अवसरवाद की राजनितिक भवर में फसा महाराष्ट्र

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महाराष्ट्र की राजनीति पूरे 180 डिग्री मुड़ चुकी है। शिवसेना की 50-50 यानी ढाई-ढाई साल मुख्यमंत्री की जिद के बाद भाजपा को हथियार डालना ही था। इसके साथ महाराष्ट्र में राजनीति का एक नया समीकरण बन रहा है। राकांपा के साफ करने के बाद कि शिवसेना के साथ उनकी बात पहले से चल रही थी, इसमे संशय की कोई गुंजाइश नहीं कि उसका रु ख भाजपा के खिलाफ इतना कड़ा क्यों था। राकांपा की ओर से उसे शह नहीं मिली होती तो वह इतना आगे नहीं बढ़ पाती। भारतीय राजनीति की विडम्बना है कि कल तक एक दूसरे के राजनैतिक वैरी ही नहीं, वैचारिक दुश्मन माने जाने वाले सत्ता के लिए साथ आ रहे हैं। आखिर, शिवसेना एक कट्टर हिंदूवादी पार्टी है। राकांपा या कांग्रेस के साथ उसका रिश्ता कैसे हो सकता है? भाजपा को सत्ता से बाहर रखने की रणनीति में सेक्युलरवाद का राग अलापने वाली पार्टयिां इतना आगे बढ़ जाएं कि विचारधारा की दूरी ही खत्म हो जाए तो फिर इसे अवसरवाद के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। बहरहाल, 105 सीटें रखते हुए भाजपा का सत्ता से बाहर होना बड़ी घटना है, क्योंकि जनता ने शिवसेना के साथ उसे सरकार बनाने का बहुमत दिया था। परिणाम आने तक कोई सोच भी नहीं सकता था कि सत्ता तक पहुंची भाजपा को उसके गठबंधन की साथी शिवसेना ही बाहर कर देगी। यह हो गया है। किंतु इसे आप महाराष्ट्र की राजनीति का स्थायी पड़ाव नहीं कह सकते। शिवसेना का चरित्र धैर्य और संयम से बात-व्यवहार का कभी नहीं रहा है। भाजपा के साथ प्रदेश और केंद्र की सरकार में शामिल रहते हुए भी वह साढ़े चार वर्ष से ज्यादा समय तक दोनों सरकारों के खिलाफ विपक्ष की तरह बयान देती रही। शरद पवार इनको किस तरह संयमित कर पाएंगे, देखना होगा। शिवसेना को भी अपनी मूल विचारधारा का परित्याग करना होगा जो आज तक उसकी पहचान रही है। हिंदुत्व के एजेंडा के साथ तो इस गठबंधन में काम नहीं कर सकते। वह सत्ता के लिए अपनी विचारधारा को तिलांजलि देने को तैयार हैं तो आम लोग इसका अर्थ क्या लगाएंगे? भविष्य में उसके लिए अपने समर्थकों को जवाब देना कठिन होगा। यही बात राकांपा और कांग्रेस पर भी लागू होती है। एक धुर हिंदुत्ववादी पार्टी, जिसकी वे तीखी निंदा कर रहे थे, के साथ आने का उद्देश्य क्या है, यह सवाल उनके उपर बार-बार हथौड़ों की तरह प्रहार करता रहेगा। महाराष्ट्र में सबसे बड़ी चिंता ऐसी सरकार की स्थिरता का होगा। इस तरह की सरकारों ने कभी अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया।

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