बच्चों के बारे में लिखने से पहले रखें उनके हितों का ध्यान

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मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है और बच्चों के अधिकारों के संरक्षण में इनकी बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। मीडिया के साथ से ही बच्चों का हक सुनिश्चित होगा। किसी भी देश का ह्यूमन इंडेक्स इंडिकेटर बच्चों की स्थिति और विकास से जुड़ा होता हैं। बच्चों के सन्दर्भ में किसी भी घटना की रिपोटिर्ंग करते समय मीडिया को यह भी चाहिए कि बच्चों से जुड़े कानून पोक्सो और जेजे एक्ट के बारे में भी बताए। ये उद्गार बिहार के सूचना एवं जनसंपर्क मंत्री नीरज कुमार ने पत्र सूचना कार्यालय, पटना और यूनिसेफ द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित मीडिया कार्यशाला के दौरान कही।इस मौके पर बच्चों द्वारा मीडिया पर बनाई गई पेंटिंग्स पर उन्होंने कहा कि बच्चों की पेंटिंग यह दर्शाती है यह नई पीढ़ी समाज के प्रति पूरी तरह से जागरूक है और अपनी जिम्मेदारियों को अच्छे से जानती है। बिहार सरकार ने बच्चों के लिए अलग से बजट बनाया है जिसके अंतर्गत वर्ष 2017-18 में 12.8 फीसद राशि बच्चों के लिए निर्धारित की थी। उन्होंने कहा कि मीडिया को बच्चों और उनके मुद्दों के लिए अलग से एक पन्ना प्रकाशित करना चाहिये। इस अवसर पर पीआईबी, पटना के अपर महानिदेशक एस के मालवीय ने कहा कि पिछले 70 सालों से यूनिसेफ बाल अधिकारों पर काम कर रहा है। मीडिया की भूमिका खबरों को संवेदनशीलता के साथ लिखना और दिखाना भी है। बच्चों की रिपोटिर्ंग को बेहतर करने के लिए मीडिया को विचार करना चाहिए। उनके अधिकार की खबरें भी प्रमुखता के साथ प्रकाशित करना चाहिए। यूनिसेफ के कार्यक्रम प्रबंधक शिवेंद्र पांडय़ा ने कहा कि मीडिया, समाज का आंख और कान होता है। मीडिया की पहुंच समाज के हर वर्ग तक होती है। ऐसे में उनकी भूमिका अति महत्वपूर्ण हो जाती है। पीआईबी के निदेशक दिनेश कुमार ने कहा कि मीडिया को अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी के साथ निभानी चाहिए और बाल अधिकार से संबंधित खबरों को तरजीह देनी चाहिए। कार्यशाला का उद्देश्य बताते हुए यूनिसेफ की संचार विशेषज्ञ निपुण गुप्ता ने कहा कि इसके माध्यम से बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों जैसे स्वास्य, विकास, संरक्षण, सुरक्षा और भागीदारी और उनसे जुड़े अन्य मुद्दों के बारे में जागरूक करना था ताकि मीडिया बच्चों के बारे में आवाज उठाएं जिससे कि सरकार और नीति निर्माता बच्चों के मुद्दों को अपने प्राथमिकताओं में शामिल करें। बच्चों के मुद्दे केवल सॉफ्ट स्टोरी नहीं होती . बच्चों की खबरें आर्थिक और सामाजिक प्रभाव की भी होती हैं . वरीय पत्रकार संजय देव ने कहा कि आईआरएस सव्रे की रिपोर्ट के अनुसार 59 प्रतिशत बच्चे जो साक्षर हैं वह भी अखबार नहीं पढ़ते है. यह मीडिया के लिए बड़ी चुनौती है. केवल 8 फीसदी खबरें ही है जिसमे बच्चों के मन की खबर छपती है. इसमें भी उनके विचार नहीं होते हैं।बिहार यूथ चाइल्ड फोरम की सदस्य और कक्षा 12 के प्रियरेश्वरा और रवि ने कहा कि बच्चों के ऊपर खबर केवल बाल दिवस पर ही नहीं लिखी जानी चाहिए। बच्चों पर फोकस होकर खबर लिखी जानी चाहिए। साथ ही अन्दर के पन्नों पर छोटी खबरें की जगह प्रमुखता से पहले पन्ने पर भी जगह मिले कार्यक्रम के तकनीकी सत्रों के दौरान वरीय पत्रकार संजय देव और डॉ. एमएच गजाली ने बच्चों से जुड़ी खबरों के लेखन प्रक्रिया, बाल अधिकार की पत्रकारिता से जुड़े नियम और मीडिया इथिक्स की जानकारी दी गई। इस दौरान प्रतिभागियों को केस स्टडी देकर उनसे सुझाव लिए गये। कार्यशाला के बाद सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र भी दिये गये। धन्यवाद ज्ञापन पत्र सूचना कार्यालय के सहायक निदेशक संजय कुमार ने किया। इस अवसर पर लोक संचार और प्रसार ब्यूरो के निदेशक विजय कुमार के साथ ही कार्यक्रम में दूरदर्शन, आल इंडिया रेडियो, रेडियो एफएम, प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, वेबसाइट , मीडिया कॉलेजों के फैकल्टी आदि मौजूद थे।

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70 वर्षो से भारत में बाल अधिकारों के लिए काम कर रहे यूनिसेफ की तरफ से आयोजित बाल अधिकारों के प्रति मीडिया का नजरिया क्या है और बाल अधिकारों को मीडिया में कितनी प्रमुखता से प्रस्तुत किया जा रहा है ऐसे कई विषयों पर घंटो मंथन का दौर चला। कार्यक्रम में आये बच्चो ने भी अपने विचार रखे। मंच से एक लड़की ने कहा कि केवल चिल्ड्रेन्स डे के मौके पर ही बच्चों की एक्टिविटी को मीडिया में जगह दी जाती है। उनकी एक्टिविटी और उनसे जुड़ी अन्य खबरों को आम दिनों में भी अखबारों और समाचारों में प्रमुखता मिलनी चाहिए। वरिष्ठ पत्रकारों ने र्चचा में बताया कि बिहार में आधी आबादी 18 साल से कम उम्र के बच्चों की है जिनके अधिकारों को प्रमुखता से उठाने में मीडिया का रोल काफी अहम है। मीडिया अपनी जिम्मेदारियों को इस तरीके से निभाये कि बच्चों के अधिकार हक जमीनी स्तर तक मिले। समाज व परिवार की सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। अभी प्रदूषण से पटना जूझ रहा है। इससे छोटे बच्चों के मानसिक विकास को काफी नुकसान हो रहा है। मीडिया के जरिये भी समाज व परिवार को सशक्त संवेदनशील बनाने की जरूरत है। स्वच्छ, स्वस्थ समाज का वातावरण बनाएं ताकि आने वाली पीढ़ियों को ऊर्जावान बनाया जा सके। शोषण के शिकार बच्चो को ऐसा माहौल मिले जहां वे निर्भीक होकर अपनी बातें रख सकें। बच्चे आज सुरक्षित होंगे, शिक्षित होंगे तभी उनका भविष्य सशक्त हो सकता है। बाल स्वास्यपरक पोषण योजनाओं, टीकाकरण अभियान की सफलता में भी मीडिया की भूमिका अहम है।

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