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सुप्रीम कोर्ट से दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को तगड़ा झटका

UB India News by UB India News
January 6, 2026
in अपराध, खास खबर, दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट से दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को तगड़ा झटका

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उमर खालिद और शरजील इमाम को तगड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी कि ‘उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला’ दिल्ली दंगे के अन्य आरोपियों से अलग है. कोर्ट ने 7 में से 5 आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को (जमानत) की अनुमति दे दी है.

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी- 

  1. कोर्ट ने कहा कि न्यायालय इस बात से संतुष्ट है कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत सामग्री से अपीलकर्ताओं उमर खालिद और शरजील इमाम के विरुद्ध प्रथम दृष्टया आरोप सिद्ध होते हैं. इन अपीलकर्ताओं के संबंध में वैधानिक सीमा लागू होती है. कार्यवाही के इस चरण में उन्हें जमानत पर रिहा करना उचित नहीं है.
  2. अदालत गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत देती है.इन आरोपियों को जमानत देने से उनके खिलाफ लगे आरोपों में कोई कमी नहीं आती. उन्हें निम्नलिखित शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाता है, लगभग 12 शर्तें हैं. यदि शर्तों का उल्लंघन होता है, तो निचली अदालत आरोपियों की सुनवाई के बाद जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगी.
  3. कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज करते हुए अहम टिप्पणी की कि संरक्षित गवाहों की जांच पूरी होने पर या इस आदेश की तिथि से एक वर्ष की अवधि पूरी होने पर ये अपीलकर्ता जमानत के लिए आवेदन करने के लिए स्वतंत्र होंगे.
  4. यूएपीए की धारा 43डी(5) जमानत देने के सामान्य प्रावधानों से अलग है. यह न्यायिक जांच को बाहर नहीं करता है या डिफ़ॉल्ट होने पर जमानत से इनकार को अनिवार्य नहीं बनाता है. सभी आरोपियों की भूमिका पर गौर करना जरूरी. जमानत बचाव पक्ष के मूल्यांकन का मंच नहीं है. न्यायिक संयम कर्तव्य का परित्याग नहीं है.
  5. आदेश में कहा गया, ‘अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था में केंद्रीय स्थान रखता है. विचाराधीन कैद को सजा के रूप में नहीं माना जा सकता है. स्वतंत्रता से वंचित करना मनमाना नहीं होना चाहिए. यूएपीए एक विशेष कानून है, जो यह तय करता है कि ट्रायल से पहले जमानत किन परिस्थितियों में दी जा सकती है.’
  6. रिकॉर्ड देखने से साफ पता चलता है कि इस मामले में सभी आरोपियों का दोष या गुनाह एक बराबर नहीं है. अपराध में किसकी कितनी भूमिका थी, इस आधार पर कोर्ट को हर किसी की अर्जी पर अलग-अलग विचार करना चाहिए. साथ ही, संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि अगर फैसला आने से पहले (ट्रायल के दौरान) किसी को लंबे समय तक जेल में रखा जाता है, तो सरकार को इसका बहुत ठोस कारण बताना होगा. बिना सही वजह बताए किसी को लंबे समय तक जेल में बंद नहीं रखा जा सकता.
  7. जमानत रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि देखना होगा कि गैर कानूनी गतिविधियों में जो आरोप लगे हैं क्या वो मज़बूत हैं या नहीं. आतंकी कृत्य केवल हिंसा तक सीमित नहीं, बल्कि आवश्यक सेवाओं में व्यवधान भी इसके दायरे में आता है. क्या आरोपी की भूमिका का अपराध करने से कोई उचित संबंध है? सही फैसले के लिए न्यायालय को एक व्यवस्थित जांच करनी होगी.
  8. कुछ आरोपियों द्वारा निभाई गई केंद्रीय भूमिका और अन्य आरोपियों द्वारा निभाई गई सहायक भूमिका के बीच अंतर को नजरअंदाज करना अपने आप में मनमानी का नतीजे होंगे.
  9. कोर्ट ने अपने फैसले में आगे निचली अदालतों को नोटिस जारी किया है. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि निचली अदालत यह पक्का करे कि ‘संरक्षित गवाहों’ (जिन गवाहों को सुरक्षा या प्रोटेक्शन मिला हुआ है) के बयान जल्द से जल्द दर्ज किए जाएं. इसमें बिल्कुल भी देरी नहीं होनी चाहिए. साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि केस को बेवजह लंबा न खींचा जाए/टाला जाए.
  10. केस की सुनवाई बिना किसी रुकावट के लगातार चलती रहनी चाहिए. हम सीनियर वकील और उनकी पूरी टीम को धन्यवाद देते हैं जिन्होंने इस मामले में हमारी मदद की.

उम्मीद की किरण

उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत रद्द करने का बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने एक उम्मीद की किरण दे दी. कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका के लिए एक उम्मीद का एक रास्ता भी खुला रखा है. अदालत ने साफ किया है कि जैसे ही ‘संरक्षित गवाहों’ की गवाही पूरी हो जाती है, या फिर आज के आदेश को एक साल पूरा हो जाता है, ये दोनों दोबारा जमानत के लिए अर्जी लगा सकते हैं. इसके साथ ही, कोर्ट ने निचली अदालत को सख्त निर्देश दिए हैं कि केस को बेवजह लंबा खींचने के बजाय सुनवाई लगातार चलाई जाए और गवाहों के बयान जल्द से जल्द दर्ज किए जाएं.
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