेरिकी सीक्रेट सर्विस के वाहन में भी ऐसा ही सुनने वाला डिवाइस लगाने की कोशिश करते पकड़ा गया।
डीआईए की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि इस्राइल की तरफ से अमेरिका की जासूसी की घटनाओं में 2024 के अंत से काफी तेजी आई थी। यह उछाल उस समय शुरू हुआ जब तत्कालीन बाइडन प्रशासन गाजा युद्ध को लेकर इस्राइल पर दबाव डाल रहा था, और यह सिलसिला नए ट्रंप प्रशासन के आने और ईरान के प्रति नीतियां बनाने तक जारी रहा। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि इस्राइल अपने दुश्मनों के साथ-साथ अपने सहयोगियों (जैसे अमेरिका) के खिलाफ भी खुफिया जानकारी जुटाने में बहुत आक्रामक रहा है।
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