संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (United Nations Security Council – UNSC) केवल एक संस्था नहीं, बल्कि विश्व की सामूहिक सुरक्षा, शांति और वैश्विक शक्ति-संतुलन का सबसे प्रभावशाली मंच है। यहीं युद्ध और शांति के निर्णय होते हैं, प्रतिबंध लगाए जाते हैं, शांति सेना भेजी जाती है और अंतरराष्ट्रीय संकटों का समाधान खोजा जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि 21वीं सदी के तीसरे दशक में भी इस परिषद की संरचना 1945 की विश्व व्यवस्था को प्रतिबिंबित करती है, जबकि दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या आज की वैश्विक वास्तविकताओं में भारत जैसे देश को अब भी स्थायी सदस्यता से वंचित रखना न्यायसंगत है?
यह केवल भारत की महत्वाकांक्षा का विषय नहीं है, बल्कि वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता, प्रतिनिधित्व और लोकतांत्रिक चरित्र का भी प्रश्न है। इस वक्त भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में अपनी दावेदारी मजबूत करने जा रहा है, जो बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य और राजनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है. जब दुनिया पश्चिम एशिया तनाव और यूक्रेन युद्ध से जूझ रही है, भारत ने 2028-29 के लिए UNSC के अस्थायी सदस्य पद का चुनाव अभियान आधिकारिक रूप से लॉन्च कर दिया है. साउथ एशिया की अहम धुरी बन चुका भारत आज एक मजबूर स्थिति में है, लेकिन 70 के दशक का वो दौर भी था, जब भारत को पाकिस्तानी कूटनीति के आगे हार माननी पड़ गई थी. दिसंबर 1971 की जीत के बाद भारत, दक्षिण एशिया का बड़ा खिलाड़ी बन चुका था. बांग्लादेश का बनना, पाकिस्तान की सेना की शर्मनाक हार और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती आवाज ने ये उम्मीद पैदा कर दी थी कि अब भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में भी कम से कम प्रभावी अस्थायी स्थान बना लेगा पर हुआ कुछ अलग ही.
इतिहास की विरासत और वर्तमान की चुनौती
द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई। उस समय विश्व की राजनीतिक और आर्थिक शक्ति कुछ गिने-चुने देशों तक सीमित थी। इसी आधार पर अमेरिका, रूस (तत्कालीन सोवियत संघ), ब्रिटेन, फ्रांस और चीन को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाया गया तथा उन्हें वीटो का अधिकार मिला।
उस समय भारत स्वतंत्र भी नहीं हुआ था। इसलिए उसके प्रतिनिधित्व का प्रश्न स्वाभाविक रूप से नहीं उठा। किंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत ने जिस प्रकार लोकतंत्र, विकास और अंतरराष्ट्रीय शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई, उसने उसे वैश्विक राजनीति का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना दिया।
बीते आठ दशकों में विश्व व्यवस्था पूरी तरह बदल चुकी है। औपनिवेशिक शासन समाप्त हो चुका है, एशिया और अफ्रीका के अनेक राष्ट्र स्वतंत्र हो चुके हैं, आर्थिक शक्ति का केंद्र यूरोप से एशिया की ओर स्थानांतरित हो रहा है और वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज पहले से कहीं अधिक मजबूत हुई है। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का ढांचा जस का तस बना हुआ है।
यही सबसे बड़ा विरोधाभास है।
भारत क्यों है सबसे प्रबल दावेदार?
भारत की दावेदारी केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं है। इसके पीछे अनेक ठोस तर्क हैं।
सबसे पहले, भारत आज विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लगभग डेढ़ अरब लोगों की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करने वाला देश यदि वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के सर्वोच्च मंच पर स्थायी रूप से उपस्थित नहीं है, तो यह प्रतिनिधित्व की गंभीर कमी को दर्शाता है।
दूसरे, भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, डिजिटल अर्थव्यवस्था, अंतरिक्ष विज्ञान, रक्षा उत्पादन और तकनीकी नवाचार में उसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है।
तीसरे, संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में भारत का योगदान ऐतिहासिक रहा है। हजारों भारतीय सैनिकों ने अफ्रीका, एशिया और अन्य क्षेत्रों में शांति स्थापना के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है। शांति सैनिक भेजने वाले देशों में भारत हमेशा अग्रणी रहा है।
चौथे, भारत परमाणु शक्ति होने के बावजूद जिम्मेदार परमाणु नीति अपनाने वाला देश है। “नो फर्स्ट यूज़” जैसी नीति और अंतरराष्ट्रीय नियमों के प्रति सम्मान ने भारत को एक उत्तरदायी शक्ति के रूप में स्थापित किया है।
पाँचवें, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य संकट और विकास जैसे वैश्विक मुद्दों पर भारत ने हमेशा रचनात्मक नेतृत्व दिखाया है। कोविड-19 महामारी के दौरान “वैक्सीन मैत्री” अभियान इसका सबसे बड़ा उदाहरण रहा।
यदि भारत इतना योग्य है, तो सदस्यता क्यों नहीं?
यहीं से अंतरराष्ट्रीय राजनीति का वास्तविक चेहरा सामने आता है।
संयुक्त राष्ट्र का चार्टर बदलना आसान नहीं है। स्थायी सदस्यता में किसी भी परिवर्तन के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन और वर्तमान पाँचों स्थायी सदस्यों की स्वीकृति आवश्यक है। अर्थात जिस व्यवस्था से सबसे अधिक लाभ वर्तमान स्थायी सदस्यों को मिलता है, उसी व्यवस्था को बदलने की अंतिम शक्ति भी उन्हीं के पास है।
यही कारण है कि सुधार की मांग दशकों से उठ रही है, लेकिन परिणाम शून्य है।
भारत की दावेदारी का कई देश समर्थन करते हैं। अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस विभिन्न अवसरों पर भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं। अनेक अफ्रीकी और लैटिन अमेरिकी देश भी परिषद के विस्तार के पक्षधर हैं।
सबसे बड़ा विरोध प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से चीन की ओर से दिखाई देता है। चीन कभी खुलकर भारत का विरोध नहीं करता, लेकिन सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में उसकी अनिच्छा स्पष्ट रही है। पाकिस्तान भी लगातार भारत की दावेदारी का विरोध करता रहा है, हालांकि उसकी वैश्विक प्रभाव क्षमता सीमित है।
भारत की विदेश नीति का नया आत्मविश्वास
एक समय भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता और नैतिक कूटनीति तक सीमित मानी जाती थी। लेकिन पिछले एक दशक में भारत ने अपनी रणनीतिक सोच का व्यापक विस्तार किया है।
आज भारत एक साथ अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान, यूरोप, खाड़ी देशों और अफ्रीकी राष्ट्रों के साथ मजबूत संबंध बनाए हुए है। QUAD का सदस्य होने के बावजूद BRICS और SCO में सक्रिय भूमिका निभाना भारत की संतुलित कूटनीति का उदाहरण है।
G20 की सफल अध्यक्षता ने भी भारत की वैश्विक क्षमता को नई पहचान दी। “वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर” का संदेश केवल एक नारा नहीं था, बल्कि भारत की उस सोच का प्रतिबिंब था जिसमें वैश्विक दक्षिण को अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान दिलाने की मांग निहित है।
केवल भारत ही नहीं, पूरी व्यवस्था को सुधार की आवश्यकता
UNSC सुधार का प्रश्न केवल भारत तक सीमित नहीं है।
आज अफ्रीका के 54 देशों का कोई स्थायी प्रतिनिधि नहीं है। लैटिन अमेरिका का भी कोई स्थायी सदस्य नहीं है। मुस्लिम बहुल देशों का भी स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है।
ऐसी स्थिति में सुरक्षा परिषद विश्व की वास्तविक शक्ति-संरचना का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
यदि संयुक्त राष्ट्र को भविष्य में प्रासंगिक बने रहना है तो उसे अधिक समावेशी, अधिक लोकतांत्रिक और अधिक प्रतिनिधिक बनना ही होगा।
वीटो प्रणाली पर भी पुनर्विचार आवश्यक
सुरक्षा परिषद की सबसे विवादास्पद व्यवस्था वीटो अधिकार है।
एक स्थायी सदस्य अकेले पूरे विश्व समुदाय की इच्छा को रोक सकता है। यूक्रेन युद्ध, गाजा संकट और सीरिया जैसे अनेक मामलों में यह स्पष्ट हुआ कि जब स्थायी सदस्यों के हित टकराते हैं तो सुरक्षा परिषद लगभग निष्क्रिय हो जाती है।
यही कारण है कि अनेक विशेषज्ञ अब वीटो व्यवस्था में सुधार या उसके सीमित उपयोग की मांग कर रहे हैं।
यदि नए स्थायी सदस्य बनाए जाते हैं तो यह भी तय करना होगा कि उन्हें वीटो मिलेगा या नहीं। यदि नहीं मिलेगा तो क्या वे वास्तव में स्थायी सदस्य कहलाएंगे? और यदि मिलेगा तो क्या परिषद और अधिक जटिल नहीं हो जाएगी?
यह बहस आने वाले वर्षों में और तीव्र होगी।
भारत के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं
भारत की दावेदारी जितनी मजबूत है, चुनौतियाँ भी उतनी ही बड़ी हैं।
सीमा विवाद, क्षेत्रीय तनाव, चीन का विरोध, पाकिस्तान का प्रचार, वैश्विक शक्ति-संतुलन और संयुक्त राष्ट्र सुधार की धीमी प्रक्रिया भारत के सामने प्रमुख बाधाएँ हैं।
इसके अतिरिक्त भारत को अपनी आर्थिक शक्ति, तकनीकी नेतृत्व, रक्षा क्षमता और वैश्विक निवेश आकर्षण को लगातार बढ़ाना होगा। केवल नैतिक तर्कों से स्थायी सदस्यता नहीं मिलती; उसके पीछे ठोस सामरिक और आर्थिक शक्ति भी आवश्यक होती है।
भारत को वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ अपने संबंध और मजबूत करने होंगे ताकि सुधार की मांग केवल भारत की मांग न रहकर एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन बन सके।
भविष्य की दिशा
आने वाला दशक वैश्विक शक्ति परिवर्तन का दशक माना जा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु संकट, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री मार्ग, खाद्य सुरक्षा और तकनीकी प्रतिस्पर्धा विश्व राजनीति के नए केंद्र बन चुके हैं।
इन सभी विषयों में भारत निर्णायक भूमिका निभाने की क्षमता रखता है।
यदि सुरक्षा परिषद अपनी वर्तमान संरचना में बनी रहती है तो उसकी वैधता पर प्रश्न लगातार बढ़ेंगे। दुनिया उस संस्था को कितना स्वीकार करेगी जो 1945 की शक्ति-संरचना में कैद हो, जबकि 2045 की दुनिया पूरी तरह अलग हो?
भारत की स्थायी सदस्यता केवल भारत की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह विश्व व्यवस्था को अधिक संतुलित, अधिक प्रतिनिधिक और अधिक विश्वसनीय बनाने की दिशा में आवश्यक कदम है।
इतिहास गवाह है कि जो संस्थाएँ समय के साथ स्वयं को बदलने से इनकार करती हैं, वे धीरे-धीरे अप्रासंगिक हो जाती हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद आज उसी मोड़ पर खड़ी है।
भारत ने स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र को मजबूत किया, आर्थिक शक्ति अर्जित की, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में विश्व स्तर पर पहचान बनाई, शांति अभियानों में अग्रणी भूमिका निभाई और वैश्विक संकटों में जिम्मेदार नेतृत्व प्रस्तुत किया। इसके बावजूद यदि उसे निर्णय लेने वाले सर्वोच्च मंच पर स्थायी स्थान नहीं मिलता, तो यह केवल भारत के साथ अन्याय नहीं होगा, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था की कमजोरी भी होगी जो समान प्रतिनिधित्व और न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था का दावा करती है।
प्रश्न अब यह नहीं है कि क्या भारत UNSC की स्थायी सदस्यता का पात्र है? प्रश्न यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र स्वयं को 21वीं सदी के अनुरूप बदलने का साहस जुटा पाएगा?
यदि उत्तर “हाँ” है, तो भारत की स्थायी सदस्यता केवल समय की बात है। और यदि उत्तर “नहीं” है, तो भविष्य में चुनौती भारत के सामने नहीं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र की अपनी प्रासंगिकता के सामने होगी। यही इस बहस का सबसे बड़ा और सबसे गंभीर सत्य है।







