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संविधान की नौवीं अनुसूची के सहारे कर्नाटक सरकार एससी, एसटी आरक्षण को बढ़ाने की तैयारी में ………

UB India News by UB India News
October 9, 2022
in दक्षिण भारत, ब्लॉग
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आरक्षण का मसला एक बार फिर चर्चा में है। कर्नाटक सरकार एससी, एसटी आरक्षण को बढ़ाने की तैयारी कर रही है। इसके लिए राज्य सरकार संविधान की नौवीं अनुसूची (9th Schedule of Constitution) का सहारा लेगी। इससे अनारक्षित यानी ओपन कैटिगरी का हिस्सा घट जाएगा। केंद्र सरकार ने धर्मपरिवर्तन कर ईसाई या मुस्लिम बन चुके दलितों को अनुसूचित जाति (SC) कोटे से आरक्षण के मुद्दे पर विचार करने के लिए पूर्व सीजेआई केजी बालकृषणन की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया है। नौकरियों और शिक्षा में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को 10 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। शीर्ष अदालत को ईडब्लूएस आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर फैसला करना है। आरक्षण की कल्पना वैसे तो सामाजिक न्याय के लिए किया गया लेकिन शुरू से ही बड़ा चुनावी हथियार भी है। चुनावों से पहले घूमफिरकर आरक्षण का मुद्दा आ ही जाता है। कर्नाटक को ही लीजिए। वहां अगले साल विधानसभा के चुनाव हैं। इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय की थी। तो क्या आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा की जा सकती है? संविधान की नौवीं अनुसूची आखिर है क्या? आरक्षण को लेकर अदालतों ने कब-कब ऐतिहासिक फैसले दिए? आइए समझते हैं।

कर्नाटक सरकार बढ़ाने जा रही एससी, एसटी कोटा
सबसे पहले बात कर्नाटक सरकार के ताजा कदम की। सूबे में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। उससे पहले बसवराज बोम्मई की बीजेपी सरकार ने एससी, एसटी आरक्षण को बढ़ाने का फैसला किया है। फिलहाल कर्नाटक में ओबीसी के लिए 32 प्रतिशत, एससी के लिए 15 प्रतिशत और एसटी के लिए 3 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। यह कुल मिलाकर 50 प्रतिशत है। अब राज्य सरकार एससी आरक्षण को 2 प्रतिशत बढ़ाकर 17 प्रतिशत और एसटी कोटा को 4 प्रतिशत बढ़ाकर 7 प्रतिशत करने की तैयारी कर रही है। इस तरह राज्य में आरक्षण की सीमा 56 प्रतिशत हो जाएगी। इसका मतलब है कि अनारक्षित यानी ओपन कैटिगरी की सीटें 50 प्रतिशत से घटकर 44% ही रह जाएगी। जाहिर है कि जब आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा होगी तो मामला अदालत में पहुंचेगा ही। यही वजह है कि कर्नाटक सरकार एससी, एसटी कोटा बढ़ाने के लिए संविधान की नौवीं अनुसूची का सहारा लेगी।

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क्या है संविधान की 9वीं अनुसूची?
आखिर संविधान की नौवीं अनुसूची है क्या? नौवीं अनुसूची को 1951 के पहले संविधान संशोधन के जरिए जोड़ी गई थी। संविधान के अनुच्छेद 31 ए और 31बी के तहत इसमें शामिल कानूनों को न्यायिक समीक्षा से संरक्षण हासिल है। आसान भाषा में कहें तो संविधान की नौंवी सूची में शामिल कानून न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर होते हैं यानी सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट उसकी समीक्षा नहीं कर सकते। इसीलिए अक्सर आरक्षण से जुड़े कानूनों को नौवीं अनुसूची में डालने की मांग होती रहती है। 1951 में नौवीं अनुसूची बनने पर भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन समेत कुल 13 कानूनों को जोड़ा गया था। दरअसल, आजादी के बाद जब भारत में भूमि सुधार को शुरू किया गया तो उसे यूपी, एमपी और बिहार की अदालतों में चुनौती दी गई थी। पटना हाई कोर्ट ने 12 मार्च 1951 को बिहार भूमि सुधार कानून को अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए असंवैधानिक करार दे दिया। इसी के बाद केंद्र की तत्कालीन पंडित जवाहर लाल नेहरू सरकार ने संविधान में नौवीं अनुसूची को जोड़ा और इसे न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया। फिलहाल नौवीं अनुसूची में 283 कानून हैं जिन्हें समय-समय पर संविधान संशोधनों के जरिए इसमें शामिल किया गया। खास बात ये है कि किसी कानून को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद अगर संविधान संशोधन के जरिए उसे नौवीं अनुसूची में डाल दिया जाता है तो वह कानून लागू हो जाता है।

जब सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की अधिकतम सीमा 50% तय की
सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत सरकार, 1992’ केस में ऐतिहासिक फैसला दिया था। 9 जजों की संविधान पीठ ने 6-3 के बहुमत से जाति-आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय की। दरअसल, साल 1991 में केंद्र की तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने आर्थिक आधार पर सामान्य श्रेणी के लिए 10 फीसदी आरक्षण देने का आदेश जारी किया था, जिसे इंदिरा साहनी ने कोर्ट में चुनौती दी थी। इसी फैसले की काट के लिए 1993 में तमिलनाडु सरकार ने नौवीं अनुसूची का सहारा लेकर नौकरी और शैक्षिक संस्थानों में दाखिले में अधिकतम आरक्षण को 69 प्रतिशत कर दिया। इसमें 18 प्रतिशत एससी, 1 प्रतिशत एसटी, 20 प्रतिशत ‘मोस्ट बैकवर्ड कास्ट्स’ (MBC) और अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। सूबे में ओबीसी कोटे के अंदर ही अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। इसमें मुस्लिमों के लिए 3.5 प्रतिशत आरक्षण भी शामिल है।

फिलहाल आरक्षण की स्थिति
केंद्र सरकार की नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी को 27 प्रतिशत, एससी के लिए 15 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई है। राज्यों में यह अलग-अलग हो सकता है। 2019 में 103वें संविधान संशोधन के जरिए ईडब्लूएस के लिए 10 प्रतिशत अलग से आरक्षण की व्यवस्था की गई। इस तरह केंद्रीय स्तर पर अधिकतम आरक्षण की सीमा 60 प्रतिशत हो चुकी है। राज्यों में एससी, एसटी और ओबीसी का आरक्षण अलग-अलग हो सकता है। यह बात गौर करने की जरूरत है कि अनारक्षित सीटों का मतलब ये है कि उसमें सभी जातियों के कैंडिडेट भर्ती हो सकते हैं। यह ओपन कैटिगरी है। इसका मतलब ये नहीं कि जनरल कैटिगरी के लोग ही ओपन कैटिगरी में जगह पाएंगे।

मराठा आरक्षण के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी फैसले को दोहराया
मई 2021 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने महाराष्ट्र सरकार के मराठा आरक्षण के फैसले को असंवैधानिक करार दिया। कोर्ट ने साफ किया कि इंदिरा साहनी केस में 9 जजों की बेंच ने अधिकतम 50 प्रतिशत आरक्षण की जो सीमा तय की थी, मराठा रिजर्वेशन उसके खिलाफ है। इसी मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर रिजर्वेशन के लिए 50 फीसदी की लिमिट नहीं रही तो फिर समानता के अधिकार का क्या होगा?

राज्य जहां पहले से आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर
ईडब्लूएस आरक्षण के पहले से कुछ राज्यों में अधिकतम कोटा 50 प्रतिशत से ज्यादा है। इनमें से ज्यादातर को कोर्ट में चुनौती मिली। सबसे बड़ा उदाहरण तमिलनाडु का है जहां 1993 से 69 प्रतिशत की व्यवस्था है।

जनवरी 2000 में आंध्र प्रदेश (तब तेलंगाना अलग नहीं हुआ था) सरकार ने आदिवासी बहुल इलाकों में स्थित स्कूलों में टीचर का पद 100 प्रतिशत एसटी कैंडिडेट के लिए आरक्षित कर दिया। यानी वैसे इलाकों में सिर्फ और सिर्फ एसटी समुदाय से आने वाले ही स्कूल टीचर बन सकते थे। इसके लिए तत्कालीन गवर्नर ने आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को असंवैधानिक ठहराया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि संविधान के तहत 100 प्रतिशत आरक्षण की इजाजत नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि इससे एससी और ओबीसी भी प्रतिनिधित्व से वंचित हो रहे हैं। आंध्र प्रदेश की सरकार ने 1986 में भी ऐसी ही कोशिश की थी जिसे 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।

2019 में छत्तीसगढ़ सरकार ने आरक्षण की अधिकतम सीमा को बढ़ाकर 82 प्रतिशत करने का फैसला किया। इसमें ईडब्लूएस के लिए भी 10 प्रतिशत आरक्षण शामिल है। राज्य सरकार ने यह फैसला ‘छत्तीसगढ़ लोक सेवा अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण कानून, 1994’ में अध्यादेश के जरिए संशोधन के बाद किया। उसके तहत अनुसूचित जात का आरक्षण 16 प्रतिशत से घटाकर 13 प्रतिशत, एसटी आरक्षण को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 32 प्रतिशत और ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया। ईडब्लूएस के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के साथ ही राज्य में कुल आरक्षण 82 प्रतिशत हो गया। यानी अनारक्षित या ओपन कैटिगरी के लिए महज 18 प्रतिशत ही सीटें बचीं। अक्टूबर 2019 में हाई कोर्ट ने आरक्षण के इस फैसले पर रोक लगा दी।

महाराष्ट्र सरकार ने 2001 में एक कानून बनाया था जिससे नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण बढ़कर 52 प्रतिशत हो गया। नौकरियों में 13 प्रतिशत और शिक्षा में 13 प्रतिशत मराठा आरक्षण के बाद यह सीमा 64-65 प्रतिशत हो गई। 2019 में 10 प्रतिशत ईडब्लूएस कोटे के साथ महाराष्ट्र में कुल आरक्षण 62 प्रतिशत हो गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण को रद्द कर दिया जिसके बाद राज्य में अब ईडब्लूएस कोटे समेत आरक्षित सीटें 62 प्रतिशत हो गईं।

2019 में मध्य प्रदेश सरकार ने भी राज्य सरकार की नौकरियों में 73 प्रतिशत आरक्षण लागू किया, जिसमें ईडब्लूएस के लिए 10 प्रतिशत भी शामिल था। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस पर रोक लगा दी।

आरक्षण मूल अधिकार नहीं : सुप्रीम कोर्ट
2020 में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को लेकर बहुत अहम टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण मूल अधिकार नहीं है। दरअसल, तमिलनाडु के तमाम राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट से राज्य में मेडकल और डेंटल कोर्स के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए केंद्र को निर्देश देने की मांग की थी। उसी पर सुनवाई करते वक्त जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि आरक्षण का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। उसके बाद राजनीतिक दलों ने अपनी याचिका वापस ले ली थी। इससे पहले उसी साल फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं हो सकता।

नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों की भी समीक्षा कर सकता है सुप्रीम कोर्ट
ऐसा नहीं है कि नौवीं अनुसूची में किसी कानून को शामिल कर लिया जाए तो उसकी न्यायिक समीक्षा ही नहीं हो सकती। अगर कानून मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है या संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है तो सुप्रीम कोर्ट उसकी समीक्षा कर सकता है। जनवरी 2007 में तत्कालीन सीजेआई वाईके सबरवाल की अगुआई वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने नौवीं अनुसूची को लेकर ऐतिहासिक फैसला दिया। कोर्ट ने साफ किया कि किसी कानून को नौवीं अनुसूची में डालने का मतलब ये नहीं है कि उसकी न्यायिक समीक्षा या संवैधानिक वैधता की जांच नहीं की जा सकती। अगर संबंधित कानून मूल अधिकार के खिलाफ है तो ऊपरी अदालतें उसे रद्द कर सकती हैं।

अधिकतम 50 प्रतिशत आरक्षण का नियम अटल नहीं जो उल्लंघन ही न हो: केंद्र
अभी पिछले महीने ही ईडब्लूएस आरक्षण के मसले पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने कहा कि अधिकतम आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर हो सकती है। केंद्र ने दलील दी कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा न हो, यह प्रमुख नियम तो है लेकिन इसे इतना पवित्र नहीं बनाया जा सकता कि यह संविधान के बुनियादी ढांचे जैसा हो जाए। केंद्र ने ईडब्लूएस आरक्षण को संविधान की मूल भावना के अनुरूप बताते हुए दलील दी कि प्रस्तावना में भी आर्थिक न्याय का जिक्र है और 103वां संविधान संशोधन इसी को सुनिश्चित करता है।

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