कोरोना के तीव्र प्रचंड में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियां कार्यकर्ताओं के जान पर भारी न पड जाए

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इस शनिवार को जब खबर आय़ी कि बिहार विधान परिषद के अध्यक्ष का पूरा परिवार कोरोना संक्रमित हो चुका है. खुद राज्य के मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री दोनों के स्टाफ, नेता प्रतिपक्ष और कई बड़े नेता पिछले दिनों उनके संपर्क में आये थे. उन सभी का टेस्ट हो रहा है तो एकबारगी लगा कि पूरे बिहार की राजनीति कहीं आईसीयू में न चली जाये. हालांकि आनन-फानन में हुए टेस्ट में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कोरोना नेगेटिव बता दिया गया. बाद में डिप्टी सीएम, विधानसभा अध्यक्ष के कोरोना निगेटिव रहने की भी खबरें आयीं, जिससे लोगों ने चैन की सांस ली. हालांकि अभी कई राजनेताओं का और उनके स्टाफ का टेस्ट होना है और उनकी रिपोर्ट का आना बाकी है. राज्य का स्वास्थ्य महकमा अभी इन राजनेताओं की ट्रेवल हिस्ट्री को तलाशने में जुटा है और उसके लिए यह काम काफी मुश्किल साबित हो रहा है. इस घटना ने एक बार फिर से अक्तूबर में प्रस्तावित राज्य विधानसभा के चुनावों पर सवाल खड़े कर दिये हैं. लोग यह सवाल कर रहे हैं कि क्या जान जोखिम में डाल कर चुनाव करना इतना जरूरी है.

बिहार में विधानसभा चुनाव अक्तूबर महीने में प्रस्तावित हैं. यह कहा जा चुका है कि चुनाव नियत समय पर ही होंगे. सभी राजनीतिक दल भी इस बात को लेकर सहमत हैं कि चुनाव समय से हो जाने चाहिए. इसके लिए राज्य में बड़ी संख्या में ऑनलाइन चुनावी रैलियां होने लगी हैं. चुनावी गठबंधन को लेकर भी खूब बयानबाजी हो रही है. ग्रामीण इलाकों में भी संभावित प्रत्याशी अपनी पैठ बढ़ाने में जुट गये हैं. सोशल डिस्टेंसिंग को ताक में रख कर कई आयोजन हो रहे हैं. राजनीतिक दलों द्वारा एक दूसरे के नेताओं और कार्यकर्ताओं को तोड़ने और अपने दल में शामिल करने की भी कवायद जारी है.

विधान पार्षदों को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया
अभी पिछले दिनों राज्य की सत्ताधारी दल जदयू ने प्रमुख विपक्षी दल राजद के कुछ विधान पार्षदों को अपनी पार्टी में शामिल करा लिया. उसके बाद राज्य विधान परिषद के सदस्यों को शपथ दिलाई गयी. उसी शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री समेत राज्य के तमाम प्रमुख राजनेता शामिल हुए थे. तस्वीरों से जाहिर हो रहा है कि उक्त समारोह में सोशल डिस्टेंसिंग का कोई ख्याल नहीं रखा गया. इस मसले पर चर्चा भी नहीं होती अगर विधान परिषद अध्यक्ष के सपरिवार कोरोना संक्रमित होने की खबरें नहीं आतीं. इस खबर के बावजूद राज्य में जगह-जगह हो रही इस तरह की राजनीतिक गतिविधियों में सोशल डिस्टेंसिंग का कोई ख्याल नहीं रखा जा रहा है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आयेंगे, इस तरह की गतिविधियां तेज होंगी और कोरोना का खतरा बढ़ता चला जायेगा. ऐसे में विशेषज्ञों का यह सोचना कि इस मौके पर चुनाव कराना खतरनाक हो सकता है, कहीं से गलत नहीं लगता.

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बार-बार इस आशय के आंकड़े जारी किये जाते हैं
हालांकि बिहार के स्वास्थ्य विभाग की ओर से बार-बार इस आशय के आंकड़े जारी किये जाते हैं कि बिहार में कोरोना संक्रमण की स्थिति काफी नियंत्रण में है. महाराष्ट्र औऱ दिल्ली जैसे राज्यों से इसकी तुलना की जाती है. 73 फीसदी रिकवरी दर का भी हवाला दिया जाता है. मगर विभाग की ओर से यह जानकारी नहीं दी जाती कि अनलॉक होने के महज एक महीने में राज्य में कोरोना संक्रमितों की दर लगभग तीन गुनी और कोरोना से मरने वालों की संख्या चार गुनी हो गयी है. 31 मई को राज्य में कोरोना संक्रमितों की संख्या 3692 थी जो पांच जुलाई को बढ़ कर 11860 हो गयी है. 31 मई को राज्य में सिर्फ 23 लोगों की कोरोना से मौत हुई थी, यह संख्या पांच जुलाई को 90 तक पहुंच गयी है. ये आंकड़े बताते हैं कि अनलॉक की घोषणा होने के साथ राज्य में सोशल डिस्टेंसिंग की किस तरह धज्जियां उड़ाई गयी.

राष्ट्रीय औसत 325 के मुकाबले काफी अधिक हैराज्य का स्वास्थ्य विभाग यह जरूर बताता है कि प्रति दस लाख की आबादी राज्य में कोरोना संक्रमितों की संख्या सिर्फ 68 है, जो राष्ट्रीय औसत 325 के मुकाबले काफी अधिक है. मगर विभाग यह जानकारी नहीं देता कि प्रति दस लाख लोगों में टेस्ट की दर के मामले में राज्य देश में सबसे पीछे है. सिर्फ 1684, जबकि इसका राष्ट्रीय औसत 6978 है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक महीने के अधिक वक्त से कह रहे हैं कि राज्य में अब रोज दस हजार टेस्ट होंगे, मगर आज तक स्वास्थ्य विभाग इस लक्ष्य के आसपास भी नहीं पहुंच पाया है. पांच जुलाई को जारी आंकड़ों में भी सिर्फ 6799 टेस्ट की ही जानकारी दी गयी है. अब तक राज्य में कुल 2,57,896 टेस्ट ही हो पाये हैं. जबकि राज्य की आबादी लगभग 13 करोड़ तक पहुंच गयी है.

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यह तो आंकड़ों की बात है. जमीनी हालात तो इससे भी काफी अधिक भयावह है. पिछले हफ्ते मुजफ्फरपुर समेत राज्य के कई शहरों में बड़ी संख्या में निजी चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों के कोरोना से संक्रमित होनी की खबरें आयी हैं, जिसके बाद कुछ शहरों में निजी स्वास्थ्य सेवाओं को बंद कर दिया गया. राज्य के कोरोना जांच केंद्रों में जांच का काम भी बीच में बंद हो गया, क्योंकि वहां जांचकर्ताओं की टीम संक्रमित हो चुकी थी. खुद स्वास्थ्य विभाग के निदेशक स्तर के एक अधिकारी के संक्रमित होने की खबर है. राज्य में दो बड़े अधिकारियों की कोरोना से मौत हो चुकी है.

चुनाव कराने के लिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है
ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य में समय से चुनाव कराने के लिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि कोरोना का संक्रमण बहुत बड़ा खतरा नहीं है. राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए राजनीतिक दल हर तरह का रिस्क उठाने के लिए तैयार हैं. राज्य में कोरोना संक्रमण के खतरों पर चर्चा बंद हो चुकी है. चुनावी राजनीति ही बातचीत का प्रमुख विषय बन चुकी है. देश के गृह मंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री की ऑनलाइन रैलियों ने इस माहौल को बनाने में प्रमुख भूमिका अदा की है. इसका पूरा असर राज्य के अलग-अलग इलाकों में रह रही जनता पर पड़ रहा है. वे निश्चिंत हो चुके हैं कि कोरोना कोई बहुत बड़ा खतरा नहीं है. लिहाजा सोशल डिस्टेंसिंग और परहेज बिल्कुल खत्म हो चुके हैं.

अनलॉक के शुरू होते ही राज्य में शादी विवाह, मुंडन, श्राद्ध, पूजा पाठ आदि आयोजनों का सिलसिला पूर्ववत शुरू हो गया. इन आयोजनों में सरकार द्वारा तय की गयी संख्या और निर्देशों का बिल्कुल ख्याल नहीं रखा गया. इसका सबसे क्लासिकल उदाहरण राजधानी पटना के पालीगंज में देखा गया, जब एक शादी के अगले ही दिन दूल्हे की कोरोना से मौत हो गयी और विवाह समारोह में शामिल 111 लोग कोरोना से संक्रमित पाये गये. तब जाकर प्रशासन ने दूल्हे के पिता पर विवाह समारोह में तय सीमा से अधिक लोगों को बुलाने का मुकदमा दर्ज कराया. ऐसे कई छोटे-बड़े मामले इन दिनों पूरे राज्य में सामने आ रहे हैं.

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इक्का-दुक्का लोग ही मास्क लगाये दिखते हैं
राज्य के बाजारों में अब पहले जैसी ही भीड़-भाड़ है. उस भीड़ में इक्का-दुक्का लोग ही मास्क लगाये दिखते हैं. लोगों का आपस में मिलना जुलना पूर्ववत शुरू हो गया है. माहौल ऐसा है कि जब जैसा होगा देखा जायेगा. जाहिर सी बात है कि चुनाव तक ऐसा ही माहौल रहेगा और इस माहौल में चुनावी गतिविधियां भी पूर्ववत ही होगी. राजधानी के स्तर पर भले ही निर्देश जारी होंगे, मगर दूरदराज के इलाकों में उनका पालन नहीं के बराबर होगा. इन स्थितियों में कोरोना का संक्रमण राज्य में तेजी से बढ़ने का खतरा है. मुमकिन है कि राजनीतिक कार्यकर्ता बड़े पैमाने पर इसके चपेट में आयें. ऐसे में राज्य में चुनाव कराना खतरनाक हो सकता है.

हमारे बीच लंबे समय तक रहने वाला है
यह सच है कि कोरोना अभी हमारे बीच लंबे समय तक रहने वाला है. इसकी वजह से हर काम को रोका नहीं जा सकता है. साउथ कोरिया जैसे देश ने अप्रैल में चुनाव कराकर साबित कर दिया कि अगर तैयारियां अच्छी हो तो चुनाव के दौरान भी कोरोना संक्रमण को रोका जा सकता है. मगर बिहार सरकार और चुनाव आयोग को दिल पर हाथ रख कर खुद से पूछने की जरूर है कि क्या वे बिहार जैसे राज्य में उस तरह की तैयारी कर सकते हैं, चुनाव के वक्त भी भीड़-भाड़ को रोक सकते हैं और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कर सकते हैं, जैसा साउथ कोरिया में हुआ. अगर नहीं तो इस माहौल में राज्य को चुनाव में झोंकना क्या करोड़ों मतदाताओं और लाखों राजनीतिक कार्यकर्ताओं को खतरे की आग में झोंकना नहीं होगा?

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