कानून से महिला अपराध पर नियंत्रण संभव नहीं, पुरुषों को बदलनी पड़ेगी मानसिकता: सुशील मोदी

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पटना: बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने कहा है कि कानून से महिला अपराध की घटनाओं पर रोक नहीं लग सकती है. पुरुषों की मानसिकता बदलने की जरुरत है. सुशील मोदी ने कहा है कि महिलाओं को सुरक्षित रखना है तो हर घर के पुरुष और लड़कों पर नजर रखने की जरुरत है.

महिला अपराध, हेल्थ, एजुकेशन, इकोनॉमिक आधार पर जेंडर गैप को दूर करना बिहार में भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. शुक्रवार को पटना में आद्री महिला विकास निगम समेत पांच संस्थाओं की ओर से बिहार में जेंडर गैप दूर करने को लेकर विशेषज्ञों ने चर्चा की. बिहार में लड़कियों और महिलाओं की स्थिती बेहतर बनाने को लेकर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे.

सुशील मोदी ने कहा कहा कि जेंडर गैप को खत्म करने के लिए कई आयामों पर काम करने की जरुरत है. उन्होंने कहा कि महिलाओं को विकास की धारा से जोड़ने के लिए अकेले बिहार में 39 डेडिकेटेड प्रोग्राम चलाए जा रहा है. जिस पर सरकार 9 हजार 336 करोड़ रुपए वित्तीय वर्ष 2019-20 में खर्च करने जा रही है. वहीं, जेंडर बजट में 30 हजार 874 करोड़ का प्रोविजन किया गया है. जो कुल बजट का 16 फीसदी है.

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डिप्टी सीएम ने कहा कि महिलाओं को आर्थिक रुप से मजबूत करने के लिए पंचायती राज व्यवस्था में 50 फीसदी आरक्षण दिया गया है. इतना ही नहीं जीविका के जरिए राज्य की एक करोड़ महिलाएं अपने पैरों पर खडी हैं. वहीं, बिहार में सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 35 फीसदी आरक्षण दिया गया है. जबकि टीचर की नियुक्ति में आरक्षण का प्रतिशत 50 है. हमारी सरकार में हाल के दिनों 43.52 फीसदी महिलाओं की नियुक्ति पुलिस डिपार्टमेंट में हर तरह के पदों पर हुई हैं.

बिहार सरकार महिला उत्थान को लेकर भले ही अपने दावे पेश करे, लेकिन महिला सशक्तिकरण के कुछ ऐसे भी पहलू हैं जिस पर अभी और काम करने की जरुरत है. बिहार सरकार की संस्था महिला विकास निगम के आंकड़ों पर यकीन करें तो 2016-17 के मुताबकि बिहार के 10 जिले ऐसे हैं, जहां पर लड़कियों का स्कूलों में एनरोलमेंट रेश्यो खराब है. वहीं, 9 जिले ऐसे हैं जहां पर लडकियों का एनरोलमेंट रेश्यो बेहद खराब की श्रेणी में रखा गया है.

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वहीं, लड़कियों के स्कूल से ड्राप आउट रेश्यो की तस्वीर देखें तो पटना समेत कुल 10 जिलों में ड्रापआउट रेश्यो खराब पाया गया है. इसके साथ ही 9 जिलों में लड़कियों का ड्रापआउट रेश्यों काफी खराब श्रेणी में पाया गया है.

उसी तरह मेटरनल हेल्थ केयर का हाल भी कुछ ठीक नहीं है. राज्य के दस जिलों में मेटरनल हेल्थ केयर की स्थिती खराब है. साथ ही 9 जिलों में इसका स्तर और खराब पाया गया है. यानी 39 जिलों में से कुल 19 जिलों में मेटरनल हेल्थ केयर की स्थिती खराब रही है. वहीं, पोषणा आहार के मामले में भी आंकड़ा कुछ ऐसा ही है.

अब जरा महिलाओं के खिलाफ बिहार में हो रहे अपराधिक घटनाओं पर गौर कीजिए-

बिहार में महिलाओं के खिलाफ होनेवाले अपराधों में 31 फीसदी मामले महिला के पति और उसके परिजनों द्वारा किए जाने के मामले दर्ज होते हैं.
46 फीसदी मामले महिला या लड़कियों के अगवा और अपहरण के दर्ज किए जाते हैं.
9 फीसदी मामले रेप और यौन उत्पीड़न के दर्ज होते हैं.
दहेज हत्या के 8 फीसदी मामले दर्ज होते हैं.
2017 एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़ों की माने तो रेप के मामले में बिहार देश के टॉप तीन राज्यों में शामिल है. साल 2017-18 में महिला हेल्पलाईन में कुल 400 मामले आए थे. जिसमें 319 मामलों को शार्टआउट किया गया. पटना, गया सारण, सुपौल, बेगूसराय जैसे जिलों में सबसे ज्यादा मामले दर्ज दिए गए.

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हालांकि, सुशील मोदी ने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले तब तक कम नहीं होंगे, जबतक पुरुषोँ की मानसिकता नहीं बदलेगी. कानून तो काफी बने हुए हैं लेकिन सिर्फ कानून से महिला अपराध की संख्याओं में कमी नहीं आने वाली है.

इधर, विश्व बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट मार्टिन रामा ने कहा है कि बिहार में महिलाओं को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है तो उन्हें हर क्षेत्र में अवसर देना होगा. खासतौर पर ऐसी महिलाओं को समाज की मुख्यधारा से जोड़ना होगा जो कम शिक्षित हैं. उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे. साथ ही साथ लड़कियों के स्कूल ड्रापआउट रेश्यो को भी रोकने की जरुरत है.

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