2020 का चुनाव: वोट बैंक में भले ही हिस्सेदारी कम हो फिर भी सियासी पार्टियाँ स्वर्णों पर मेहरबान क्यों ?

0
22

बिहार के वोट बैंक में भले ही सवर्णों की हिस्सेदारी कम हो, लेकिन आरजेडी और जेडीयू के अलावा कांग्रेस की कमान भी एक सवर्ण नेता के ही हाथ में है.

बिहार में सियासी पार्टियों को सवर्ण जाति फिर से भाने लगी है. सूबे की राजनीति अब बदलने लगी है. शायद यही कारण है कि दलितों-पिछड़ों की सियासत करने वाले अब सवर्णों के विकास की बात करने लगे हैं. जो नेता कभी सवर्णो को ‘भूरा बाल’ बताकर उसे साफ करने की बात करते थे, आज उन्हें गले लगा रहे हैं. माला पहना रहे हैं. यही नहीं पार्टी की कमान तक सौंप रहे हैं. बिहार की राजनीति में सवर्णों की भागीदारी यकीनन बढ़ने लगी है, तभी तो लालू प्रसाद यादव जैसे नेता का भी ह्रदय परिवर्तन हुआ है.

लालू की पार्टी में पहली बार अगड़ी जाति को कमान

दरअसल, लालू ने पहली बार अपनी पार्टी RJD की कमान किसी अगड़ी जाति के नेता को सौंपी है. जगदानन्द सिंह अगड़ी जाति के पहले आरजेडी प्रदेश बनाए गए हैं. कुछ इसी तरह बाकी पार्टियों में भी अगड़ों के हाथों में ही पार्टी की बागडोर दी गई है. नीतीश कुमार की पार्टी की कमान भी एक अगड़े नेता के ही हाथों में हैं, जिनपर नीतीश कुमार न सिर्फ बहुत विश्वास करते हैं, बल्कि उनकी सलाह को भी मानते हैं. वह हैं वशिष्ठ नारायण सिंह जो लंबे समय से बिहार जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष पद पर काबिज हैं.

यह भी पढ़े  अमेरिका के फ्लोरिडा में हाइ स्कूल पर फायरिंग, 17 की मौत

कांग्रेस का नेतृत्व भी सवर्णों के हाथ में
आरजेडी और जेडीयू के अलावा कांग्रेस की कमान भी एक सवर्ण नेता के ही हाथों में है. मदन मोहन झा अभी बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं. इस तरह अधिकांश पार्टियां सवर्णों पर ही दांव लगा रही हैं. इसमें वाम दल भी पीछे नहीं हैं. सीपीआई की कमान सत्यनारायण सिंह और भाकपा (माले) की बागडोर भी बिहार में एक अगड़ी जाति के नेता कुणाल के ही पास है.

सवर्ण प्रेम के पीछे है वोटबैंक का ‘तिलिस्म’
जिस तरह से बिहार की राजनीति में सवर्णों की भागीदारी बढ़ी है और सियासी पार्टियों का सवर्ण नेताओं पर भरोसा भी बढ़ा है, ऐसे में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या बिहार में राजनीति का केंद्र बिंदु अब सवर्ण ही हैं. दरअसल, सारा खेल 13 प्रतिशत सवर्ण वोटबैंक का है. बिहार के वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी की मानें तो सारी पार्टियां इसी तिलिस्‍म के चक्कर में सवर्णों पर डोरे डाल रही हैं और यही कारण है कि अधिकांश पार्टियां अब अपने अगड़े नेताओं पर दांव लगा रही हैं. इसमें सबसे चौंकाने वाला फ़ेरबदल हुआ है लालू की पार्टी में जहां स्थापना काल से अब तक पार्टी की कमान या तो पिछड़ों को मिला है या फिर अकलियतों को. यानि MY समीकरण को देखकर ही आरजेडी में हमेशा से अध्यक्ष चुने जाते रहे हैं, लेकिन इस बार लालू ने अगड़ी जाति के नेता जगदानन्द सिंह को पार्टी की कमान सौंप कर सबको हैरत में डाल दिया है.

यह भी पढ़े  राज्य में प्री-पेड मीटर लगाने का काम भी तेज गति से करें : नीतीश

सवर्ण आरक्षण बना एनडीए सरकार का मास्टरस्ट्रोक
जब से नरेंद्र मोदी की सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का ऐलान किया है, उसके बाद से ही अधिकांश पार्टियों की नजर इस वोटबैंक पर टिक गई हैं. शायद इसी बात को लेकर बीजेपी खुद को आज सवर्णों की सबसे बड़ी हिमायती बताती है. बीजेपी प्रवक्ता निखिल आनन्द का दावा है कि अकेले बीजेपी ऐसी पार्टी है, जिसने गरीब सवर्णों का न सिर्फ दर्द जाना, बल्कि उन्हें 10 प्रतिशत आरक्षण देकर उनका वाजिब हक भी दिलाया.

आरजेडी को वर्ष 2020 से आस
आरजेडी को भी लगता है कि जगदानन्द सिंह वर्ष 2020 में आरजेडी के लिए तुरुप का पत्ता साबित होंगे. पार्टी के नेता मृत्युंजय तिवारी की मानें तो उनकी पार्टी शुरू से ही सबके अधिकारों की लड़ाई लड़ी है. खासकर सवर्ण लालू प्रसाद के करीब भी रहे हैं. यह अलग बात है कि विरोधी लालू प्रसाद पर सवर्ण विरोधी का झूठा आरोप लगाते हैं.

यह भी पढ़े  बारिश का कहर, 16 जिलों में अलर्ट हालात पर नजर रखें : नीतीश

2020 का चुनाव होगा असली टेस्ट
साल 2020 का चुनाव वाकई बहुत दिलचस्प होनेवाला है, खास कर जिस तरह से सारी पार्टियां सवर्णों को रिझाने में जुटी हैं. ऐसे में देखना ये भी दिलचस्प होगा कि सवर्ण आखिर किस पर अपना भरोसा जताते हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here