चंद्रयान मिशन में चंद्रमा की सतह का अध्ययन करना शामिल है। 2008 में सफलतापूर्वक लॉन्च किए गए चंद्रयान-1 ने चंद्रमा की रासायनिक, खनिज और फोटो-भूगर्भिक मैपिंग की। चंद्रयान-2 मिशन (2019) 98 प्रतिशत सफल रहा, लेकिन अंतिम चरण में मिशन का सिर्फ़ दो प्रतिशत ही हासिल किया जा सका।
अंतरिक्ष विभाग के सचिव नारायणन ने रविवार को कहा कि चंद्रयान-2 पर लगा हाई रेजोल्यूशन कैमरा अभी भी सैकड़ों तस्वीरें भेज रहा है। चंद्रयान-3 मिशन चंद्रयान-2 का अनुवर्ती मिशन है, जो चांद की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग और घूमने की संपूर्ण क्षमता का प्रदर्शन करेगा।
इसरो ने चंद्रयान-3 मिशन को सफलतापूर्वक लॉन्च किया, जिसमें लैंडर विक्रम ने 23 अगस्त, 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ की। नारायणन ने कहा, “अभी तीन दिन पहले ही हमें चंद्रयान-5 मिशन के लिए मंजूरी मिली है। हम इसे जापान के साथ मिलकर करेंगे।”
चंद्रयान-4 मिशन के 2027 में लॉन्च होने की उम्मीद है, जिसका उद्देश्य चंद्रमा से एकत्र किए गए नमूने लाना है। इसरो की भविष्य की परियोजनाओं के बारे में नारायणन ने कहा कि गगनयान सहित विभिन्न मिशनों के अलावा, भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन- भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने की योजना भी चल रही है।
सितंबर, 2024 में मिली थी चंद्रयान-4 मिशन को मंजूरी कैबिनेट ने पिछले साल सितंबर में चंद्रयान-4 मिशन को मंजूरी दी थी। इस मिशन का उद्देश्य स्पेसक्राफ्ट को चंद्रमा पर उतारना, चंद्रमा की मिट्टी और चट्टानों के सैंपल इकट्ठा करना और उन्हें सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाना है।
इस मिशन पर 2104 करोड़ रुपए की लागत आएगी। इस स्पेसक्राफ्ट में पांच अलग-अलग मॉड्यूल होंगे। जबकि, 2023 में चंद्रमा पर भेजे गए चंद्रयान-3 में प्रपल्शन मॉड्यूल (इंजन), लैंडर और रोवर तीन मॉड्यूल थे।
चंद्रयान-4 के स्टैक 1 में लूनर सैंपल कलेक्शन के लिए एसेंडर मॉड्यूल और सतह पर लूनर सैंपल कलेक्शन के लिए डिसेंडर मॉड्यूल होगा। स्टैक 2 में थ्रस्ट के लिए एक प्रपल्शन मॉड्यूल, सैंपल होल्ड के लिए ट्रांसफर मॉड्यूल और सैंपल को पृथ्वी पर लाने के लिए री-एंट्री मॉड्यूल शामिल रहेगा।
मिशन में दो अलग-अलग रॉकेट का इस्तेमाल होगा। हैवी-लिफ्टर LVM-3 और ISRO का रिलायबल वर्कहॉर्स PSLV अलग-अलग पेलोड लेकर जाएंगे।
चंद्रयान-4 के 2 मॉड्यूल चांद की सतह पर जाएंगे चंद्रयान-4 मिशन कई स्टेज में पूरा होगा। चांद की कक्षा में पहुंचने के बाद मुख्य स्पेसक्राफ्ट से 2 मॉड्यूल अलग होकर सतह पर लैंड करेंगे। दोनों ही मॉड्यूल चांद की सतह से नमूने इकट्ठा करेंगे।
फिर एक मॉड्यूल चांद की सतह से लॉन्च होगा और चांद की कक्षा में मुख्य स्पेसक्राफ्ट से जुड़ जाएगा। नमूनों को धरती पर वापस आने वाले स्पेसक्राफ्ट में ट्रांसफर करके भेजा जाएगा।
इसरो के वैज्ञानिक चांद की सतह से नमूने उठाने वाला रोबोट तैयार कर रहे हैं। गहराई तक ड्रिल करने तकनीक पर काम हो रहा है। नमूने इकट्ठा करने के लिए कंटेनर और डॉकिंग मैकेनिज्म की तकनीक विकसित की जा रही है।
भविष्य के अन्य प्लान
- 3 एस्ट्रोनॉट स्पेस में जाएंगे: 2025 में गगनयान में 3 दिनों के मिशन के लिए 3 सदस्यों के दल को 400 KM ऊपर पृथ्वी की कक्षा में भेजा जाएगा।
- भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन लॉन्चिंग: भारत के अंतरिक्ष स्टेशन में पांच मॉड्यूल होंगे। पहला मॉड्यूल 2028 में लॉन्च होगा। इसके लिए डिज़ाइन का काम पूरा हो चुका है और रिपोर्ट मंजूरी के लिए सरकार को सौंप दी गई है। ये स्टेशन स्पेस में एस्ट्रोनॉट का ठिकाना होगा।
- इंडियन एस्ट्रोनॉट को चांद पर भेजना: ISRO 2040 तक अंतरिक्ष यात्रियों को चंद्रमा पर भेजने पर काम कर रहा है। अभी अमेरिका ही ऐसा देश है जो चांद पर इंसानों को भेज चुका है। चीन भी 2030 तक अपने एस्ट्रोनॉट को चांद पर पहुंचाने पर काम कर रहा है।
- वीनस ऑर्बिटर मिशन: 1,236 करोड़ रुपए का बजट रखा गया है। इसे मार्च 2028 में लॉन्च किया जाना है। VOM का प्राइमरी ऑब्जेक्टिव शुक्र की सतह और वायुमंडल के साथ-साथ शुक्र के वायुमंडल पर सूर्य के प्रभाव के बारे में हमारी समझ को बढ़ाना है।







