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दोस्ती और दुश्मनी: ‘अमेरिका फर्स्ट’ की मार ने वैश्विक संतुलन हिलाया, वक्त का खेल…

यूरोप की औद्योगिक क्रांति और नए व्यापारिक मार्गों ने वेनिस और इस्तांबुल, दोनों को पीछे छोड़ दिया है। मगर चार सौ साल तक चला ये रिश्ता इतिहास में दर्ज हो गया है, जो बताता है कि दुश्मनी में भी दोस्ती की गुंजाइश रहती है, बशर्ते बात धंधे की हो, क्योंकि जंग लड़ने को भी तो पैसा चाहिए और वह व्यापार से ही आएगा।

UB India News by UB India News
September 15, 2025
in संपादकीय
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ट्रंप के टैरिफ से दुनिया में हलचल……….
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भारत और चीन-हर मोर्चे पर प्रतिद्वंद्वी! मगर ट्रंप के 50 फीसदी टैरिफ और ‘अमेरिका फर्स्ट’ की मार ने वैश्विक संतुलन को हिला दिया है। भारतीय कूटनीतिक दल के जेहन में गलवान की टीस, अरुणाचल को ‘साउथ तिब्बत’ कहने की चाल, ब्रह्मपुत्र पर बांध का खतरा और पाकिस्तान को चीन का साथ-सब ताजा थे, मगर वक्त का खेल देखिए कि मोदी और शी, दोनों ने कहा कि ‘ड्रैगन और हाथी को एक साथ नृत्य करना है। दुश्मन नहीं, दोस्त बनना है।’

सितंबर में चीन के तियानजिन का मौसम सुहाना ही रहता है, मगर इस बार वैश्विक कूटनीति का पारा गर्म था। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, 2020 में गलवान संघर्ष के बाद पहली बार चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग से आमने-सामने हुए। भारत और चीन-हर मोर्चे पर प्रतिद्वंद्वी! मगर ट्रंप के 50 फीसदी टैरिफ और ‘अमेरिका फर्स्ट’ की मार ने वैश्विक संतुलन को हिला दिया है। भारतीय कूटनीतिक दल के जेहन में गलवान की टीस, अरुणाचल को ‘साउथ तिब्बत’ कहने की चाल, ब्रह्मपुत्र पर बांध का खतरा और पाकिस्तान को चीन का साथ-सब ताजा थे, मगर वक्त का खेल देखिए कि मोदी और शी, दोनों ने कहा, ‘ड्रैगन और हाथी को एक साथ नृत्य करना है। दुश्मन नहीं, दोस्त बनना है।’

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आज की पीढी के लिए इस टेढ़ी-मेढ़ी दोस्ती को देखना अनोखा और अप्रत्याशित है, लेकिन ऐसा पहली बार नहीं है। आइए, टाइम मशीन तैयार है, पकड़िए अपनी सीट, हम चलते एक ऐसे दौर में, जहां एक-दो दशक नही, बल्कि पूरे 400 साल तक दो साम्राज्य एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें भी ताने रहे और बाजारों में खुलकर गले भी मिलते रहे। हम मिलेंगे उन किरदारों से, जिन्होंने दोस्ती और दुश्मनी की रस्सी पर ऐसे करतब दिखाए कि वक्त ने दांतों तले उंगली दबा ली। टाइम मशीन के डेस्टिनेशन पाथ को देखिए। हम पहुंच रहे हैं कॉन्स्टेंटिनोपल, साल है 1453। ऑटोमन सुल्तान मेहमेद द्वितीय ने कॉन्स्टेंटिनोपल जीत लिया है। बाइजेन्टिन साम्राज्य की राजधानी ढहने से पूरे यूरोप में सनसनी दौड़ गई है। सदियों से यही शहर पूरब-पश्चिम व्यापार का दरवाजा था। वेनिस के लिए यह अस्तित्व का संकट है। उसका व्यापार उपनिवेश सीधे ऑटोमन के नियंत्रण में आ गया है। गेहूं, मसाले, रेशम जैसी जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति अब तुर्किये साम्राज्य के रहम-ओ-करम पर है। कॉन्स्टेंटिनोपल के बाजारों में चलते हैं, जहां वेनिस के व्यापारी सकते में हैं। आॅटोमनों ने वेनिस को दो रास्ते दिए-या तो व्यापार बंद करो, या हमारे नियम मानो। वेनिस, जो समुद्र का बादशाह है, ने व्यापार चुना है।

यह 1454 का साल है। कॉन्स्टेंटिनोपल पर आॅटोमन के कब्जे के एक साल बाद वेनिस ने मेहमेद द्वितीय से व्यापार संधि कर ली। इस समझौते ने वेनिस को हारे हुए हालात में भी व्यापारिक अधिकार दिला दिए हैं, मगर व्यापारियों की बातचीत पर कान लगाइए। ऑटोमनों के साथ बार-बार जंग छिड़ रही है और संधि हो रही है। वेनिस के जहाज भारत से आए मसाले लादकर लौटते हैं, तो ऑटोमन तोपें उन पर बारूद बरसाती हैं। फिर भी वेनिस दुश्मन से भी दोस्ती निभा रहा है, क्योंकि धंधे का सवाल जो है। यह 1455 का साल है। उस आदमी को देख रहे हैं आप, जिसके आसपास बड़ी भीड़ है। ये आंद्रिया ग्रिट्टी हैं, वेनिस का यह बड़ा व्यापारी, कॉन्स्टेंटिनोपल के बाजारों में गेहूं बेचता है। उसकी एक ग्रीक माशूका है। चार बेटे शहर की रंगीनी में घुले-मिले हैं। आंद्रिया ऑटोमन की सेना, जहाज, हथियारों की खबर वेनिस भेजता है। बाजार में चर्चा है कि आंद्रिया पकड़ लिया गया है, मगर लोग ठीक कह रहे हैं कि आंद्रिया तो ऑटोमन के वजीर का यार है। उसे कुछ नहीं होगा। फिलहाल तो कॉन्स्टेंटिनोपल में तलाश रहे हैं जियोवानी डारियो को। यह साल है 1479। डारियो, जो वेनिस-आॅटोमन रिश्तों में कुछ ऐसा करने जा रहे हैं, जो बीसवीं सदी में अमेरिका और चीन के रिश्तों में दोहराया जाएगा, जब हेनरी किसिंजर अमेरिका के विदेश मंत्री की भूमिका में होंगे।

वेनिस की जंगी कोशिशें खेत रही हैं। तुर्कों ने वेनिस को फिर हरा दिया है। अब डारियो मेहमेद द्वितीय से शांति की बात कर रहा है। उसे आॅटोमन के तौर-तरीकों की पूरी समझ है। माहौल गर्म है। मेहमेद की शर्तें हैं कि शांति के लिए यूरोप की जमीन दो, हर्जाना दो। डारियो व्यापार की राह बचाना चाहता है, ताकि वेनिस का धंधा चलता रहे। और यह लीजिए, डारियो ने सुल्तान मेहमेद को शीशे में उतार लिया। सुल्तान मेहमेद को वेनिस का चित्रकार चाहिए; डारियो किसे भेज रहा है? आप देख रहे हैं इस चित्रकार को! यह जेंटाइल बेलिनी है। इतिहास इसे इटैलियन पेंटिंग रिनेसां के नायक के तौर पर नवाजेगा। बेलिनी सुल्तान मेहमेद द्वितीय का एक पोर्टेट बनाकर लाया है। यह मेहमेद को अगली सदियों तक ले जाएगा। जब आप 21वीं सदी में लौंटें, तो इस पेंटिंग को लंदन के विक्टोरिया अल्बर्ट म्यूजियम में देख आइएगा। यह पेंटिंग नहीं, वेनिस और ऑटोमन के बीच शांति का दस्तावेज है। डारियो की कूटनीति सफल रही। इस वक्त दुनिया का सबसे ताकतवर सम्राट ऑटोमन सुल्तान इस पोर्टेट पर रीझ गया है। जंग रुक गई है। व्यापार जारी है। अब हम टाइम मशीन के साथ वेनिस आ गए हैं। यह 1502 का साल है। अब तक व्यापारिक फायदे के लिए दुश्मन के साथ दोस्ती वेनिस की कूटनीति का हिस्सा बन चुकी है। डोज लियोनार्डो लोरेडन सिंहासन पर हैं। अर्थव्यवस्था डूब रही है। दूसरे ऑटोमन-वेनिस युद्ध में मोडोन जैसे शहर हाथ से निकल गए हैं। ऑटोमनों ने हर्जाना वसूला है, मगर यह क्या! वेनिस ने ऑटोमन से फिर संधि कर ली है। कब्जा किए गए हिस्से वापस ले लिए हैं। डोज लोरेडान ने लीग ऑफ कैम्ब्राई यानी होली रोमन एंपायर और फ्रांस की सेना से जंग मोल ले ली है। यह सेना यूरोप की क्रििश्चयन ताकतों ने बनाई है। लियोनार्डो क्रििश्चयन से लड़ रहा है, तुर्कों से दोस्ती कर रहा है। व्यापार नहीं रुकना चाहिए!

टाइम मशीन 1523 की तरफ बढ़ती है। हम वेनिस में हैं। आंद्रिया अब वेनिस का डोज है यानी शासक। उसे ओटोमन के सभी रहस्य मालूम हैं। अब वह तुर्कियों के खिलाफ जंग की रणनीति बना रहा है, मगर व्यापार की राह अब भी खुली है। सुलेमान द मैग्निफिसेंट ने वेनिस के खिलाफ फिर जंग छेड़ दी है। दरबार की खबरों पर कान लगाइए। वहां अल्वीज ग्रिट्टी का जिक्र है। यह ग्रिट्टी परिवार बड़ा ही विवादित हो गया है। यह उसी गेहूं व्यापारी आंद्रिया ग्रिट्टी का बेटा है, जिससे हम मिल कर आ रहे हैं। एक तरफ सम्राट सुलेमान वेनिस के लिए खतरा हैं, दूसरी तरफ वे अल्वीज को अपना खास बना रहे हैं। आंद्रिया के बेटे अल्वीज ग्रिट्टी ने ‘वेनेटियन हेलमेट’ बनवाए हैं, जो ऑटोमन ताकत का प्रतीक बनने वाले हैं। सुलेमान चालाक है, उसने अल्वीज गिट्टी को हंगरी का रीजेंट बना दिया है। वह वेनिस से जंग भी कर रहा है, उसके खास लोगों को अपने साथ भी मिला रहा है और व्यापार भी जारी है। टाइम मशीन 1800 की ओर बढ़ती है। वेनिस-ऑटोमन का रिश्ता अब थक रहा है। 1797 में नेपोलियन ने वेनिस को ऑस्ट्रिया को सौंप दिया और उसका गणतंत्र खत्म हुआ। ऑटोमन साम्राज्य भी कमजोर पड़ गया है। 19वीं सदी आ लगी है। व्यापार की रौनक फीकी पड़ रही है। यूरोप की औद्योगिक क्रांति और नए व्यापारिक मार्गों ने वेनिस और इस्तांबुल, दोनों को पीछे छोड़ दिया है। मगर चार सौ साल तक चला ये रिश्ता इतिहास में दर्ज हो गया है, जो बताता है कि दुश्मनी में भी दोस्ती की गुंजाइश रहती है, बशर्ते बात धंधे की हो, क्योंकि जंग लड़ने को भी तो पैसा चाहिए और वह व्यापार से ही आएगा। टाइम मशीन दिल्ली में में रुक रही है। ड्रैगन और हाथी का यह ठुमका कोई नया तमाशा नहीं है। वेनिस और ऑटोमन ने यह खेल सैकड़ों साल खेला है। आप तो बस बिसात पर मोहरों की पेशबंदी देखिए, क्योंकि भारत और चीन, दोनों को एक दूसरे की जरूरत है और यह जरूरत पूरी तरह कारोबारी है।

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