बिहार में उगते सूर्य को अर्घ्य के साथ लोक आस्था के महापर्व चैती छठ का समापन हो गया। 4 दिनों तक चलने वाले छठ के पारण के साथ ही 36 घंटे का निर्जला उपवास खत्म हो गया। सुबह 4 बजे से ही गंगा घाटों पर छठ व्रतियों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। श्रद्धालुओं की भीड़ के चलते दीघा घाट इलाके में जाम लगा।
पटना में 41 गंगा घाट और 7 तालाबों पर व्रतियों और श्रद्धालुओं ने भगवान सूर्य को अर्घ्य दिया। आज मृगशिरा नक्षत्र में शोभन योग और रवियोग का सुयोग बन रहा है। जल में रक्त चंदन, लाल फूल, इत्र के साथ ताम्रपत्र में सूर्य को अर्घ्य देने से आयु, विद्या, यश और बल की प्राप्ति होती है।
मान्यताओं के मुताबिक, सूर्य षष्ठी का व्रत आरोग्य की प्राप्ति, सौभाग्य और संतान के लिए रखा जाता है। स्कंद पुराण के अनुसार, राजा प्रियव्रत ने भी छठ व्रत रखा था। उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था।
ऋग्वैदिक काल से चली आ रही छठ की परंपरा
पंडित राकेश झा के मुताबिक भगवान भास्कर को जल से अर्घ्य देने से मानसिक शांति और जीवन में उन्नति होती है। इस पर्व को करने से रोग, शोक, भय, आदि से मुक्ति मिलती है। छठ व्रत करने की परंपरा ऋग्वैदिक काल से ही चला आ रहा है। विष्णु पुराण के अनुसार तिथियों के बंटवारे के समय सूर्यदेव को सप्तमी तिथि प्राप्त हुई थी। इसलिए उन्हें इस तिथि का स्वामी भी कहा जाता है।
देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं, जिनको प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। सूर्य की शक्ति का मुख्य स्त्रोत उनकी पत्नी उषा और प्रत्यूषा है। छठ में सूर्य के साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। पहले सायंकालीन अर्घ्य में सूर्य की अंतिम किरण प्रत्युषा और फिर उदीयमान सूर्य की पहली किरण उषा को अर्घ्य देकर नमन किया जाता है। सूर्य उपासना के महापर्व में भगवान भास्कर को पीतल के पात्र से दूध, तथा तांबे के पात्र से जल से अर्घ्य देने से अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है।

भगवान सूर्य की मानस बहन है षष्ठी देवी
आचार्य राकेश झा ने अथर्ववेद के हवाले से बताया कि षष्ठी देवी भगवान सूर्य की मानस बहन हैं। इसलिए भगवान भास्कर के साथ उनकी बहन षष्ठी देवी की पूजा होती है। प्रकृति के षष्टम अंश से षष्ठी माता उत्पन्न हुई है। बच्चों के जन्म के छठे दिन षष्ठी मइया की पूजा की जाती है। ताकि बच्चे दीर्घायु और निरोग रहे।







