बिहार विधानसभा–2020-इस बार भी एनड़ीए के बीच सम्मानजनक समझौते का आधार बनेगा!

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राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के राजनीतिक सफर की यह खासियत रही है कि बयानों और मीडि़या में जन्म लेते मतभेद अक्सर विकास के पैरहन सुलझते रहे हैं। एनड़ीए में अगर मतभेद को अब तक मनभेद का दर्जा नहीं मिला‚ तो उसकी वजह जनता को सुशासन की सरकार देने की प्रतिबद्धता और विकास को लेकर जनता से किये गये वादे हैं। खासकर सीटों के बंटवारे का मसला अक्सर सम्मान के मुलम्मे में लपेटकर परोसने की कला से एनड़ीए विपक्ष के मनोबल को तार–तार करता भी रहा है।
अगर बिहार और झारखंड़ के विभाजन के बाद की स्थिति की चर्चा करें‚ तो एनड़ीए की छतरी तले भाजपा और जदयू ने वर्ष २००४ में लोकसभा का चुनाव साथ–साथ लड़़ा। उस वक्त भाजपा के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने नीतीश कुमार के प्रयोगात्मक सोच और विकास को लेकर एक व्यापक दृष्टि देखी। इसके बाद उन्होंने बिहार में एनड़ीए का नेतृत्व नीतीश कुमार के हाथ में देने का फैसला लिया। श्री वाजपेयी के इस चिन्तन के साथ भाजपा और जदयू के बीच बड़े़ और छोटे भाई की तकरार भी शांत हो गयी। तब यह तय हुआ कि जदयू २५ व भाजपा १५ लोकसभा क्षेत्रों से खम ठोकेंगे। वर्ष २००९ के लोकसभा चुनाव में भी जदयू और भाजपा के बीच क्रमशः २५ और १५ सीटों पर लड़़ने का सम्मानजनक समझौता ही प्रभावी रहा। वर्ष २०१४ के लोकसभा चुनाव में जदयू ने जरूर अकेले चुनाव लड़़ने का फैसला लिया। तब जदयू को महज दो लोकसभा सीटों पर ही जीत हासिल हुई थी‚ लेकिन वही जदयू वर्ष २०१९ के लोकसभा चुनाव में एनड़ीए के साथ आया‚ तो विकास के पैरोकार नीतीश कुमार के सम्मान व केन्द्र में सरकार बनने में मिलते सहयोग के आगाज को देखते हुए भाजपा नेतृत्व ने जदयू के साथ १७–१७ लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़़ने का सम्मानजनक समझौता कायम रखा। इस समझौते के तहत भाजपा ने अपनी जीती हुई पांच सीटें जदयू के हवाले कर दीं। भाजपा का यह त्याग लोजपा पर भी हावी हुआ। तब लोजपा ने भी छह लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़़ने की हामी भरते हुए कहा था कि यह समझौता नीतीश कुमार की विकास पसंद जनता के अनुकूल भी है। तब यह कहा जा रहा था कि यह समझौता न केवल एनड़ीए की सरकार बनाने में सहायक होगा‚ बल्कि नीतीश कुमार की मौजूदगी से जरूरत पड़़ने पर कई दलों के साथ सरकार बनाने के लिए पोस्ट एलायंस को भी बल मिलेगा।

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बिहार–झारखंड़ के बंटवारे के बाद एनड़ीए के नेताओं ने बिहार की जनता को सामने रख कर बिहार विधानसभा का चुनाव भी लड़़ा। वर्ष २००५ के फरवरी में भाजपा ने १०५‚ जबकि जदयू ने १३८ विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़़ा। उसी वर्ष के नवम्बर महीने में हुए विधानसभा चुनाव में जब भाजपा के लिए १०२ तथा जदयू के लिए १४१ सीटें तय हुइÈ‚ तब भी कोई बखेड़़ा खड़़ा नहीं हुआ। वर्ष २०१० के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा ने १०१ और जदयू ने १४२ सीटों पर चुनाव लड़़ा। वर्ष २०१५ में जदयू ने एनड़ीए से अलग होकर चुनाव लड़़ा‚ जबकि भाजपा ने एनड़ीए में शामिल राष्ट्रीय लोकतांत्रिक समता पार्टी‚ हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चर व लोकजनशक्ति पार्टी के साथ चुनाव लड़़ा। इस चुनाव में जदयू ने राष्ट्रीय जनता दल के साथ मिलकर एनड़ीए के खिलाफ चुनाव लड़़ा। वहां भी नीतीश कुमार का नेतृत्व कायम रहा और सीटों को लेकर कोई मतभेद सामने नहीं आया। दोनों दलों ने १०१–१०१ सीटों तथा कांग्रेस ने ४१ सीटों पर चुनाव लड़ा। हालांकि कुछ ही दिनों के बाद राजद व जदयू की राहें जुदा हो गयीं।

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अब जबकि बिहार विधानसभा–२०२० को लेकर राजग के भीतर लगातार लोजपा के विद्रोही तेवर को विभिन्न माध्यमों से भले ही उछाला जा रहा हो‚ लेकिन इस बार भी एनड़ीए के बीच सम्मानजनक समझौते का आधार बनता दिख रहा है। मिली जानकारी के अनुसार एक तथ्य यह निकल कर आ रहा है कि जदयू व भाजपा के बीच विधानसभा की आधी–आधी सीटों का बंटवारा होगा। एक सूत्र का मानना है कि भाजपा की इन आधी सीटों में ही लोजपा की भी हिस्सेदारी तय की जायेगी। राजनीतिक गलियारों में चर्चा यह भी है कि लोजपा को देकर जो सीटें बचेंगी‚ उनपर आधा–आधा सीटों का बंटवारा भाजपा व जदयू के बीच होगा। हालांकि अबतक एनड़ीए की कोऑर्डि़नेशन कमेटी का गठन नहीं हुआ है। इसके गठन के बाद समस्या का हल निकल जाने के आसार हैं। वैसे भी लोजपा के शीर्ष नेता रामविलास पासवान को ‘मौसम वैज्ञानिक’ का पदवी देने वाले राजद के साथ लोजपा के जाने का आसार नहीं है।

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