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नेहरू की इस गलती की सजा भुगत रहा भारत?

UB India News by UB India News
December 15, 2022
in खास खबर, ब्लॉग, राष्ट्रीय
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नेहरू की इस गलती की सजा भुगत रहा भारत?
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चीन और भारत के बीच एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। उसने इस बार अरुणाचल प्रदेश के तवांग में घुसपैठ करने की कोशिश की लेकिन भारतीय सेना ने चीनी सैनिकों को बुरी तरह खदेड़ दिया, जिसकी हर तरफ चर्चा हो रही है। इससे पहले 2020 में लद्दाख में भी दोनों देशों की सेना की इसी तरह झड़प देखने को मिली थी। आजादी के बाद से चीन ने भारत की अच्छी खासी जमीन पर कब्जा किया है। वो लगातार अपनी विस्तारवाद की नीति पर आगे बढ़ रहा है लेकिन चीन बार-बार इस तरह की हिमाकत आखिर क्यों कर रहा है? वो इतना सिर पर कैसे चढ़ गया? इसकी जड़ें इतिहास में ही छिपी हुई हैं। ऐसा कहा जाता है कि उसे इतनी छूट देने की गलती भी खुद भारत ने ही की थी।

आज बेशक भारत का विपक्ष चीन के मामले में वर्तमान सरकार को जिम्मेदार ठहरा रहा है। उसे बार-बार निशाने पर ले रहा है और भूल रहा है कि अतीत की गलतियों का परिणाम ही आज हम भुगत रहे हैं। चीन न केवल पाकिस्तानी आतंकियों को बचाने के लिए भारत के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में वीटो का इस्तेमाल कर रहा है, बल्कि भारत के ही इलाके यानी पीओके (पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर) में परियोजनाएं चला रहा है।

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अमित शाह ने लगाया आरोप

तवांग मामले में गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, “कांग्रेस जवाब दे कि साल 2005-07 के बीच राजीव गांधी फाउंडेशन ने चीनी दूतावास से जो 1 करोड़ 35 लाख रुपये प्राप्त किए उनसे क्या किया? कांग्रेस देश को बताए कि राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट ने जाकिर नाइक की संस्था से बिना अनुमति के FCRA खाते में जुलाई 2011 को 50 लाख रुपये क्यों लिए?  नेहरू जी के कारण सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की बलि चढ़ गई। 1962 में भारत की हजारों हेक्टेयर भूमि चीन ने हड़प ली। 2006 में भारत में चीन के दूतावास ने पूरे अरुणाचल और नेफा पर दावा कर दिया था। अब देश में मोदी सरकार है, हमारी एक इंच भूमि भी कोई नहीं ले सकता।”

– नेहरू जी के कारण सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की बलि चढ़ गई।

– 1962 में भारत की हजारों हेक्टेयर भूमि चीन ने हड़प ली।

– 2006 में भारत में चीन के दूतावास ने पूरे अरुणाचल और नेफा पर दावा कर दिया था।

अब देश में मोदी सरकार है, हमारी एक इंच भूमि भी कोई नहीं ले सकता। https://t.co/cNgBqQMxDK

— Amit Shah (@AmitShah) December 13, 2022

तो चलिए आज इतिहास की तरफ एक नजर डालते हैं और जान लेते हैं कि हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे ने किस तरह भारत की पीठ में छुरा घोंपा है। आज हम बात उस सीट की करते हैं, जो काफी समय से भारत पाने की कोशिश कर रहा है और वही सीट भारत की वजह से चीन को मिल गई थी।

तीन साल पहले भी छिड़ी थी बहस

कुछ वक्त पहले चलते हैं… मार्च 2019 में भी इस मुद्दे पर बहस छिड़ी थी। तब चीन ने पाकिस्तानी आतंकी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित होने से बचाया था। उसने वीटो पावर का इस्तेमाल किया था। तब कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने कहा था, “कमजोर मोदी शी (चीन के राष्ट्रपति) से डर गए हैं। जब चीन भारत के खिलाफ काम करता है तो उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता।” इसके जवाब में पूर्व कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था, “चीन की बात राहुल करेंगे तो बात दूर तलक जाएगी।” उन्होंने अपनी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में 2004 की एक रिपोर्ट की कॉपी दिखाते हुए कहा था, भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने संयुक्त राष्ट्र में सुरक्षा परिषद की सीट लेने से मना कर दिया था और उसे चीन को दिलवा दिया।

LIVE : Shri @rsprasad is addressing a press conference at BJP HQ. https://t.co/G3sJ6QXpkP

— BJP (@BJP4India) March 14, 2019

रिपोर्ट में कांग्रेस सांसद शशि थरूर की किताब ‘नेहरू- द इन्वेंशन ऑफ इंडिया’ का हवाला दिया गया था। किताब में लिखा गया है कि भारत को 1953 के आसपास यूएनएससी में स्थायी सदस्य बनने का ऑफर मिला था, लेकिन उसने ये मौका चीन को दे दिया। उन्होंने लिखा कि भारतीय राजनयिकों ने नेहरू के इनकार के जिक्र वाली फाइल देखी थी। उन्होंने ही यूएन की सीट ताइवान के बाद चीन को देने की वकालत की थी।

दिवंगत पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने ट्वीट कर कहा था कि नेहरू ने भारत के बजाय चीन का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि चीन और कश्मीर पर एक ही शख्स ने बड़ी गलती की। उन्होंने 2 अगस्त, 1955 को नेहरू की तरफ से मुख्यमंत्रियों को लिखी चिट्ठी का हवाला दिया था। ये उनके पुराने ट्वीट हैं-

 

https://twitter.com/arunjaitley/status/1106104743699595264?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E1106104743699595264%7Ctwgr%5E5f068454597ec84d69d64c74b539a5072998c4eb%7Ctwcon%5Es1_&ref_url=https%3A%2F%2Fwww.indiatv.in%2Findia%2Fnational%2Fchina-got-a-permanent-seat-un-security-council-india-paying-the-price-for-nehru-mistake-tawang-2022-12-15-912086

 

क्या कहता है इतिहास?

चीन को यूएनएससी की स्थायी सीट मिलने की कहानी 1950 के दशक से शुरू होती है। भारत 26 जनवरी, 1950 को गणतांत्रित देश बना था जबकि चीन इसके कुछ महीने पहले यानी 21 सितंबर, 1949 को जनवादी चीन बना। भारत की चाहत थी कि चीन संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य बन जाए। भारत ही पाकिस्तान को इस्लामिक देश और चीन को कम्युनिस्ट देश के तौर पर मान्यता देने वाला प्रथम देश (पहला गैर कम्युनिस्ट देश) था। तब यूएनएससी की चार स्थायी सीटों पर अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस थे। वहीं 5वीं सीट खाली थी।

पश्चिमी देश इस सीट पर भारत को बैठे देखना चाहते थे। वो चीन को इस पर काबिज होते नहीं देखना चाहते थे। इसके पीछे का कारण ये था कि अगर चीन को सीट मिल जाती, तो परिषद में स्थायी सीट पर दो कम्युनिस्ट देश हो जाते। पहला रूस और दूसरा चीन लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने चीन को सीट दिए जाने की वकालत की क्योंकि उस वक्त भारत और चीन के रिश्ते हिंदी-चीनी भाई-भाई वाले थे। यानी दोनों देशों के बेहद अच्छे संबंध थे।

ताइवान को मिल गई थी सीट

उस वक्त चीन खुद मुश्किल में घिरा था। तब च्यांग काई शेक की कुओमितांग पार्टी और माओ त्से तुंग की कम्युनिस्ट पार्टी के बीच गृह युद्ध चल रहा था। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस को कम्युनिस्टों से नफरत थी। चीन के नाम वाली सीट 1945 में च्यांग काई शेक की राष्ट्रवादी चीन सरकार को दी गई लेकिन गृहयुद्ध में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की जीत हो गई।

नेहरू ने दावों को कर दिया था खारिज

यूएनएससी की सीट को लेकर आज भी नेहरू की खूब आलोचना की जाती है जबकि अन्य तथ्यों को नकार दिया जाता है। संयुक्त राष्ट्र साल 1945 में बना था। तब इससे जुड़े संगठन आकार ही ले रहे थे। जब इसके सदस्य 1945 में बनाए गए, तब तक भारत आजाद भी नहीं हुआ था। खुद नेहरू ने 27 सितंबर, 1955 में संसद में इस दावे को खारिज कर दिया था कि भारत को यूएनएससी में स्थायी सदस्य बनने का कोई अनौपचारिक प्रस्ताव मिला था।

उन्होंने 27 सितंबर, 1955 को संसद में डॉक्टर जेएन पारेख के सवालों का जवाब देते हुए कहा था, “यूएनएससी में स्थायी सदस्य बनने के लिए औपचारिक या अनौपचारिक कोई प्रस्ताव नहीं मिला था। कुछ संदिग्ध संदर्भों का हवाला दिया जा रहा है, जिनमें कोई सच्चाई नहीं है। यूएन में सुरक्षा परिषद का गठन यूएन चार्टर के तहत हुआ था और इसमें कुछ खास देशों को ही स्थायी सदस्यता मिली थी। इसमें बिना संशोधन के कोई बदलाव या कोई नया सदस्य नहीं बन सकता है। ऐसे में ये सवाल ही नहीं बनता ही भारत को स्थायी सीट मिली और उसने लेने से मना कर दिया। हमारी यही घोषित नीति है कि संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनने के लिए जो देश योग्य हैं, उन सभी को इसमें शामिल किया जाना चाहिए।”

चीन की सदस्यता के हिमायती थे नेहरू- नूरानी

अब चलते हैं साल 2002 में। तब फ्रंटलाइन पत्रिका में ‘नेहरूवादी दृष्टिकोण’ पर अधिवक्ता और संविधान विशेषज्ञ एजी नूरानी के एक लेख में अमेरिका और रूस द्वारा भारत को यूएनएससी में सदस्यता का मौका दिए जाने को लेकर नेहरू के 1955 के एक लेख का उल्लेख किया था, जिसमें नेहरू ने लिखा था, “अनौचारिक रूप से अमेरिका ने सुझाव दिया है कि चीन को यूएन की सदस्यता देनी चाहिए लेकिन यूएनएससी में नहीं और भारत को यूएनएससी में स्थान मिलना चाहिए। हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते, इसका मतलब होगा, चीन के साथ रिश्ते खराब करना। चीन जैसे एक महान देश को सुरक्षा परिषद में शामिल न करना अनुपयुक्त होगा।

इसलिए हमने उन लोगों को स्पष्ट कर दिया है, जिनका कहना था कि हम इस सुझाव से सहमत नहीं हो सकते। हमने थोड़ा और आगे बढ़ते हुए कहा है कि इस स्थिति में हम सुरक्षा परिषद में शामिल होने की इच्छा नहीं रखते, फिर भले ही उसे एक महान देश होने के नाते वहां होना चाहिए। सबसे पहला कदम चीन को उसके उचित स्थान पर पहुंचाने के लिए उठाया जाना चाहिए, उसके बाद ही भारत के सवाल पर अलग से विचार किया जा सकता है।”

भारत ने चीन का पक्ष क्यों लिया था?

इस मामले में एजी नूरानी ने कहा था कि भारत द्वारा चीन को यूएनएससी की स्थायी सीट दिलाने के पीछे बहुत से कारण थे। पहला तो ये कि शीत युद्ध की शुरुआत में वह किसी से भी रिश्ते नहीं बिगाड़ना चाहता था। वह वैश्विक तनाव कम करने के लिए पीआरसी (पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना) को सीट देने का समर्थन कर रहा था। यूएन में चीन को सीट देकर उसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एकीकृत करना ही नेहरू की विदेश नीति का केंद्रीय स्तंभ था। वह चाहते थे कि यूएन चार्टर में बदलाव करने या इसमें किसी भी सदस्य को शामिल करने से पहले चीन को जोड़ा जाना चाहिए। भारत भी चाहता था कि उसे यह सीट मिले, लेकिन चीन की सीट के बदले बिलकुल नहीं। तब नेहरू की विदेश नीति के केंद्र में चीन था।

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