पश्चिम एशिया में एक बार फिर युद्ध का भड़कना बहुत दुखद और चिंताजनक है। रविवार देर रात ईरान द्वारा इजरायल पर किए गए मिसाइल हमले के जवाब में इजरायली रक्षा बलों ने सोमवार तड़के ईरान के सैन्य ठिकानों पर हमला कर दिया। बीती 8 अप्रैल को हुए फौरी युद्ध-विराम की धज्जियां उड़ गईं। दोनों पक्ष एक-दूसरे के लिए जिस तरह की भाषा का प्रयोग कर रहे हैं, उससे चिंता बहुत बढ़ गई है। युद्ध के मोर्चे पर कभी हां, तो कभी ना का अमेरिकी रवैया जारी है। डोनाल्ड ट्रंप की बातों से ऐसा लग रहा था कि वह इजरायल को किसी भी हमले से रोकेंगे, मगर अब राष्ट्रपति ट्रंप ही नहीं, पूरा अमेरिकी सत्ता-प्रतिष्ठान जल्दी से जल्दी युद्ध को खत्म करने पर आमादा दिख रहा है। इन नए हमलों में न जाने कितने लोग मारे जाएंगे? नए घातक हमलों के मद्देनजर, ईरान स्थित भारतीय दूतावास ने सोमवार को भारतीयों को ईरान की यात्रा से फिलहाल बचने की सलाह दी है। ईरान में मौजूद भारतीय नागरिकों से भी किसी भी साधन से देश छोड़ने के लिए कह दिया गया है। इसका मतलब साफ है, पश्चिम एशिया में एक बार फिर बड़े युद्ध के भड़कने की आशंका है।
युद्ध की ताजा आग के पीछे मुख्य कारण क्या है? गौर करने की बात है, इजरायल 28 फरवरी के बाद से ही लेबनान को लगातार निशाना बना रहा है। लेबनान में मौजूद हिजबुल्लाह को तबाह करने के मकसद से इजरायल लगातार हमले कर रहा है। हालांकि, लेबनान या हिजबुल्लाह की ओर से भी इजरायल पर हमले हो रहे हैं, लेकिन कोई दोराय नहीं कि इजरायल के हमले बहुत घातक हैं, लेबनान मेें अब तक लगभग 4,000 लोग मारे जा चुके हैं। अभी ईरान ने लेबनान को बचाने के लिए ही इजरायल को निशाना बनाया है। बहरहाल, यह बात छिपी नहीं है कि पश्चिम एशिया में आतंकी प्रवृत्ति के अनेक संगठन हैं, जो लंबे समय से इजरायल को निशाना बनाते रहे हैं, कहीं न कहीं, ऐसे संगठनों को ईरान से प्रत्यक्ष या परोक्ष मदद मिलती रही है। यहां सुलह इसलिए भी मुश्किल है कि युद्ध का कोई एक मोर्चा नहीं है, अनेक मोर्चे हैं और कम से कम 10 देश युद्ध में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हैं। यही कारण है, 100 दिन बीतने के बावजूद पुख्ता तौर पर युद्ध-विराम की सूरत बनती नजर नहीं आ रही है।
खाड़ी की नई अशांति ने पूरी दुनिया की आशंकाओं को नए सिरे से बढ़ा दिया है। दुनिया में ऊर्जा संकट कायम है, पर धीरे-धीरे लोग हालात से तालमेल बिठाने लगे थे। कच्चे तेल का भाव भी कमोबेश स्थिर होने लगा था, क्योंकि बीते दिनों में सक्षम देशों ने अपने-अपने तेल की एक नई व्यवस्था खड़ी कर ली है। भारत में भी ईंधन की कीमतों में दूसरे देशों की तरह ज्यादा उछाल नहीं देखी गई है। अब नई चिंता यह है कि अगर युद्ध फिर भड़का, तो कच्चे तेल की आपूर्ति नए सिरे से प्रभावित होगी। इससे न केवल किल्लत बढ़ेगी, कीमतों में भी इजाफा होगा। दुनिया में आम लोगों की जिंदगी पर युद्ध की आंच पड़ने लगी है। भारत ने उचित ही नए हमलों की निंदा की है। यहां अमेरिका को स्पष्ट रुख के साथ सामने आना पड़ेगा। क्या इजरायल वाकई बगैर अमेरिकी मंजूरी के हमले कर रहा है? क्या अमेरिका वाकई युद्ध-विराम चाहता है? सबसे पहले उसे ही समझना होगा कि उसकी गोलमोल नीतियां दुनिया को आर्थिक समस्याओं के भंवर में फंसाती चली जाएंगी। खाड़ी से उपजती आशंकाओं का समाधान तलाशने की जिम्मेदारी ईरान से ज्यादा अमेरिका पर है। क्या यह बात डोनाल्ड ट्रंप समझ रहे हैं?







