प्रशांत किशोर की बांकीपुर में जीत का एक संदेश यह निकला है कि जाति और दल के दायरे से बाहर निकल कर लोगों ने जन सुराज को वोट दिया. खासकर, भूराबाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला) की जमात ने उन्हें पसंद किया. अब तो सूचनाएं आ रही हैं कि वे भूराबाल की जमात का नेतृत्व करेंगे. जिस भूराबाल ने कभी लालू यादव के साम्राज्य का अंत करने में बड़ी भूमिका निभाई, वही कुनबा अब प्रशांत किशोर को कबूल करने के लिए आगे आया है. इससे एक उम्मीद जगी है कि बिहार 70 के दशक के पहले के राजनीतिक परिवेश की ओर बढ़ रहा है. जातीय राजनीति के लिए बदनाम बिहार में ऐसा चमत्कार किसी ने सोचा भी नहीं होगा. खैर, यह तो उपचुनाव था, जिसमें प्रशांत ने कामयाबी हासिल कर ली, जब विधानसभा या लोकसभा के पूर्ण चुनाव होंगे, तब जाकर यह स्पष्ट हो पाएगा कि जातीय जकड़न से मुक्त होने के लिए सचमुच बिहार तैयार हो गया है या अब भी कसर बाकी है.
बिहार की राजनीति में जाति हावी
बिहार की राजनीति जातीय ध्रुवीकरण और इस आधार पर बने समीकरणों के लिए बदनाम रही है. हालांकि यह स्थिति 1977 के पहले कभी नहीं रही. आजादी के बाद से अब तक के मुख्यमंत्रियों की सूची पर नजर डालें तो कुल 20 मुख्यमंत्रियों में सिर्फ 9 ही दलित या पिछड़े समाज से बने हैं. कर्पूरी ठाकुर और लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल को छोड़ दें तो बिहार में जातीय विद्वेष पहले कभी इतना विद्रूप नहीं रहा. कर्पूरी ठाकुर ने आरक्षण पर मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशें लागू की तो लालू यादव आरक्षण पर बीपी मंडल आयोग की सिफारिशो के लागू होने के बाद पिछड़ों के हितैषी बन कर उभरे. कर्पूरी ठाकुर को इस क्रांतिकारी कदम का राजनीतिक लाभ भले नहीं मिल पाया, लेकिन वे न सिर्फ पिछड़े वर्ग के हितैषी बन कर उभरे. बल्कि अब तो हर दल और समाज के लिए वे आदरणीय और पूजनीय हो गए हैं. अलबत्ता लालू यादव ने 15 साल भरपूर इसकी फसल काटी.
बिहार की राजनीति जातीय ध्रुवीकरण और इस आधार पर बने समीकरणों के लिए बदनाम रही है. हालांकि यह स्थिति 1977 के पहले कभी नहीं रही. आजादी के बाद से अब तक के मुख्यमंत्रियों की सूची पर नजर डालें तो कुल 20 मुख्यमंत्रियों में सिर्फ 9 ही दलित या पिछड़े समाज से बने हैं. कर्पूरी ठाकुर और लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल को छोड़ दें तो बिहार में जातीय विद्वेष पहले कभी इतना विद्रूप नहीं रहा. कर्पूरी ठाकुर ने आरक्षण पर मुंगेरी लाल आयोग की सिफारिशें लागू की तो लालू यादव आरक्षण पर बीपी मंडल आयोग की सिफारिशो के लागू होने के बाद पिछड़ों के हितैषी बन कर उभरे. कर्पूरी ठाकुर को इस क्रांतिकारी कदम का राजनीतिक लाभ भले नहीं मिल पाया, लेकिन वे न सिर्फ पिछड़े वर्ग के हितैषी बन कर उभरे. बल्कि अब तो हर दल और समाज के लिए वे आदरणीय और पूजनीय हो गए हैं. अलबत्ता लालू यादव ने 15 साल भरपूर इसकी फसल काटी.
1977 में कर्पूरी ठाकुर का विरोध
केंद्र में कांग्रेस के पराभव के बाद राज्यों में भी जनता पार्टी की सरकारें बनने लगी थीं. बिहार में बनी जनता पार्टी की सरकार के मुखिया ख्यात समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर बने. 1978 में उन्होंने ठंडे बस्ते में पड़ी मुंगेरीलाल आयोग की रिपोर्ट को बाहर निकाला और उसे लागू कर दिया. इसमें पिछड़ों के आरक्षण का मुद्दा प्रमुख था. इसका सवर्ण समाज ने जम कर विरोध किया. कर्पूरी ठाकुर को खूब गालियां सुनाई गईं. इतना ही नहीं, कर्पूरी ठाकुर का यह क्रांतिकारी कदम उनकी सियासी शहादत का कारण भी बना. कर्पूरी ठाकुर से सीएम की कुर्सी छिन गई. यहीं से बिहार की राजनीति में जाति का बोलबाला बढ़ा. अगड़े-पिछड़े की रेखा ने समाज का दो हिस्सो में स्पष्ट विभाजन करा दिया. कर्पूरी ठाकुर के इस कदम का लाभ दूसरे पिछड़े नेताओं को अब तक मिलता रहा है. वे जातीय गोलबंदी के सहारे चुनाव को प्रभावित करते हैं. कर्पूरी ठाकुर को भाजपा सरकार ने न सिर्फ भारत रत्न दिया, बल्कि उनकी जयंती और पुण्यतिथि मनाने की सभी दलों में होड़ लगी रहती है. उनका गांव राजनीतिकों के लिए तीर्थ स्थल बन गया है.
केंद्र में कांग्रेस के पराभव के बाद राज्यों में भी जनता पार्टी की सरकारें बनने लगी थीं. बिहार में बनी जनता पार्टी की सरकार के मुखिया ख्यात समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर बने. 1978 में उन्होंने ठंडे बस्ते में पड़ी मुंगेरीलाल आयोग की रिपोर्ट को बाहर निकाला और उसे लागू कर दिया. इसमें पिछड़ों के आरक्षण का मुद्दा प्रमुख था. इसका सवर्ण समाज ने जम कर विरोध किया. कर्पूरी ठाकुर को खूब गालियां सुनाई गईं. इतना ही नहीं, कर्पूरी ठाकुर का यह क्रांतिकारी कदम उनकी सियासी शहादत का कारण भी बना. कर्पूरी ठाकुर से सीएम की कुर्सी छिन गई. यहीं से बिहार की राजनीति में जाति का बोलबाला बढ़ा. अगड़े-पिछड़े की रेखा ने समाज का दो हिस्सो में स्पष्ट विभाजन करा दिया. कर्पूरी ठाकुर के इस कदम का लाभ दूसरे पिछड़े नेताओं को अब तक मिलता रहा है. वे जातीय गोलबंदी के सहारे चुनाव को प्रभावित करते हैं. कर्पूरी ठाकुर को भाजपा सरकार ने न सिर्फ भारत रत्न दिया, बल्कि उनकी जयंती और पुण्यतिथि मनाने की सभी दलों में होड़ लगी रहती है. उनका गांव राजनीतिकों के लिए तीर्थ स्थल बन गया है.
90 के दशक में लालू थे निशाने पर
बिहार में जातीय विद्वेष का दूसरा दौर 1989 में शुरू हुआ, जब प्रधानमंत्री रहते विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग (बीपी मंडल के नेतृत्व वाला) की आरक्षण संबंधी रिपोर्ट लागू की. रिपोर्ट लागू होते ही देश में सबसे बड़ा जातीय उन्माद देखने को मिला. बिहार-यूपी समेत सभी राज्यों में कमोबेश इसका असर महसूस किया गया. दो हिस्सों में बंटी बिहार की राजनीति के नए नायक बने लालू प्रसाद यादव. 1990 में उन्हें बिहार की कमान मिल गई. उन्होंने सवर्ण विरोधी अपने नारों से दलित-पिछड़ों को नए अंदाज में जागृत किया. उसी वक्त भूराबाल साफ करो का नारा गूंजा. कहते हैं कि यह नारा लालू यादव की देन है. हालांकि अभी तक न लालू ने ऐसे बयान को स्वीकारा है और न इसका कोई लिखित दस्तावेज ही उपलब्ध है. पर, सवर्ण समाज को इसे सच मान लेने की मजबूरी इसलिए रही कि लालू के दौर में सवर्ण समाज के लोग हाशिए पर चले गए. वैसे एक सच यह भी है कि लालू ने सवर्ण नेताओं को भी अपने साथ जोड़े रखा, ताकि उनकी असल मंशा जाहिर न हो पाए. प्रभुनाथ सिंह, रघुवंश प्रसाद सिंह, विजय कृष्ण और जगदानंद सिंह जैसे राजपूत नेता लालू के तारणहार बनते रहे.
बिहार में जातीय विद्वेष का दूसरा दौर 1989 में शुरू हुआ, जब प्रधानमंत्री रहते विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग (बीपी मंडल के नेतृत्व वाला) की आरक्षण संबंधी रिपोर्ट लागू की. रिपोर्ट लागू होते ही देश में सबसे बड़ा जातीय उन्माद देखने को मिला. बिहार-यूपी समेत सभी राज्यों में कमोबेश इसका असर महसूस किया गया. दो हिस्सों में बंटी बिहार की राजनीति के नए नायक बने लालू प्रसाद यादव. 1990 में उन्हें बिहार की कमान मिल गई. उन्होंने सवर्ण विरोधी अपने नारों से दलित-पिछड़ों को नए अंदाज में जागृत किया. उसी वक्त भूराबाल साफ करो का नारा गूंजा. कहते हैं कि यह नारा लालू यादव की देन है. हालांकि अभी तक न लालू ने ऐसे बयान को स्वीकारा है और न इसका कोई लिखित दस्तावेज ही उपलब्ध है. पर, सवर्ण समाज को इसे सच मान लेने की मजबूरी इसलिए रही कि लालू के दौर में सवर्ण समाज के लोग हाशिए पर चले गए. वैसे एक सच यह भी है कि लालू ने सवर्ण नेताओं को भी अपने साथ जोड़े रखा, ताकि उनकी असल मंशा जाहिर न हो पाए. प्रभुनाथ सिंह, रघुवंश प्रसाद सिंह, विजय कृष्ण और जगदानंद सिंह जैसे राजपूत नेता लालू के तारणहार बनते रहे.
नीतीश भी जातीय नेता बन उभरे
बिहार के जातीय उन्माद का ही नतीजा है कि सवर्ण समाज को अब कोई पिछड़ा नेता आसानी से कबूल नहीं होता. नीतीश कुमार ने तो अपनी समझदारी से कभी किसी को यह महसूस ही नहीं होने दिया कि वे पिछड़े तबके के हिमायती हैं. सवर्ण आयोग का गठन कर उन्होंने उनको साधा तो दलितों का दलित-महा दलित में विभाजन कर एक धड़े के हितैषी बन कर उभरे. मुसलमानों में पसमांदा (पिछड़ों) को अलग कर नीतीश ने उनमें भी अपनी जगह बना ली. भूमिहार तो नीतीश के राजनीतिक तारणहार बने ही रहे. आज भी ललन सिंह और विजय चौधरी पर नीतीश का अत्यधिक भरोसा यही संदेश देता है कि नीतीश सबके लिए काम करने वाले सीएम रहे हैं. हालांकि आरंभ में नीतीश की ताकत भी जातीय राजनीति के कारण ही बनी. 1994 की कुर्मी चेतना रैली में नीतीश को नेता के तौर पर न सिर्फ कुर्मी जाति के लोगों ने उन्हें कबूल किया, बल्कि कुशवाहा समाज के साथ लव-कुश समीकरण बना कर उन्हें 10-11 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधि भी मान लिया. नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक कौशल के तड़के से सबको साधने की कोशिश की. हर जाति में नीतीश ने अपने कामों से समर्थक वर्ग तैयार कर लिए.
बिहार के जातीय उन्माद का ही नतीजा है कि सवर्ण समाज को अब कोई पिछड़ा नेता आसानी से कबूल नहीं होता. नीतीश कुमार ने तो अपनी समझदारी से कभी किसी को यह महसूस ही नहीं होने दिया कि वे पिछड़े तबके के हिमायती हैं. सवर्ण आयोग का गठन कर उन्होंने उनको साधा तो दलितों का दलित-महा दलित में विभाजन कर एक धड़े के हितैषी बन कर उभरे. मुसलमानों में पसमांदा (पिछड़ों) को अलग कर नीतीश ने उनमें भी अपनी जगह बना ली. भूमिहार तो नीतीश के राजनीतिक तारणहार बने ही रहे. आज भी ललन सिंह और विजय चौधरी पर नीतीश का अत्यधिक भरोसा यही संदेश देता है कि नीतीश सबके लिए काम करने वाले सीएम रहे हैं. हालांकि आरंभ में नीतीश की ताकत भी जातीय राजनीति के कारण ही बनी. 1994 की कुर्मी चेतना रैली में नीतीश को नेता के तौर पर न सिर्फ कुर्मी जाति के लोगों ने उन्हें कबूल किया, बल्कि कुशवाहा समाज के साथ लव-कुश समीकरण बना कर उन्हें 10-11 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधि भी मान लिया. नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक कौशल के तड़के से सबको साधने की कोशिश की. हर जाति में नीतीश ने अपने कामों से समर्थक वर्ग तैयार कर लिए.
अब सवर्णों की सम्राट से नाराजगी
भाजपा को सवर्णों की चहेती पार्टी माना जाता रहा है. इसलिए सवर्णों की उससे अपेक्षाएं भी अधिक रहती हैं. नीतीश कुमार ने जब 20 वर्षों तक सीएम रहने के बाद कुर्सी खाली की तो उन्होंने अपनी पसंद के भाजपा नेता सम्राट चौधरी को सीएम बनाने का प्रस्ताव दे दिया. पिछड़े वर्ग से आने वाले सम्राट को लेकर भाजपा के सवर्ण नेताओं में ही नाराजगी दिखती रही है तो आम आदमी की कौन कहे. जिन दिनों सम्राट को सीएम बनाने की चर्चा चल रही थी, तब विजय सिन्हा की नाराजगी सबने देखी है. दूसरे सवर्ण नेता भी नाराज हुए होंगे, लेकिन वे विजय सिन्हा की तरह मुखरता नहीं दिखा पाए. हालांकि बिहार की राजनीति के मिजाज को भांप कर ही सम्राट पर भाजपा ने दांव लगाया. उनमें संभावनाएं देख कर ही पार्टी नेतृत्व ने उन्हें पहले सदन में नेता बनाया. फिर प्रदेश अध्यक्ष और 2 बार डेप्युटी सीएम की जिम्मेवारी सौंपी. लव-कुश समीकरण में फिट बैठने वाले सम्राट को नीतीश ने भी अपना पसंदीदा बता दिया. भाजपा के सिरमौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी पिछड़़े वर्ग से ही आते हैं. सम्राट पहले से ही उनके चहेते रहे हैं. पर, बांकीपुर में भाजपा का किला ध्वस्त होने के पीछे एक बड़ा कारण सम्राट के प्रति सवर्णों की नापसंदगी का इजहार भी माना जा रहा है. इसी बीच भोजपुर में भरत तिवारी के एनकाउंटर ने सम्राट को सबक सिखाने में आग में घी का काम किया.
भाजपा को सवर्णों की चहेती पार्टी माना जाता रहा है. इसलिए सवर्णों की उससे अपेक्षाएं भी अधिक रहती हैं. नीतीश कुमार ने जब 20 वर्षों तक सीएम रहने के बाद कुर्सी खाली की तो उन्होंने अपनी पसंद के भाजपा नेता सम्राट चौधरी को सीएम बनाने का प्रस्ताव दे दिया. पिछड़े वर्ग से आने वाले सम्राट को लेकर भाजपा के सवर्ण नेताओं में ही नाराजगी दिखती रही है तो आम आदमी की कौन कहे. जिन दिनों सम्राट को सीएम बनाने की चर्चा चल रही थी, तब विजय सिन्हा की नाराजगी सबने देखी है. दूसरे सवर्ण नेता भी नाराज हुए होंगे, लेकिन वे विजय सिन्हा की तरह मुखरता नहीं दिखा पाए. हालांकि बिहार की राजनीति के मिजाज को भांप कर ही सम्राट पर भाजपा ने दांव लगाया. उनमें संभावनाएं देख कर ही पार्टी नेतृत्व ने उन्हें पहले सदन में नेता बनाया. फिर प्रदेश अध्यक्ष और 2 बार डेप्युटी सीएम की जिम्मेवारी सौंपी. लव-कुश समीकरण में फिट बैठने वाले सम्राट को नीतीश ने भी अपना पसंदीदा बता दिया. भाजपा के सिरमौर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी पिछड़़े वर्ग से ही आते हैं. सम्राट पहले से ही उनके चहेते रहे हैं. पर, बांकीपुर में भाजपा का किला ध्वस्त होने के पीछे एक बड़ा कारण सम्राट के प्रति सवर्णों की नापसंदगी का इजहार भी माना जा रहा है. इसी बीच भोजपुर में भरत तिवारी के एनकाउंटर ने सम्राट को सबक सिखाने में आग में घी का काम किया.
क्या जेन Z कर पाएगा कोई करिश्मा
माना जा रहा है कि जेन Z को जातीय-धार्मिक भावनाएं पसंद नहीं. वे इसे तवज्जो देना नहीं चाहते. अगर ऐसा होता है तो यह करिश्मा ही माना जाएगा. वैसे जेन Z को काक्रोच जनता पार्टी (CJP) ने पहली बार ध्रुवीकृत करने की कोशिश की है. दिल्ली के जंतर-मंतर से झारखंड के छात्र आंदोलन तक जातीय विभाजन तो नहीं दिखा है, लेकिन चुनाव में इसका रुख क्या होगा, इसके लिए अभी इंतजार करना होगा. बांकीपुर में इसका असर कुछ हद तक माना जा सकता है, लेकिन मतदान में उत्साह के अभाव से संदेह की गुंजाइश शेष है.
माना जा रहा है कि जेन Z को जातीय-धार्मिक भावनाएं पसंद नहीं. वे इसे तवज्जो देना नहीं चाहते. अगर ऐसा होता है तो यह करिश्मा ही माना जाएगा. वैसे जेन Z को काक्रोच जनता पार्टी (CJP) ने पहली बार ध्रुवीकृत करने की कोशिश की है. दिल्ली के जंतर-मंतर से झारखंड के छात्र आंदोलन तक जातीय विभाजन तो नहीं दिखा है, लेकिन चुनाव में इसका रुख क्या होगा, इसके लिए अभी इंतजार करना होगा. बांकीपुर में इसका असर कुछ हद तक माना जा सकता है, लेकिन मतदान में उत्साह के अभाव से संदेह की गुंजाइश शेष है.







