श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट विवाद में सबसे बड़े सवाल महासचिव चंपत राय व अनिल मिश्रा को लेकर उठे, अब दोनों का इस्तीफा स्वीकार हो गया है। जांच पूरी होगी, तब चंपत राय को खुद को बेदाग साबित करने का भी मौका मिल सकता है। एसआईटी की प्रारंभिक रिपोर्ट और ट्रस्ट की बैठक में इस्तीफा स्वीकार होने के बाद चंपत राय ने एक चिट्ठी राम भक्तों के नाम लिखी और कहा कि वह जब तक बेदाग साबित नहीं हो जाएंगे, वह मौन रखेंगे इस पर। चिट्ठी में तो उन्होंने नहीं लिखा, पर जब उसे सोशल मीडिया पर डाला, तो गोस्वामी तुलसीदास को याद किया। श्रीरामचरितमानस के अरण्यकांड से विदूषी अनुसुइया को स्मरण करते हुए उन्होंने लिखा- धीरज धर्म मित्र अरु नारी, आपद काल परिखिअहिं चारि।। यानी धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी की परख विपत्ति के समय होती है।
सच ही है कि चंपत राय के लिए यह विपत्ति का समय है और इस समय उन्हें उन लोगों की परख हो रही होगी, जो जमाने से उनके सामने साष्टांग रहते थे। उन लोगों की परख भी हो जाएगी, जिन्होंने उनके विश्वास को तोड़ा। बहुत से लोग अब भी कह रहे हैं कि चंपत राय की ईमानदारी और निष्ठा पर सवाल नहीं खड़े किए जा सकते, लेकिन उनके अहंकार की वजह से यह सब हुआ। वह खुद को ही भगवान जैसा समझने लगे थे। ट्रस्ट और संघ परिवार में कई लोगों ने यह शिकायत की, तो मुझे अनायास अमीर खुसरो याद आ गए- खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार। जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।
खैर, मुद्दा चंपत राय नहीं होना चाहिए। मसला है करोड़ों राम भक्तों और उन लोगों की आस्था का, जिन्होंने आंख मूंदकर भरोसा किया। दरअसल, वह भरोसा ट्रस्ट, आरएसएस या परिषद के लोगों पर नहीं था, वह तो भगवान राम को लेकर उनकी आस्था थी, जिसके लिए बरसों से वे अपने सामर्थ्य से, और उससे भी ज्यादा करने की कोशिश करते रहे। यह तब भी किया, जब बरसों बरस पहले राम मंदिर निर्माण के लिए शिलाएं मंगाई गईं। राम रथयात्रा निकालकर बाबरी मस्जिद के ध्वंस तक कार सेवक अयोध्या तक पहुंचे, कई बार गोलियां भी खाईं, लाठी-डंडे भी खाए। तब तो यह पता भी नहीं था कि मंदिर बनेगा या नहीं? वे उस दिन नाराज भी नहीं हुए, जब राम मंदिर का शिला पूजन किया गया और उन्हें अयोध्या पहुंचने से रोक दिया गया। वह तब भी नाराज नहीं हुए, जब राम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा को देश के सबसे अमीर, शक्तिशाली व नामचीन लोगों के भव्य समारोह में बदल दिया गया और उन्हें टीवी पर कार्यक्रम देखने की सलाह दी गई।
यह भी सच यहां लिखना जरूरी लगता है कि प्राण-प्रतिष्ठा समारोह में शामिल हुए ज्यादातर लोग किसी आंदोलन में शरीक नहीं हुए थे, बल्कि ऐसा लगा कि आंदोलन से जुड़े कई लोगों को दूर रखने की कोशिश की गई। जो लोग उस भव्य समारोह में शामिल हुए, इतनी बड़ी चढ़ावा-चोरी और जमीन व निर्माण से जुड़े सवालों पर ऐसे चुप्पी साध गए, मानो उनका कोई इससे रिश्ता न हो। मेरे एक मित्र ने कहा, आम आदमी की चुप्पी को वोटों की गूंज में बदलते देर नहीं लगती।
यहां मैं उन बातों का जिक्र नहीं करना चाहता, जो सामने आ गई हैं, यानी करोड़ों रुपये की चढ़ावा चोरी और उसकी अनदेखी, जमीनों की महंगी खरीद, निर्माण में कमीशनखोरी के आरोप आदि। सवाल तो यह भी है कि ट्रस्ट को आरटीआई से दूर क्यों रखा गया, जबकि दूसरे धार्मिक ट्रस्ट उसके तहत आते हैं? ट्रस्ट को एक परिवार का ट्रस्ट जैसा क्यों बनाया गया? क्यों जरूरी एहतियातों का ध्यान नहीं रखा गया? बात उठती है, तो दूर तलक जाती है। अब इस मंदिर के लिए आए चढ़ावे और चंदे के साथ-साथ उसके खर्च का हिसाब जारी करना काफी नहीं। यह देखा जाना चाहिए कि क्या यह खर्च सही है? प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के लिए 113 करोड़ रुपये का खर्च या रोजाना के काम में सैकड़ों करोड़ खर्च हुए, इसका हिसाब कौन देगा? भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सबसे जरूरी कदम है पारदर्शिता, जो अब भी नहीं दिख रही। इस तरह की चुप्पी संदेह को गहरा ही करती है।
सवाल करने वालों को रामद्रोही कहने से काम नहीं चलेगा और न ही उन लोगों को खारिज किया जा सकता है, जो राम मंदिर दर्शन के लिए अयोध्या नहीं गए। यह सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने का सवाल है। वैसे देश भर के 100 करोड़ से ज्यादा हिंदुओं में से अब तक करीब तीस करोड़ लोगों ने ही दर्शन किए हैं, तो क्या बाकी लोगों को आप रामद्रोही करार दे रहे हैं? इनमें से अनगिनत तो हर दिन राम की माला जपते हैं!
इस पूरे प्रकरण का राजनीतिक असर क्या होगा, इस पर फिर कभी चर्चा करेंगे, पर सामाजिक सवालों के जवाब बहुत जरूरी हैं और उन अपराधों के दोषियों तक पहुंचना भी जरूरी है, जिन्हें ‘धर्म पर हमले’ का बहाना बनाकर बचाने की कोशिश हो रही है। यह धर्म से बड़ा अपराध का मामला है, और जिन्हें हिंदू धर्म की ज्यादा चिंता है, वे एक बार फिर से हिंदू धर्म की व्याख्या पढ़ लें। यहां कबीर याद आ रहे हैं- जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहि।







